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विवादित रक्षा सौदे

संपादकीय /  July 05, 2021

राफेल लड़ाकू विमान सौदे में कथित भ्रष्टाचार को लेकर फ्रांस की न्यायिक जांच से जो बातें सामने आई हैं उनसे हमारे अंतरराष्ट्रीय रक्षा सौदों में बरती जाने वाली अस्पष्टता का प्रश्न एक बार फिर उठ गया है। राफेल विवाद उन अंतरराष्ट्रीय रक्षा खरीद शृंखला में सबसे नया विवाद है जिन पर सवाल उठाए गए हैं। बोफोर्स तोप इस व्यवस्थागत समस्या का कुख्यात उदाहरण है। देश के रक्षा सौदों को लेकर जिस तरह एक के बाद एक विवाद सामने आते रहे हैं उन्हें देखते हुए इन सौदों की प्रक्रिया और इनसे संबंधित रहस्योद्घाटन का नए सिरे से आकलन करने की आवश्यकता है।

राफेल सौदे में ये कमजोरियां नजर आती हैं। दसॉ कंपनी के मझोले और विविध भूमिका वाले विमान को सबसे पहले सन 2012 में पांच यूरोपीय और अमेरिकी प्रतिस्पर्धियों के बीच बोली के माध्यम से चुना गया था। यह चयन तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने किया था। 126 विमानों के इस सौदे पर तत्काल सवाल उठे क्योंकि उस वक्त राफेल का उत्पादन पूरी तरह ठप था। बाद में दसॉ और भारत सरकार के बीच सौदे की शर्तों को लेकर मतभेद हुए और भारत की अगली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार 2015 में सौदे से पीछे हट गई। सन 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 36 राफेल विमानों को 'पूरी तरह तैयार यानी उड़ान की स्थिति में' खरीदने की चर्चा शुरू की। आमतौर पर ऐसे सौदे रक्षा मंत्री करते हैं लेकिन इस मामले में सीधे प्रधानमंत्री ने सौदे की बातचीत की। यह इस सौदे का केवल एक अस्वाभाविक पहलू है। कांग्रेस लगातार कहती आई है कि नया सौदा 126 विमानों के सौदे से भी अधिक कीमतों पर हुआ है। उसने यह सवाल भी उठाया कि ऑफसेट अनुबंध सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के बजाय कारोबारी अनिल अंबानी को क्यों दिया गया।

जिन संस्थागत जांचों के माध्यम से इस सौदे की निष्पक्ष जांच की जा सकती थी उन्होंने भी ठीक से काम नहीं किया। सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दाखिल की गई लेकिन इससे कुछ खास न हो सका क्योंकि सौदे की निर्णय प्रक्रिया को राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए एक सीलबंद लिफाफे में पेश किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी आम जनता के समक्ष इसका ब्योरा देने से इनकार कर दिया जबकि अंतत: जनता के पैसे से ही यह सौदा किया गया था। उसने कहा कि इस खरीद पर संदेह की कोई वजह नहीं। तब रक्षा मंत्री ने भी संसद में कहा कि मोदी का सौदा पुराने सौदे से 9 फीसदी सस्ता था। हालांकि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की एक रिपोर्ट में इसे 2.9 फीसदी सस्ता बताया गया। परंतु इसमें प्रदर्शन मूल्य और वित्तीय गारंटी नहीं प्रदर्शित थी जो दसॉ के लिए बचत थी क्योंकि यह भारत को नहीं दी गई। इसके अलावा 2016 के सौदे में भारत को लेकर कुछ विशिष्ट चीजें जोडऩे की बात थी जो बहुत आवश्यक नहीं थी। भारतीय वायुसेना ने भी इस बात का समर्थन किया था।

चूंकि रिपोर्ट में कीमत का जिक्र नहीं इसलिए भारतीयों के लिए स्वतंत्र मूल्यांकन मुश्किल है। अब तक 21 विमान आ चुके हैं जबकि शेष 2022 में आने हैं। फ्रांस की जांच से कुछ सवालों के जवाब मिल सकते हैं लेकिन भारत के लिए बड़ा मुद्दा यह है कि रक्षा सौदों को लेकर कमजोर बातचीत के कारण देश के सशस्त्र बलों को कमजोरी का सामना करना पड़ रहा है। मसलन, स्कॉर्पियन श्रेणी की पनडुब्बी में उन्नत हथियार नहीं लग सके क्योंकि जिस फर्म को ये हथियार मुहैया कराने थे वह अगस्टा-वेस्टलैंड की सहयोगी थी। अगस्टा- वेस्टलैंड की हेलीकॉप्टर सौदे को लेकर जांच की जा रही थी। पनडुब्बी से हेलीकॉप्टर तक और छोटे हथियार से हवाई रक्षा तंत्र तक हर बड़ा सौदा विवाद में पड़ता है और भारत उन्नत युद्ध के लिहाज से तैयारी में पिछड़ जाता है।

Keyword: रक्षा सौदे, राफेल, लड़ाकू विमान, भ्रष्टाचार, फ्रांस, न्यायिक जांच,
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