केंद्रीय बजट 2026-27 में लघु व्यवसायों को इक्विटी सहायता प्रदान करने और लघु एवं मध्यम उद्यमों (एसएमई) को चैंपियन बनाने के लिए 10,000 करोड़ रुपये के एसएमई विकास कोष का प्रस्ताव रखा गया है। यह एसएमई क्षेत्र के लिए खुशखबरी है। ऐसे उद्यमों (विशेषकर लघु उद्यमों) को ऋण देने वाले कुछ संस्थान-सूक्ष्म वित्त संस्थान (एमएफआई)-बजट में अपने लिए ऋण गारंटी कोष की मांग कर रहे थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
जुलाई 2021 में सरकार ने एमएफआई के लिए एक क्रेडिट गारंटी फंड लॉन्च किया है, जो छोटे एमएफआई और एनबीसीएफ-एमएफआई को दिए गए ऋण के लिए बैंक और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) जैसे ऋणदाताओं को 75 प्रतिशत तक कवरेज प्रदान करता है। इसका प्रबंधन नैशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी (एनसीजीटीसी) द्वारा किया जाता है। इस फंड का गठन कोविड महामारी के प्रभाव से जूझ रहे सूक्ष्म ऋणधारकों को नकदी का स्तर बनाए रखने और ऋण प्रवाह को बढ़ावा देने के लिए किया गया था। उद्योग जगत को सरकार से एक और ऋण गारंटी कोष के रूप में सहारे की उम्मीद थी क्योंकि वह कठिन दौर से गुजर रहा है।
वित्त वर्ष 2024-25 की जून तिमाही में, सूक्ष्म वित्त पोर्टफोलियो 4,26,619 करोड़ रुपये के साथ अपने चरम पर था। इक्विफैक्स क्रेडिट इन्फॉर्मेशन सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के अनुसार, छह तिमाही बाद, दिसंबर 2025 में सूक्ष्म ऋण में 25 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई, जो 3,21,570 करोड़ रुपये का था।
इस अवधि के दौरान, सक्रिय ऋण खातों की संख्या में 31 फीसदी की गिरावट आई और यह 15.6 करोड़ से घटकर 10.74 करोड़ पर आ गई है। साथ ही, ऋणधारकों (डिफॉल्टरों सहित) की संख्या 8.7 करोड़ से घटकर 6.9 करोड़ रह गई है।
सूक्ष्म ऋण लेने वालों की संख्या में अग्रणी पांच राज्यों में से बिहार में यह संख्या 113.40 लाख से घटकर 91.5 लाख, उत्तर प्रदेश में 89.92 लाख से घटकर 80.12 लाख, पश्चिम बंगाल में 69.16 लाख से घटकर 61.51 लाख और कर्नाटक में 62.8 लाख से घटकर 54.68 लाख रह गई है।
दिसंबर 2025 में सितंबर तिमाही की तुलना में पोर्टफोलियो में 6.02 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। दिसंबर 2024 से दिसंबर 2025 तक यह गिरावट 16.34 फीसदी रही। वहीं, दिसंबर 2025 में सक्रिय खातों की संख्या में तिमाही 8.52 फीसदी और सालाना 22.89 फीसदी की कमी आई।
ऋण परिसंपत्तियों की गुणवत्ता के मामले में, एमएफआई-एनबीएफसी की स्थिति एनबीएफसी से बदतर है। उदाहरण के लिए, दिसंबर 2025 में एनबीएफसी का 2.6 फीसदी ऋण 30 दिन से अधिक समय से बकाया था (वे उधारकर्ता जो 30 दिन से अधिक समय से ऋण चुकाने में असमर्थ रहे हैं), जबकि एमएफआई-एनबीएफसी का इस तरह का बकाया 3.5 फीसदी था। इसी तरह, 90 दिन से अधिक समय से बकाया ऋण की श्रेणी में, एनबीएफसी का 1.6 फीसदी ऋण जबकि एमएफआई-एनबीएफसी का 2.1 फीसदी ऋण बकाया था।
हालांकि, आंकड़ों से संकेत मिलता है कि उद्योग के लिए सबसे बुरा दौर शायद बीत चुका है। उदाहरण के लिए, दिसंबर में ऋण वितरण में वार्षिक आधार पर 5.82 फीसदी की गिरावट आई, लेकिन तिमाही आधार पर इसमें 7.76 फीसदी की वृद्धि हुई। इसी तरह, दिसंबर में 30 दिन से अधिक समय से बकाया ऋण का हिस्सा 3.9 फीसदी था, जो तिमाही आधार पर 136 आधार अंक और वार्षिक आधार पर 302 आधार अंक कम है।
फिर भी, जमीनी हकीकत बेहद भयावह है। यह सच है कि केवल कुछ छोटे एमएफआई ही बंद हुए हैं, लेकिन कई बैंक ऋण अदायगी में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। कुछ तो ऋण चुकाने में विफल भी हो गए हैं।
संकट की आशंका को भांपते हुए, बैंकिंग उद्योग ने अधिकांश सूक्ष्म ऋणदाताओं के लिए धन की आपूर्ति रोक दी है। जब धन की कमी होती है, तो एमएफआई अपने ऋण दायरे का विस्तार नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें पहले अपने ऋणदाताओं का बकाया चुकाना होता है। इसका एक दुष्चक्र शुरू हो जाता है। जब नए ऋण वितरित नहीं किए जाते, तो मौजूदा उधारकर्ता भी ऋण चुकाने में आनाकानी करते हैं। और, जैसे-जैसे ऋण दायरा घटता है, प्रतिशत के हिसाब से ज्यादा कर्ज फंसता जाता है।
सूक्ष्म वित्त उद्योग कोई पहली बार संकट का सामना नहीं कर रहा। जबरन ऋण वसूली से निपटने के लिए आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा अक्टूबर 2010 में जारी अध्यादेश ने इस क्षेत्र में गंभीर संकट पैदा कर दिया था। बड़े पैमाने पर ऋण डिफॉल्ट हुए और सूक्ष्म वित्त उद्योग में भारी गिरावट आई। कोविड महामारी से ठीक पहले, असम में बड़ी संख्या में उधारकर्ताओं ने ऋण चुकाने से इनकार कर दिया था , उनका कहना था कि सूक्ष्म वित्त संस्थान उन्हें बहुत ज्यादा ब्याज दरों पर अत्यधिक ऋण लेने के लिए मजबूर कर रहे थे।
अप्रैल 2022 में, असम संकट के बाद, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने सूक्ष्म वित्त संस्थानों के लिए ब्याज दर की सीमा हटा दी। इसका उद्देश्य प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना और बाज़ार को ब्याज दरें तय करने देना था। इस अवसर का भरपूर लाभ उठाते हुए, लगभग सभी सूक्ष्म ऋणदाताओं ने ब्याज दरें काफी बढ़ा दीं। वे कोविड महामारी के दौरान हुए नुकसान की भरपाई करना चाहते थे। नियामक की बार-बार चेतावनी के बावजूद, अधिकांश संस्थाओं ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
इनमें से कई कंपनियां कर्जदार की चुकाने की क्षमता का आकलन किए बिना ही आक्रामक तरीके से कर्ज बांट रही हैं। स्थिति को और जटिल बनाने के लिए, कई लोन ऐप भी बाजार में आ गए हैं। क्रेडिट सूचना ब्यूरो इन ऐप के माध्यम से दिए गए लोन का रिकॉर्ड हमेशा नहीं रख पाता है।
आरबीआई ने हस्तक्षेप करते हुए एमएफआई को कुल ऋण के 40 फीसदी तक गैर-सूक्ष्म ऋण देने की अनुमति दी (पहले यह सीमा 25 फीसदी थी) ताकि ऋण पोर्टफोलियो में विविधता लाई जा सके। दो स्व-नियामक निकायों ने भी अत्यधिक ऋणग्रस्तता को नियंत्रित करने के लिए नियम बनाए हैं, जिनमें ग्राहक की उधार लेने की सीमा निर्धारित की गई है। ग्राहकों के ऋण को अधिकतम तीन एमएफआई तक सीमित रखने और किसी परिवार के कुल ऋण को 2 लाख रुपये तक सीमित करने के बावजूद नुकसान तो हो ही चुका है।
आज, कम से कम एक यूनिवर्सल बैंक और कुछ लघु वित्त बैंक अपनी बैलेंस शीट को पुनर्गठित कर रहे हैं और अधिक सुरक्षित ऋण की ओर रुख कर रहे हैं। विशुद्ध रूप से एनबीएफसी भी सुरक्षित ऋण पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं और बिना गिरवी के छोटे ऋण में अपनी भागीदारी सीमित कर रहे हैं।
कुछ एमएफआई अब बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट के रूप में काम कर रहे हैं। वे अपने बही-खातों में ऋण दर्ज करने के बजाय, बैंकों की ओर से कमीशन के बदले ऋण वितरित करने और वसूलने का काम कर रहे हैं। वे अधिक सुरक्षित ऋण की तलाश में भी हैं जिनमें से एक योजना सोने के बदले ऋण देने की है।
भारत का सूक्ष्मवित्त क्षेत्र एक महत्त्वपूर्ण मोड़ पर है। यह एक नए मॉडल की खोज कर रहा है। इस बीच, उद्योग ने सरकारी सहायता की उम्मीद नहीं छोड़ी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, स्थायी वित्त समिति ने एमएफआई को समर्थन देने के लिए 8,000 करोड़ रुपये की ऋण गारंटी योजना को मंजूरी दे दी है। यह योजना केंद्रीय बजट से बाहर बनाई जा रही है। इससे बैंकों को छोटे एमएफआई के लिए ऋण उपलब्ध कराने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। पहले की तरह, यह योजना भी एनसीजीटीसी के माध्यम से चलाई जा सकती है। अगर ऐसा होता भी है, तो भी शायद बहुत देर हो चुकी है।