facebookmetapixel
Advertisement
भारतीय ब्लैक टाइगर झींगे ने की रिकॉर्ड वापसी, 5 साल में 4 गुना बढ़ा निर्यात; कमाई ₹4,974 करोड़ के पारमुंबई में बारिश का कहर: 13 की मौत, ₹1,000 करोड़ से ज्यादा का आर्थिक नुकसान, जनजीवन अस्त-व्यस्तऑफिस मार्केट में रिकॉर्ड तेजी: दूसरी तिमाही में 2.46 करोड़ वर्ग फुट की सबसे अधिक लीजिंगजून में हुई गाड़ियों की रिकॉर्ड तोड़ बिक्री, 22% की भारी बढ़त के साथ बिके 25 लाख वाहनभारतीय कंपनियां AI सेक्टर में विलय-अधिग्रहण पर सतर्क हैं: आलोक शाहBEML का मेगा प्लान: R&D खर्च 150% बढ़ाया, विनिर्माण के साथ अब टेक्नोलॉजी कंपनी बनने की तैयारीइफ्को-टोक्यो की तर्ज पर देश में जल्द बनेगी सहकारी जीवन बीमा कंपनी, अमित शाह ने किया ऐलानसिटीमॉल का दांव: तेज डिलिवरी नहीं, कम कीमत से जीतेगा भारत का अगला ई-कॉमर्स बाजार16वें वित्त आयोग ने खत्म की पुरानी परंपरा, राज्यों का अलग GSDP अनुमान नहीं किया जारी; प्रदेश सरकारों की बढ़ी टेंशन‘भुला दिए जाने के अधिकार’ पर नई बहस: क्या AI भी सीखी हुई निजी जानकारी भूल सकता है?

Editorial: जलवायु परिवर्तन को लेकर तेज करने होंगे प्रयास

Advertisement

दुनिया में ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) का उत्सर्जन अब भी वैश्विक तापमान में वृद्धि 2 डिग्री से नीचे रखने के लिए जरूरी मात्रा से कहीं अधिक हो रहा है।

Last Updated- November 27, 2023 | 11:27 PM IST
COP28

संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन के निकाय कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (COP) की दुबई में प्रस्तावित 28वीं बैठक से पहले संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने उत्सर्जन अंतर रिपोर्ट जारी की है।

दुबई में आयोजित होने वाले इस सम्मेलन का इसलिए भी विशेष महत्त्व है कि यह विभिन्न देशों के लिए यह आकलन करने का अवसर है कि पेरिस समझौता, 2015 के अंतर्गत तय लक्ष्यों की पूर्ति की दिशा में दुनिया ने कितनी प्रगति की है। परंतु, यह आकलन स्वयं अपने आप में दुनिया के बीच आपसी सहमति से तैयार दस्तावेज प्रतिबिंब ही होगा। इस सम्मेलन में, विशेषकर, उन लक्ष्यों की वर्तमान उपयोगिता पर संभवतः चर्चा नहीं हो पाएगी।

उत्सर्जन अंतर रिपोर्ट में इस महत्त्वपूर्ण बिंदु पर ध्यान आकृष्ट किया गया है कि दुनिया में ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) का उत्सर्जन अब भी वैश्विक तापमान में वृद्धि 2 डिग्री से नीचे रखने के लिए जरूरी मात्रा से कहीं अधिक हो रहा है।

रिपोर्ट में विशेष रूप से इस बात की चर्चा की गई है कि ‘वैश्विक तापमान में वृद्धि 2 डिग्री और 1.5 डिग्री से कम रखने के लक्ष्य तक कम से कम खर्च में पहुंचने के लिए वैश्विक स्तर पर जीएचजी के उत्सर्जन में क्रमशः 28 प्रतिशत और 42 प्रतिशत की कमी आवश्यक है।’

पेरिस समझौते में यह सहमति बनी थी कि दुनिया का प्रत्येक देश- राष्ट्र निर्धारित योगदान (एनडीसी) को उत्सर्जन में कमी के वैश्विक प्रयासों के अनुरूप आगे बढ़ाएगा। परंतु, इन बातों का निर्णय देशों पर छोड़ दिया गया है और इस दृष्टिकोण से पेरिस समझौता मात्र एक समझौता ही है, न कि संधि। अधिकांश मामलों में एनडीसी इस बात को उचित महत्त्व नहीं दे पाता है कि कौन से लक्ष्य हासिल हो सकते हैं और कौन आवश्यक हैं।

दुनिया के देशों द्वारा हालात के आकलन में इन एनडीसी के अगले चरण के बारे में सूचित किया जाएगा। अनुमान है कि दुनिया के देश 2025 तक एनडीसी सौंप देंगे। यह मालूम होने के बाद कि उत्सर्जन कम करने में दुनिया के देशों ने कितनी प्रगति की है और कौन से उपाय और किए जाने की आवश्यकता है, आशा की जा रही है कि और अधिक महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य तय किए जाएंगे।

हालांकि, उत्सर्जन अंतर रिपोर्ट हालात की समीक्षा की तुलना में आंखें खोलने वाली हो सकती है। रिपोर्ट में स्पष्ट कर दिया गया है कि एनडीसी को अगर अद्यतन नहीं किया गया तो यह सर्वाधिक संभावित परिस्थितियों में 2035 तक वास्तविक एवं इच्छित उत्सर्जन में अंतर बढ़ा देगा। इस अंतर को पाटना गणितीय रूप में मुश्किल होगा। इस तरह, वर्तमान और 2030 के बीच की अवधि अति महत्त्वपूर्ण है। अगर वर्तमान एनडीसी में सुधार होते हैं तभी दुनिया के देश उन स्तरों तक तापमान में वृद्धि नियंत्रित कर पाएंगे जिनके ऊपर विनाश की शुरुआत हो जाएगी।

लिहाजा, इस कॉप का सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह होगा कि दुनिया के देशों को निकट अवधि में अधिक महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य तय करने के महत्त्व को समझना होगा। इसके अलावा वायुमंडल में पहले से मौजूद जीएचजी से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए वित्त के ढांचे सहित अन्य विषयों पर भी कॉप में चर्चा हो सकती है।

परंतु, अंततः दुनिया के देशों के लिए कॉप आयोजित करने का लक्ष्य इस बात पर सहमति बनाना है कि जलवायु परिवर्तन के खतरे को कैसे टाला जा सकता है। इसके लिए देशों को उत्सर्जन नियंत्रित करने के लिए पूरी निष्ठा के साथ अधिक प्रयास करने होंगे। भारत में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक औसत का आधा है जबकि, रूस और अमेरिका में यह आंकड़ा वैश्विक औसत का दोगुना है।

दूसरी तरफ, यूरोपीय संघ इस दृष्टिकोण से वैश्विक औसत से नीचे है। परंतु, यह निश्चित है कि भविष्य में भारत से हानिकारक गैसों का उत्सर्जन बढ़ेगा। ये उत्सर्जन वैश्विक तापमान में वृद्धि का भविष्य तय करेंगे। भारत को अपनी अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ने के साथ ही कार्बन उत्सर्जन की तीव्रता कम करनी होगी। साथ-साथ उसे टिकाऊ एवं अक्षय ऊर्जा समाधानों की तरफ तेजी से कदम बढ़ाना होगा।

Advertisement
First Published - November 27, 2023 | 10:24 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement