उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि किसी विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) से घरेलू बाजार में सप्लाई की जाने वाली बिजली पर सीमा शुल्क नहीं लगाया जा सकता है। अदालत ने सोमवार को अदाणी पावर की उस अपील को सही ठहराया जिसमें उसने गुजरात उच्च न्यायालय के 2019 के फैसले को चुनौती दी थी। गुजरात उच्च न्यायालय ने 2019 में अपने फैसले में अदाणी पावर को उसकी मुंद्रा एसईजेड यूनिट से घरेलू शुल्क क्षेत्र (डीटीए) यानी घरेलू बाजार में दी जाने वाली बिजली पर सीमा शुल्क से राहत देने से इनकार कर दिया था।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और एनवी अंजारिया के खंडपीठ ने कहा कि सीमा शुल्क विभाग के पास एसईजेड से डीटीए में भेजी जाने वाली बिजली पर शुल्क लगाने का कानूनी अधिकार नहीं है। हालांकि अभी इसका ब्योरा मिलना बाकी है लेकिन अदालत ने कहा कि कस्टम एक्ट, 1962 के हिसाब से जो कर लगाया गया है, वह वैध नहीं है और इसे महज कार्यकारी अधिसूचना के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता है।
यह विवाद अदाणी पावर द्वारा मुंद्रा एसईजेड के भीतर अपने कोयला आधारित ताप संयंत्र में पैदा की गई बिजली पर केंद्रित था, जहां कंपनी एक को-डेवलपर के रूप में परिचालन करती है। इस संयंत्र में पैदा हुई बिजली की आपूर्ति एसईजेड में और गुजरात तथा अन्य राज्यों की वितरण कंपनियों दोनों को की जाती है।.
ये विवाद तब शुरू हुआ जब सीमा शुल्क अधिकारियों ने एसईजेड से घरेलू बाजार को दी जाने वाली बिजली पर शुल्क लगाने की कोशिश की जबकि विदेश से भारत में आयात होने वाली बिजली पर इस तरह का कोई शुल्क नहीं लगता है। इससे पहले हुई कानूनी लड़ाई में गुजरात उच्च न्यायालय ने जुलाई 2015 में लेवी फ्रेमवर्क के एक हिस्से को रद्द कर दिया था और कहा था कि अदाणी पावर, जून 2009 और सितंबर 2010 के बीच की सीमित अवधि के लिए एसईजेड से डीटीए को बिजली सप्लाई करने पर सीमा शुल्क से छूट की हकदार है। उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप से इनकार करने के बाद वह फैसला बरकरार रहा।
हालांकि, जब अदाणी ने सितंबर 2010 के बाद की अवधि के लिए इसी तरह की राहत मांगने के लिए उच्च न्यायालय में फिर से अर्जी दी तो अदालत ने जून 2019 में वह याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि लाभ को पहले की समय-सीमा से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है और बाद के कर लगाने के नियम को सीधे चुनौती नहीं दी गई थी।
उच्चतम न्यायालय ने अब उस फैसले को पलट दिया है और कहा है कि अगर वानिक अधिकार ही नहीं है तो प्रक्रिया संबंधी कमियों को दूर करके उसे सही नहीं ठहराया जा सकता है।
दिल्ली उच्च न्यायालय के वकील अंशुमान चौधरी के अनुसार उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट रूप से फैसला सुनाया है कि ‘कस्टम एक्ट की धारा 12 या एसईजेड एक्ट की धारा 30 के तहत कर लगाने की वजह के अभाव में, प्रशासनिक परिपत्र या या दर अधिसूचना जारी करके सीमा शुल्क नहीं लगाया जा सकता है।’
उन्होंने कहा कि यह फैसला अनुच्छेद 265 के तहत संवैधानिक आदेश को मजबूत करता है कि कानून के अधिकार के बिना कोई कर नहीं लगाया जा सकता है और यह इस स्थापित सिद्धांत के अनुरूप है कि वित्तीय कानूनों की सख्ती से व्याख्या की जानी चाहिए।