मंदिर में 56 दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान में देश भर के विद्वान एकत्र हुए हैं और रिगवेद, सामवेद एवं यजुर्वेद का सस्वर पाठ किया जा रहा है।
यह अनुष्ठान 14 जनवरी को लक्षदीपम के साथ संपन्न होगा जिसमें एक लाख दीपक जलाये जायेंगे।
मंदिर प्रबंधन सूत्रों ने बताया कि इस अनुष्ठान का आरंभ 18वीं शताब्दी के राजा मार्तंड वर्मा ने किया था। अनुष्ठान के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु और वैदिक विद्वान मंदिर में आते और इसमें भाग लेते हैं तथा भगवान पद्मनाभ की पूजा..अर्चना करते हैं।
मंदिर के प्रशासनिक अधिकारी जयशेखरन नायर ने पीटीआई को बताया, मंदिर में यह अनुष्ठान हर छह साल में आयोजित होता है। विभिन्न मठों के करीब दो सौ वैदिक विद्वान एवं प्राचीन तांत्रिक परिवारों के सदस्य 56 दिन तक चलने वाले इस अनुष्ठान में भाग लेने के लिए मंदिर में आते हैं।
उन्होंने कहा कि कांची कामकोटि पीठ एवं अझवनचेरी मठ के विद्वान भी इस अनुष्ठान में शामिल हो रहे हैं।
नायर ने कहा कि मुराजपम का मतलब होता है कि बारी बारी से मंत्रोच्चार करना। पंरपरा के अनुसार सात बार में वैदिक मंत्रों का उच्चारण होता है और प्रत्येक आवृत्ति सात दिन तक चलती है।
भाषा