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जमीनी हकीकत: स्वास्थ्य के लिए तीन तरफा चुनौतियां

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अनुमानों के अनुसार एंटीबायोटिक के बेअसर रहने से 2019 में लगभग 50 लाख लोगों की जान चली गई।

Last Updated- October 02, 2023 | 8:34 PM IST
medicines

स्वास्थ्य के समक्ष गंभीर खतरा पैदा होने पर बचाव के लिए लोग प्रायः प्रतिजैविक (एंटीबायोटिक) लेते हैं। मगर अब ऐसी दवाएं हमें बीमार करने वाले रोगाणुओं को मारने में निष्प्रभावी साबित हो रही हैं। यह स्थिति एंटीबायोटिक के आवश्यकता से अधिक एवं गैर-जरूरी इस्तेमाल के कारण उत्पन्न हुई है। यह स्थिति रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस) कहलाती है और तब उत्पन्न होती है जब रोगाणु एंटीबायोटिक के खिलाफ प्रतिरोध क्षमता विकसित कर लेते हैं। एएमआर अब लोगों की जान के लिए खतरा बन गया है। अनुमानों के अनुसार एंटीबायोटिक के बेअसर रहने से 2019 में लगभग 50 लाख लोगों की जान चली गई।

मामला यहीं खत्म नहीं होता है। हम दवाओं के मौजूदा भंडार का भी संरक्षण नहीं कर रहे हैं और नए एंटीबायोटिक भी कम हो गए हैं या एक तरह से आने बंद हो गए हैं। इन दवाओं पर शोध, इनके विकास एवं खोज के कारोबार से जुड़ी कंपनियां अब धीरे-धीरे कन्नी काट रही हैं। यह स्थिति लगातार बनी रही तो इसका अर्थ यह होगा कि आने वाले समय में हम तीन तरफा मुश्किलों में घिर जाएंगे।

पहली मुश्किल तो यह खड़ी होगी कि जिन एंटीबायोटिक का हम इस समय इस्तेमाल कर रहे हैं वे निष्प्रभावी हो जाएंगे, दूसरी मुश्किल यह होगी कि नए एंटीबायोटिक उपलब्ध नहीं रहेंगे और तीसरी मुश्किल यह कि सभी लोगों के लिए इन दवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करने की आवश्यकता अत्यंत बढ़ जाएगी। यह हमारे स्वास्थ्य के लिए विषम एवं आपात आपात स्थिति होगी और संभवतः दुनिया ने अब तक जितनी मुश्किलें देखी हैं उनमें सर्वाधिक गंभीर होगी।

1940 के दशक में दूसरे विश्व युद्ध के बाद पेनिसिलिन का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हुआ था। पेनिसिलिन पहली एंटीबायोटिक दवा है जिसकी खोज 1928 में हुई थी। उसके बाद से इन दवाओं पर दुनिया की निर्भरता काफी बढ़ गई। बाद के दशकों में और कई खोजें हुईं। मगर 1980 के दशक में आकर ये सभी बंद हो गईं। उसके बाद रोगाणुओं से लड़ने वाले नोवेल एंटीबायोटिक (नए प्रकार के एंटीबायोटिक) खोजने के बजाय एक ही श्रेणी की दवाएं थोड़े बहुत बदलाव के साथ तैयार होने लगीं। इनके खिलाफ बैक्टीरिया आसानी से प्रतिरोध क्षमता विकसित कर सकते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के शब्दों में ‘प्रायोरिटी पैथोजेन्स’ के कारण यह समस्या गहरा गई है। अधिकांश ‘प्रायोरिटी पैथोजेन्स’ (एंटीबायोटिक के खिलाफ प्रतिरोध क्षमता विकसित करने वाले रोगाणुओं की सूची। इन रोगाणुओं की काट ढ़ूढ़ना एंटीबायोटिक विकास की शीर्ष प्राथमिकता है) ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया होते हैं, जिनकी कोशिका भित्ति (सेल वॉल) पेचीदा होती है और वे दुनिया में न्यूमोनिया सहित गंभीर संक्रमण पैदा करते हैं। इन ‘प्रायोरिटी पैथोजेन्स’ से निपटने के लिए हमें नई श्रेणी के एंटीबायोटिक और उन्हें पूरी दुनिया में उपलब्ध कराने की जरूरत है। उन लोगों तक भी इन्हें उपलब्ध कराने की जरूरत है, जो नई दवाओं के लिए अधिक रकम खर्च की क्षमता नहीं रखते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने विकास के विभिन्न चरणों में एंटीमाइक्रोबियल एजेंट पर अपने सालाना अध्ययन में कहा है कि पिछले पांच वर्षों के दौरान विकसित 12 एंटीबायोटिक में केवल दो ही नए माने जा सकते हैं और उनमें भी केवल एक ‘क्रिटिकल’ प्रायोरिटी एजेंट को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
डब्ल्यूएचओ के प्रायोरिटी पैथोजेन्स को तीन उप श्रेणियों ‘क्रिटिकल’, ‘हाई’ एवं ‘मीडियम’ में वर्गीकृत किया गया है।

इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि इन दवाओं के आने सिलसिला थम रहा है और वह भी बहुत तेजी से। पिछले कुछ वर्षों के दौरान केवल एक या दो एंटीबायोटिक आवेदन के चरण तक पहुंच पाए हैं। भविष्य तो इससे भी अधिक अंधकारमय लग रहा है। नैदानिक परीक्षण (क्लिनिकल ट्रायल) के तीसरे चरण में केवल नौ नई दवाएं आ पाई हैं। क्लिनिकल ट्रायल के तीसरे चरण से गुजरने के बाद ही किसी दवा के इस्तेमाल की अनुमति मिलती है। इनमें ज्यादातर ‘क्रिटिकल’ प्रायोरिटी पैथोजेन्स को मारने या उनका प्रसास रोकने में सक्षम नहीं हैं।

इसका यह मतलब नहीं है कि नए एंटीबायोटिक पर शोध बिल्कुल ही बंद हो गए हैं। फिलहाल 217 विकल्प मौजूद हैं जो रोगाणुओं के खिलाफ प्रभावी हो सकते हैं मगर ये अभी नैदानिक चरण तक नहीं पहुंचे हैं। मगर इनका विकास बड़ी दवा कंपनियां नहीं कर रही हैं बल्कि विश्वविद्यालयों और छोटी कंपनियों में हो रहा है। डब्ल्यएचओ के अनुसार 80 प्रतिशत से अधिक प्री-क्लिनिकल नोवेल दवाएं छोटी कंपनियों में विकसित हो रही हैं, जिनमें 50 से भी कम कर्मचारी हैं। मगर जब इसके बाद दवाएं अगले चरणों में पहुंचती हैं तो इनके विकास पर लागत बढ़ जाती है और नए प्रयोग वहीं थम जाते हैं।

आखिर, बड़ी दवा कंपनियां शोध एवं विकास में क्यों निवेश नहीं कर रही हैं या नए प्रयोग छोटी कंपनियों से लेकर बड़े बाजारों में क्यों नहीं ले जा रही हैं? सबसे बड़ा सवाल है कि बड़ी दवा कंपनियां एंटीबायोटिक कारोबार से क्यों निकल रही हैं? इसके कारण आर्थिक एवं नैतिक दोनों हैं।

दवा कंपनियों का कहना है कि एंटीबायोटिक के विकास पर अधिक खर्च होता है और इनके साथ कई जोखिम भी जुड़े हैं। मगर वास्तविक कारण यह है कि कैंसर या मधुमेह जैसी बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल दवाओं में काफी अधिक मुनाफा होता है। उन दवाओं पर शोध करने और बाजार में लाने पर और भी मुनाफा होता है जो ‘ऑर्फन डिजीज’ के इलाज में इस्तेमाल होती हैं। ‘ऑर्फन डिजीज’ वे बीमारियां होती हैं, जिनसे केवल कुछेक लाख लोग प्रभावित होते हैं मगर इनके इलाज की दवाएं महंगी होती हैं। नैतिक विषय यह है कि कंपनियां ऐसे समय में एंटीबायोटिक कारोबार से निकल रही हैं जब उनके पास पूंजी या मुनाफे की कोई कमी नहीं है।

यह स्थिति बड़े उपायों मांग करती है। एंटीबायोटिक दवाओं दो आवश्यक कारणों से परिभाषित होती हैं। पहली बात, इनका इस्तेमाल सीमित रखना होता है। इनका बेजा एवं जरूरत से अधिक इस्तेमाल रोगाणुरोधी प्रतिरोध की समस्या खड़ी कर रहा है। इन जीवन रक्षक दवाओं का अवश्य संरक्षण एवं सीमित इस्तेमाल होना चाहिए। दूसरी बात, यह है कि इन दवाओं तक पहुंच सुनिश्चित की जाना चाहिए। इसका आशय यह है कि इन दवाओं की कीमतें लोगों की पहुंच में होनी चाहिए।

लिहाजा, अब समय आ गया है जब एंटीबायोटिक दवाओं को वैश्विक स्तर पर सार्वजनिक भलाई के साधन के रूप में देखा जाना चाहिए। इससे दवा कंपनियों के मुनाफे पर नए कर लगेंगे और ऐसी परिस्थितियां बनेंगी जिनसे सार्वजनिक शोध सभी लोगों के हित में काम आएंगे। बाजार भले ही विफल हो जाए मगर हम इस मुहिम में विफल नहीं हो सकते हैं।

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First Published - October 2, 2023 | 8:34 PM IST

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