सूरत में काम कर रहे कपड़ा मजदूर भले ही अपने अपने गृह प्रदेशों में छुट्टियों का आनंद ले रहे हों, पर उद्योग के लिए उनकी छुट्टियां काफी भारी पड़ रही हैं।
दरअसल, सूरत में काफी संख्या में उत्तर प्रदेश, बिहार और उड़ीसा से कामगार आते हैं जो कपड़ा उद्योग से जुड़ते हैं। ये आमतौर पर होली की छुट्टियों में अपने घरों को लौटते हैं।
इस दफा ऐसे करीब 1.5 लाख कामगार अब तक छुट्टियों से वापस नहीं लौटे हैं और कपड़ा उद्योग के लिए यह खासा मुसीबत बन गया है। एक तो मंदी और ऊपर से कामगारों के छुट्टी पर होने की वजह से सूरत के कपड़ा उद्योग को करीब 10 से 15 फीसदी का नुकसान हुआ है।
उद्योग जगत के सूत्रों ने बताया कि कामगारों के छुट्टी पर जाने का सबसे अधिक प्रभाव बुनाई और इम्ब्रॉयडरी इकाइयों पर पड़ा है। फेडरेशन ऑफ सूरत टेक्सटाइल ट्रेडर्स एसोसिएशन के महासचिव देवकिशन मंघानी ने बताया, ‘आमतौर पर कामगार होली की छुट्टियों में अपने अपने घर जाते हैं। इस बार होली के बाद ही शादी का मौसम भी शुरू हो गया है।
यही वजह है कि कामगारों ने अपनी छुट्टियां बढ़ा ली हैं। सूरत के उद्योग में करीब 8 लाख मजदूर काम करते हैं। ऐसे में अगर एक साथ 1.5 लाख मजदूर छुट्टियों पर हों तो साफ समझ आता है कि इससे कारोबार कितना प्रभावित होगा। हाल के दिनों में कारोबार को करीब 10 से 15 फीसदी तक का नुकसान हुआ है।’
सूरत का कपड़ा उद्योग करीब 30,000 करोड़ रुपये का है और यहां की कपड़ा इकाइयों में तकरीबन 6 लाख करघे और इम्ब्रॉयडरी की करीब 50,000 मशीने हैं। मंघानी ने बताया कि यहां काम करने वाले ज्यादातर कामगार प्रशिक्षित होते हैं। ऐसे में इनके नहीं होने पर अस्थाई मजदूरों को काम पर लगाने से भी कोई फायदा नहीं होता है।
मंघानी ने कहा, ‘एक तरफ ये कामगार लंबी छुट्टी पर हैं और दूसरी ओर इकाइयों को इनके बदले में दूसरे मजदूर नहीं मिल रहे हैं। इन इकाइयों ने बुनाई और इम्ब्रॉयडरी के लिए दूसरे दक्ष कामगारों की तलाश भी की, पर कोई फायदा नहीं हुआ।’
सूत्रों के मुताबिक यहां की इकाइयों में प्रतिदिन 250 करोड़ मीटर ग्रे फैब्रिक का उत्पादन होता है, जबकि भिवांडी से प्रतिदिन करीब 50 करोड़ मीटर कपडा मंगाया जाता है। इन कारखानों में ग्रे फैब्रिक को बेचकर बुनकर इकाइयों को 15-20 रुपये प्रति मीटर का लाभ होता है।