उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल सरकार से प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की उस याचिका पर जवाब मांगा, जिसमें राजनीतिक सलाहकार फर्म आई-पैक के कोलकाता स्थित कार्यालय में तलाशी के दौरान राज्य सरकार और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर बाधा डालने का आरोप लगाया गया है। यह संस्था विधान सभा चुनाव के लिए सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के साथ जुड़ी है। पीठ ने 8 जनवरी की तलाशी से संबंधित सीसीटीवी फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को संरक्षित रखने का भी निर्देश दिया और ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज 3 एफआईआर पर रोक लगा दी।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली के पीठ ने कहा कि याचिका में केंद्रीय अधिकारियों की जांच प्रक्रिया में राज्य की एजेंसियों द्वारा हस्तक्षेप करने के आरोप बेहद गंभीर मामला है। अदालत ने कहा, ‘हमारी राय है कि वर्तमान याचिका में ईडी या अन्य केंद्रीय एजेंसियों द्वारा जांच और राज्य एजेंसियों द्वारा उसमें हस्तक्षेप से संबंधित गंभीर मुद्दा उठाया गया है।’
अदालत ने यह भी कहा, ‘यह सच है कि किसी भी केंद्रीय एजेंसी को किसी भी पार्टी के चुनावी कार्य में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है। लेकिन यदि केंद्रीय एजेंसी किसी गंभीर अपराध की जांच कर रही है, तो सवाल उठता है कि क्या पार्टी गतिविधियों की आड़ में एजेंसियों को अपनी शक्ति का प्रयोग करने से रोका जा सकता है?’
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि कानून के शासन और जांच निकायों के स्वतंत्र कामकाज को सुनिश्चित करने के लिए मामले की जांच की जानी चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत नोटिस जारी करते हुए उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल राज्य, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार, कोलकाता पुलिस आयुक्त मनोज कुमार वर्मा और उपायुक्त प्रियब्रत रॉय से दो सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 3 फरवरी को होगी।
पीठ ने 8 जनवरी की तलाशी से संबंधित सीसीटीवी फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को संरक्षित रखने का भी निर्देश दिया और ईडी अधिकारियों के खिलाफ पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा दर्ज की गई 3 एफआईआर में आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी। ईडी ने अपने अधिकारियों के कथित उत्पीड़न की जांच सीबीआई से कराने की भी मांग की है। एजेंसी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि यह मामला राज्य प्रशासन द्वारा हस्तक्षेप के चौंकाने वाले पैटर्न को दर्शाता है।
उन्होंने आरोप लगाया कि ईडी अधिकारियों को मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम द्वारा प्रदत्त शक्तियों के तहत कार्य करते हुए एक वैध तलाशी करने से रोका गया और कथित तौर पर परिसर से फाइलें और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण हटा दिए गए। उन्होंने तर्क दिया कि इस तरह का आचरण गंभीर आपराधिक कृत्य के समान है और इससे जांच अधिकारियों का मनोबल गिर सकता है।
सॉलिसिटर जनरल ने पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्रीय एजेंसियों के बीच पहले हुए टकरावों का भी उल्लेख किया, जिसमें केंद्रीय जांच ब्यूरो से जुड़ा एक प्रकरण भी शामिल है, ताकि यह तर्क दिया जा सके कि वर्तमान मामला एक के बाद एक घटनाओं की कड़ी का हिस्सा था। उन्होंने कहा कि राज्य के पुलिस अधिकारी वैधानिक रूप से ईडी की सहायता करने के लिए बाध्य थे, लेकिन ऐसा करने के बजाय उन्होंने इसके कामकाज में बाधा डाली।
मुख्यमंत्री की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि यह मामला कलकत्ता उच्च न्यायालय के समक्ष भी रखा जा सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि आई-पैक कार्यालय में तृणमूल कांग्रेस के चुनाव संबंधी गोपनीय डेटा था और ईडी की कार्रवाई चुनावी प्रक्रिया को बाधित करने के लिए की गई। सिब्बल ने इस आरोप का खंडन किया कि दस्तावेजों या उपकरणों को जबरदस्ती हटाया गया।
पश्चिम बंगाल राज्य और पुलिस अधिकारियों की ओर से पेश अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भी प्रारंभिक आपत्तियां उठाते हुए ईडी द्वारा फोरम शॉपिंग का आरोप लगाया और बताया कि उच्च न्यायालय के समक्ष समानांतर कार्यवाही लंबित है। उन्होंने कहा कि तलाशी का काम शांतिपूर्वक हुआ।
यह विवाद इस महीने की शुरुआत में कोयला घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग जांच के संबंध में आई-पैक कार्यालय में तलाशी के दौरान खड़ा हुआ जिसमें ईडी का आरोप है कि तलाशी स्थल पर मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों ने एजेंसी के अधिकारियों को डराया और जांच में बाधा डाली। हालांकि राज्य सरकार ने किसी तरह की बाधा डालने से इनकार किया।