प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
भारत और अमेरिका के बीच एक अंतरिम व्यापार समझौते का ढांचा तैयार हो गया है। दोनों देशों ने संयुक्त बयान जारी कर बताया कि भारत अगले पांच सालों में अमेरिका से ऊर्जा, खनिज, तकनीकी उत्पाद और विमान पार्ट्स खरीदेगा, जिसकी कुल कीमत 500 अरब डॉलर होगी। इस समझौते में बाजार पहुंच बढ़ाने और सप्लाई चेन को मजबूत बनाने की बात भी शामिल है।
वाणिज्य मंत्रालय ने इस डील के तहत खास एनर्जी प्रोडक्ट या उनकी मात्रा के बारे में विस्तार से नहीं बताया, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि इसमें पारंपरिक क्रूड ऑयल, शेल ऑयल और गैस, लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) के अलावा कोकिंग कोल जैसी चीजें शामिल हो सकती हैं। एक सीनियर एनालिस्ट ने कहा कि इन एनर्जी प्रोडक्ट की क्वालिटी, तकनीक और लागत पर अब और डिटेल्स देखनी होंगी।
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पिछले वित्त वर्ष में भारत ने कुल 243 मिलियन टन क्रूड ऑयल आयात किया था, जिसकी कीमत करीब 137 अरब डॉलर थी। अमेरिका से क्रूड ऑयल का आयात तेजी से बढ़ा है। अप्रैल से नवंबर 2025 तक यह करीब 13 मिलियन टन पहुंच गया, जो 2024 के इसी दौर के 7.1 मिलियन टन से लगभग दोगुना है। पिछले दो महीनों में तो यह और तेज हुआ, जनवरी में अमेरिका से रोजाना 218,400 बैरल क्रूड आया, जबकि दिसंबर में यह सिर्फ 70,600 बैरल प्रतिदिन था। इससे अमेरिका भारत का पांचवां सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया है।
इस अंतरिम डील और वेनेजुएला से क्रूड की उपलब्धता के साथ भारत-अमेरिका के बीच तेल व्यापार में बड़ा बढ़ोतरी हो सकती है। लेकिन अमेरिका से तेल आयात बढ़ाने में कुछ चुनौतियां भी हैं, खासकर रूस से आयात कम करने की स्थिति में। रूस अभी भारत के तेल आयात का करीब 30 प्रतिशत हिस्सा देता है, जो 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने से पहले सिर्फ 2-3 प्रतिशत था। रूस से तेल सस्ते डिस्काउंट पर मिलता है, जबकि अमेरिका से लाने में फ्रेट और लॉजिस्टिक्स खर्च ज्यादा पड़ता है।
साथ ही, भारतीय रिफाइनरियां ज्यादातर रूस की मीडियम-सॉर क्रूड (ज्यादा सल्फर वाली) के साथ अच्छी तरह काम करती हैं, जबकि अमेरिकी क्रूड ज्यादातर लाइट और स्वीट (कम सल्फर वाली) होता है। इन बातों को ध्यान में रखना होगा।
एक्सपर्ट के मुताबिक, यह समझौता दोनों देशों के बीच आर्थिक रिश्तों को नई दिशा दे सकता है, लेकिन ऊर्जा आयात के फैसले में लागत, क्वालिटी और सप्लाई की स्थिरता सबसे अहम रहेंगे।