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अतार्किक विकल्प: म्युचुअल फंड की जोखिम जांच कितनी उपयोगी?

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SEBI ने म्युचुअल फंडों को स्मॉल एवं मिडकैप फंडों के लिए जोखिम जांच (स्ट्रेस टेस्ट) शुरू करने और इसका नतीजा प्रकाशित करने का भी निर्देश दिया।

Last Updated- April 29, 2024 | 9:44 PM IST
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इस वर्ष के शुरू में बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने म्युचुअल फंडों को उनकी योजनाओं में रकम का अंधाधुंध प्रवाह नियंत्रित करने एवं पोर्टफोलियो में बदलाव करने के निर्देश दिए थे।

नियामक ने यह निर्देश इसलिए दिया था कि बेरोक-टोक निवेश आने से बाजार में अनिश्चितता बढ़ जाती है। एक साल तक स्मॉलकैप फंडों (Small cap funds) में भारी भरकम निवेश से बाजार नियामक चिंतित हो गया था और इसी वजह से फंड कंपनियों को ये निर्देश जारी किए गए।

सेबी ने म्युचुअल फंडों को स्मॉल एवं मिडकैप फंडों के लिए जोखिम जांच (स्ट्रेस टेस्ट) शुरू करने और इसका नतीजा प्रकाशित करने का भी निर्देश दिया। जोखिम जांच में तरलता (शेयरों का लेनदेन), अनिश्चितता, मूल्यांकन और पोर्टफोलियो टर्नओवर (पोर्टफोलियो में शेयर खरीदने या बेचने की रफ्तार) आदि आते हैं।

सेबी ने फंड कंपनियों को दिशानिर्देश, सिद्धांत एवं विधियां सरल भाषा में बताने के लिए कहा ताकि निवेशकों को जोखिमों को ठीक ढंग से समझने में कोई परेशानी नहीं आए। संक्षेप में कहें तो इस जोखिम जांच का मकसद यह पता लगाना था कि स्मॉलकैप और मिडकैप पोर्टफोलियो को 25 प्रतिशत और 50 प्रतिशत हिस्सा बेचने में कितने दिन लग सकते हैं।

रकम का प्रवाह नियंत्रित करना प्रत्यक्ष रूप से बाजार में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना है (रकम आने से शेयरों में तेजी आती है और रकम तब आती है जब बाजार में धारणा एवं आय मजबूत रहती है) मगर जोखिम जांच एक अलग मसला है।

सेबी ने जोखिम जांच कराने के जो निर्देश दिए हैं उसके साथ तीन समस्याएं हैं। सबसे पहले जोखिम जांच तर्कसंगत नहीं लगती है। यह मान लिया गया है कि चढ़ते बाजार में होने वाले लेनदेन की दर गिरते बाजार में भी कम नहीं होगी। मगर बाजार में लेनदेन नाटकीय ढंग से बढ़ या घट सकते हैं। ऊपर चढ़ते बाजार में कई खरीदार और बिकवाल होते हैं। मगर जोखिम बढ़ने की स्थिति में खरीदार नहीं मिलते हैं और केवल बिकवाल ही चारों तरफ नजर आते हैं।

कारोबार बिल्कुल नदारद रहता है। पोर्टफोलियो का 50 प्रतिशत या 25 प्रतिशत हिस्सा बेचने में कितने दिन लगेंगे यह बात बाजार के हालात पर निर्भर करेगी। ऐसे में अगर किसी धुरंधर पोर्टफोलियो प्रबंधक ने जोखिम जांच को ‘फिजूल’ कहा है तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

जोखिम जांच में उन विकट परिस्थितियों पर विचार नहीं किया गया है जब बाजार में अफरातफरी, असमंजस, एक दूसरे की देखादेखी और बिना सोच-विचार के निर्णय लेने का दौर शुरू हो जाता है। बड़ा से बड़ा माहिर कारोबारी भी इन परिस्थितियों में उलझ कर रह जाता है।

दूसरी अहम बात यह है कि कोई निवेशक पोर्टफोलियो का एक हिस्सा बेचने में लगने वाले समय, स्टैंडर्ड डिविएशन, बीटा, पोर्टफोलियो टर्नओवर और प्राइस-टू-अर्निंग अनुपात जैसे मानकों को कैसे समझ पाएगा? वह यह कैसे तय करेगा कि प्रतिकूल मानकों वाले फंड से निकलकर एक बेहतर फंड में कैसे निवेश ले जाएं?

उदाहरण के लिए किसी फंड में कम मूल्यांकन वाले शेयर हो सकते हैं (जो तेजी से गिरते बाजार मे कम फिसलते हैं) मगर इन्हें बेचने में लंबा समय लगता है। ऐसे में कोई निवेशक पहले फंड की खूबियों की तुलना दूसरे फंड की खामियों से कैसे करेगा? उस स्थिति में निवेशकों को अन्य मानकों जैसे स्टैंडर्ड डिविएशन, पोर्टफोलियो बीटा और टर्नओवर रेश्यो पर विचार करना होगा।

क्या इन सभी मानकों को महत्त्व देने और सभी फंडों को बराबर तरजीह देने और कुल स्कोर की गणना करने के बाद रैंकिंग तैयार करने की जरूरत नहीं है? अगर यह सब करना बहुत पेचीदा लगता है तो फिर इन मानकों का किस तरह बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है?

क्या मैं वाकई जोखिम जांच के नतीजों के आधार पर फंडों की रैंकिंग कर सकता हूं? क्या इन मानकों पर अधिक स्कोर करने वाले फंड जोखिम समायोजित अधिक प्रतिफल देंगे? मैं यह कैसे जान पाऊंगा? क्या किसी ने यह परखने की कोशिश की है कि ये जोखिम जांच निवेश से संबंधित निर्णय लेने में कितने मददगार हैं?

अगर हम केवल एक महत्त्वपूर्ण कारक- पोर्टफोलियो का एक हिस्सा बेचने में लगने वाला समय- पर ध्यान केंद्रित करें तो उस स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए जब मैं सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) में दीर्घ अवधि के लिए निवेश कर रहा हूं? स्मॉलकैप शेयरों में 82 प्रतिशत निवेश रखने वाले एसबीआई म्युचुअल फंड को अपने पोर्टफोलियो का 50 प्रतिशत हिस्सा बेचने में 58 दिन का समय लेगा मगर स्मॉलकैप में 83 प्रतिशत तक निवेश रखने वाला यूटीआई स्मॉलकैप फंड को केवल पांच दिनों का समय लेगा।

दोनों में अंतर (हिस्सेदारी बेचने में लगने वाले समय में) इतना अधिक है कि यह तर्कसंगत नहीं लगता है (स्रोतः एसोसिएशन ऑफ म्युचुअल फंड्स ऑफ इंडिया की वेबसाइट)।

तीसरी बात यह है कि सेबी उन शेयरों को स्मॉलकैप मानता है जिनका बाजार मूल्य 5,000 करोड़ रुपये से कम होता है। कई क्षेत्र और कई शेयरों ने बाजार की मौजूदा तेजी में डुबकी लगाई है। सरसरी निगाह डालने से पता चलता है कि 3,898 ऐसी कंपनियां हैं जिनका बाजार मूल्य 5,000 करोड़ रुपये से कम है और केवल 688 कंपनियां हैं जिनका मूल्य इससे अधिक है।

इसका मतलब तो यह हुआ कि बाजार में 85 प्रतिशत शेयर स्मॉलकैप के रूप में परिभाषित किए गए हैं। यह सभी शेयरों को एक ही तराजू में तौलने के समान है जिसके खतरनाक परिणाम सामने आ सकते हैं। मेरा मानना है कि शेयरों को मौजूदा तीन श्रेणियों में विभाजित (लार्ज, मिड और स्मॉल) करना पर्याप्त नहीं है। हमें शेयरों को कम से कम पांच श्रेणियों में विभाजित करना चाहिए।

चौथी बात यह है कि जोखिम जांच उन कारकों पर बहुत अधिक जोर देते हैं जो फंड प्रबंधक के लिए विशेष मायने नहीं रखते हैं। शेयरों के चयन की कई विधियां होती हैं मगर सबसे लोकप्रिय विधि वह होती है जिसमें तार्किक मूल्यांकन पर दीर्घ अवधि की संभावनाओं वाले शेयर चुने जाते हैं। ऐसे शेयर अक्सर स्मॉल एवं मिडकैप श्रेणियों में पाए जाते हैं। इन शेयरों का चयन आसान नहीं है, खासकर बाजार में तेजी के दौरान ऐसा करना मुश्किल है। क्या अगर ऐसे शेयरों के लेनदेन कम होंगे तो फंड प्रबंधक इनकी अनदेखी कर देगा? बिल्कुल नहीं।

मगर अब जोखिम जांच के तहत ऐसे शेयर का चयन तरलता के मानकों को नुकसान पहुंचाएगा। इन सभी बातों पर विचार करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि जोखिम जांच का पूरा ताना-बाना कमजोर बुनियाद पर खड़ा है। किसी योजना में निवेश से संबंधित वैधानिक चेतावनी की तरह जोखिम जांच भी औपचारिकता बन कर रह जाएगी। इस चेतावनी का सैद्धांतिक महत्त्व है तो है मगर बहुत व्यावहारिक नहीं है।

(लेखक डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट मनीलाइफ डॉट इन के संपादक हैं और मनीलाइफ फाउंडेशन के न्यासी हैं)

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First Published - April 29, 2024 | 9:38 PM IST

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