बीते कुछ वर्षों में केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय में हुए इजाफे का आकलन कई तरह से किया जा सकता है। ऐसा आकलन महत्त्वपूर्ण है क्योंकि मौजूदा वित्त वर्ष में रुझानों में काफी बदलाव आया है। वर्ष 2025-26 में केंद्र सरकार का पूंजीगत व्यय केवल 4.2 फीसदी बढ़ा जबकि इसके पिछले पांच सालों में हर वर्ष यह दो अंकों में बढ़ा था। यहां तक कि इस महीने प्रस्तुत बजट को देखें तो प्रभावी पूंजीगत व्यय, जिसमें पूंजीगत परिसंपत्तियां तैयार करने का अनुदान शामिल होता है, इस वर्ष 6 फीसदी से कम बढ़ेगा।
केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय में इस स्तर की कमी काफी अधिक है। खासतौर पर तब जबकि इसकी तुलना बीते पांच साल में हुए अस्वाभाविक वार्षिक इजाफे से की जाए। यह ध्यान रहे कि इतनी वृद्धि मई 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद के शुरुआती छह साल में हुई वृद्धि की तुलना में काफी बेहतर थी।
वास्तव में 2014-15 और 2019-20 के बीच सरकार का पूंजीगत व्यय केवल तीन साल दो अंकों में बढ़ा। 2015-16 में यह सर्वाधिक 29 फीसदी बढ़ा। इन वर्षों में दो साल इसमें एक अंक की बढ़ोतरी हुई और 2017-18 में यानी एक साल तो पूंजीगत व्यय में 7.5 फीसदी की गिरावट देखने को मिली। आश्चर्य नहीं कि सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में पूंजीगत व्यय 2014 से 2020 की अवधि में 1.5 फीसदी से 1.8 फीसदी के बीच बना रहा।
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि, 1990 के दशक के आर्थिक सुधारों के साथ पूंजीगत व्यय की एक मजबूत खुराक भी जुड़ी हुई थी। 1990 के दशक के अधिकांश वर्षों में पूंजीगत व्यय सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3 फीसदी से अधिक पर ऊंचा बना रहा। 1999-2000 से इसमें धीरे-धीरे गिरावट आई, हालांकि 2003 से 2005 के बीच कुछ अवसरों पर इसमें उछाल देखने को मिली। उल्लेखनीय है कि 2005 से 2020 तक, यानी 15 वर्षों की अवधि में, पूंजीगत व्यय केवल दो बार यानी 2007-08 और 2010-11 में जीडीपी के 2 फीसदी से अधिक हुआ।
कोविड के बाद पूंजीगत व्यय के मोर्चे पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जो उपलब्धि हासिल की है, वह सराहनीय है। वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच उन्होंने औसतन हर वर्ष पूंजीगत व्यय में 26 फीसदी की वृद्धि की। निश्चित रूप से, कोविड के बाद के वर्षों में यह आवश्यक हो गया था, क्योंकि निजी क्षेत्र की निवेश क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हो गई थी और सरकार ने अधोसंरचना निर्माण में निवेश को बढ़ावा देने के लिए अपने राजकोषीय संसाधनों का उपयोग करने का निर्णय लिया। फिर भी, यह एक ऐसा रिकॉर्ड है जिसे पिछले कई दशकों में किसी अन्य वित्त मंत्री ने हासिल नहीं किया। जीडीपी के प्रतिशत के रूप में पूंजीगत व्यय 2019-20 में 1.67 फीसदी से बढ़कर 2024-25 में 3.2 फीसदी हो गया।
यही वजह है कि 2025-26 में पूंजीगत व्यय की केवल 4.2 फीसदी तक वार्षिक वृद्धि दर काफी ध्यान आकर्षित करेगी। जीडीपी के प्रतिशत के रूप में, कोविड के बाद पहली बार केंद्र सरकार का पूंजीगत व्यय घटकर 3.07 फीसदी पर आ जाएगा।
क्या यह चिंता का विषय है? याद रहे कि सरकार का पूंजीगत व्यय निजी निवेश को आकर्षित करने की कोशिश में भी बढ़ा था। निजी निवेश बहुत धीमी गति से बढ़ रहा था। परंतु जैसा कि चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में बताया गया, निजी कारोबारी निवेश चक्र में स्वागत योग्य बदलाव देखने को मिला है। वित्तीय क्षेत्र की कंपनियों के अलावा सूचीबद्ध कंपनियों की अचल संपत्ति अप्रैल से सितंबर 2025 के बीच 13 फीसदी बढ़ी। यह छह वर्षों का सबसे तेज विस्तार है।
ऐसा लगता है कि निजी कॉरपोरेट निवेश में सुधार के लिए वर्षों का इंतजार अब समाप्ति की ओर है, जिससे अर्थव्यवस्था को सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। हालांकि सरकार इस वर्ष निजी कॉरपोरेट निवेश में सुधार के आधार पर कोई जोखिम उठाती या ढील देती हुई नहीं दिखती। आने वाले वर्ष के लिए यह वादा किया गया है कि सरकार का पूंजीगत व्यय फिर से दो अंकों में बढ़ेगा यानी 11.5 फीसदी और जीडीपी के प्रतिशत के रूप में यह थोड़ा बढ़कर 3.11 फीसदी हो जाएगा। स्पष्ट है कि 2025-26 में कुछ गति खोने और आंशिक रूप से निजी निवेश के सुधार से उत्साहित होकर, सरकार एक बार फिर पूंजीगत व्यय को बढ़ाने की योजना बना रही है।
केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय कार्यक्रम को आकलन करने का का एक और तरीका यह होगा कि यह देखा जाए कि राज्यों को उनके पूंजीगत व्यय को वित्तपोषित करने में मदद के लिए किस तरह से ऋण दिए जा रहे हैं। एक बार फिर कोविड एक महत्त्वपूर्ण संकेतक साबित हुआ। अधोसंरचना परियोजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़े ब्याज रहित 50 वर्ष के लिए ऋण राज्यों को 2020-21 में पहली बार दिए गए। उस वर्ष राज्यों को दिए गए ऋण केंद्र के कुल पूंजीगत व्यय का केवल 2.8 फीसदी थे। इसके बाद के वर्षों में यह हिस्सा बढ़ा है और 2025-26 में यह 13 फीसदी था तथा 2026-27 में यह 15 फीसदी तक जाने वाला है। यह दर्शाता है कि केंद्र ने अपने समग्र पूंजीगत व्यय कार्यक्रम को बढ़ाने के लिए राज्यों की क्षमता का कितने प्रभावी ढंग से उपयोग किया है।
संभव है कि कुछ राज्य इन ऋणों का उपयोग अपनी वित्तीय स्थिति संभालने के लिए कर रहे हों। पर समग्र रूप से अर्थव्यवस्था के लिए यह लाभप्रद है, क्योंकि ये ऋण केवल उन राज्यों को दिए जाते हैं जो कुछ सुधारों को पूरा करने का वचन देते हैं, और देश के कुल पूंजीगत व्यय की गति भी निर्बाध बनी रहती है।
केंद्र सरकार के हाल के वर्षों में पूंजीगत व्यय में वृद्धि का आकलन करने का एक तीसरा तरीका भी है। केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों की भूमिका पर, जो केंद्र सरकार को उसके पूंजीगत व्यय योजना को पूरा करने में मदद करते हैं, अक्सर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। सरकार के पूंजीगत व्यय का लगभग 41 से 52 फीसदी हिस्सा सरकारी उपक्रमों को आवंटित किया जाता है। दूसरे शब्दों में, केंद्र अपनी पूंजीगत व्यय योजना को लागू करने के लिए केवल राज्यों पर निर्भर नहीं है, बल्कि सरकारी उपक्रमों पर भी निर्भर है। और ये उपक्रम भी केंद्र से बजटीय सहायता पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं, जो उन्हें अपनी पूंजीगत व्यय योजनाओं को क्रियान्वित करने में मदद के लिए इक्विटी और ऋण के रूप में जारी की जाती है।
सवाल यह उठता है कि सरकारी उपक्रम आंतरिक संसाधन जुटाकर अपनी पूंजीगत व्यय आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम हैं या नहीं। साथ ही केंद्र को अपने वर्तमान में ठहरे हुए निजीकरण कार्यक्रम पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए। यदि सरकार के लगभग आधे पूंजीगत व्यय की निर्भरता सरकारी उपक्रमों को इक्विटी और ऋण देने पर है, तो एक मजबूत निजीकरण योजना को लागू करने से उसकी पूंजीगत व्यय को अवशोषित करने की क्षमता और जटिल हो सकती है। बड़ी बात यह है कि यह केवल राजस्व व्यय तक सीमित नहीं है, जहां सरकार ने एक वर्ष में जितना खर्च करने का प्रस्ताव रखा है उतना खर्च करने में अपनी अक्षमता उजागर की है। पूंजीगत व्यय के संदर्भ में भी इसी तरह के चिंताजनक प्रश्न उठ सकते हैं और चर्चा का विषय बन सकते हैं।
वर्ष 2025-26 में सरकार 50 से अधिक योजनाओं के लिए उनके बजट आवंटन का 75 फीसदी से अधिक खर्च करने में सक्षम नहीं होगी। इनमें से प्रत्येक का वार्षिक आवंटन 500 करोड़ रुपये से अधिक है। अब तक इस तरह की कम खर्च की समस्याएं उसके पूंजीगत व्यय को परेशान नहीं करतीं। फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रभावी व्यय निगरानी सुनिश्चित करने के लिए एक अधिक व्यापक प्रणाली की आवश्यकता है, ताकि किसी योजना के लिए आवंटित धन का बहुत कम हिस्सा वर्ष के अंत में खजाने में वापस लौटे।