बैंक ऑफ अमेरिका के इंडिया सीईओ एवं कंट्री एग्जीक्यूटिव विक्रम साहू का कहना है कि अमेरिका के इस यूनिवर्सल बैंक के लिए भारत एक रणनीतिक प्राथमिकता है। भारत न केवल इस क्षेत्र में बल्कि वैश्विक स्तर पर बैंक के राजस्व और उसकी लाभप्रदता में महत्त्वपूर्ण योगदान करता है। उन्होंने पिछले दिसंबर में ही अपना पदभार संभाला है। साहू ने मनोजित साहा से बातचीत में विभिन्न मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की…
बतौर सीईओ आपकी तात्कालिक प्राथमिकताएं क्या हैं?
मेरी तात्कालिक प्राथमिकताएं बिल्कुल स्पष्ट हैं कि समुचित वृद्धि के हमारे ढांचे के दायरे में अपनी टीम के साथियों एवं ग्राहकों की सेवा करना। हमारा उद्देश्य ग्राहकों को उस तरह की सेवा प्रदान करना है जिसकी उन्हें जरूरत है और जैसी वे हमसे उम्मीद करते हैं। हम घरेलू ग्राहकों को भारत और विश्व स्तर पर उनकी जरूरतों के अनुरूप सेवाएं प्रदान करते हैं। हम अपने वैश्विक ग्राहकों के लिए भी उतने ही प्रतिबद्ध हैं जो दुनिया भर में हम पर भरोसा करते हैं। जहां तक टीम के साथियों का सवाल है तो भलीभांति जानते हैं कि पर्याप्त प्रतिभा और उनके लिए सही माहौल के बिना कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता है।
पांच साल बाद भारत में बैंक को आप कहां देखना चाहते हैं?
भारत हमारे लिए एक रणनीतिक प्राथमिकता है और हमारी आकांक्षाएं समुचित वृद्धि में निहित हैं। यह बाजार हमारी वैश्विक दृष्टिकोण का अभिन्न अंग है। यहां हम अपनी मौजूदगी और क्षमता दोनों को मजबूत करना जारी रखेंगे। आगे के सफर के लिए हमारी दिशा बिल्कुल स्पष्ट है: भारत वृद्धि के लिए हमारी वैश्विक रणनीति का एक प्रमुख वाहक है और आगे भी रहेगा।
क्या ऐसी कोई खामी है जिसे आप दूर करना चाहते हैं?
हमारे पास दमदार प्लेटफॉर्म है और यह न केवल भारत में बल्कि उन 37 देशों में भी है जहां हम कारोबार करते हैं। ये देश अमेरिका के बाहर हमारे 80 फीसदी वैश्विक जीडीपी को कवर करते हैं। इन बाजारों में हमारी व्यापक मौजूदगी है। मैं जब इन बाजारों में अपने कारोबार के दायरे पर गौर करता हूं तो वह काफी व्यापक और बेहतर तालमेल के साथ दिखता है।
बैंक की अंतरराष्ट्रीय वृद्धि रणनीति में भारत इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है?
भारत बुनियादी तौर पर दो प्रमुख कारणों से हमारी अंतरराष्ट्रीय वृद्धि रणनीति के लिए महत्त्वपूर्ण है। पहला, हम उस ओर रुख करते हैं जहां जीडीपी वृद्धि एवं आर्थिक गतिशीलता होती है और भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। दूसरा, हम वहां जाते हैं जहां ग्राहकों को हमारी जरूरत होती है
क्या भारत और अमेरिका के मौजूदा संबंधों ने कारोबार को प्रभावित किया है?
भारत और अमेरिका के मौजूदा संबंधों का कारोबार पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। दोनों देशों की साझेदारी काफी व्यापक है जो किसी अस्थायी मतभेद से प्रभावित नहीं हो सकती है। मित्रों के बीच कभी-कभी असहमति हो सकती है, लेकिन संबंधों की मजबूती ऐसे पलों में बनी रहती है। जहां तक हमारा सवाल है तो ग्राहकों के साथ जबरदस्त जुड़ाव बरकरार है। भारत में हमें ग्राहकों की दिलचस्पी, गतिविधि अथवा रणनीतिक योजना में कोई कमी नहीं दिख रही है।
मध्यावधि से दीर्घावधि वृद्धि के लिए भारत के परिदृश्य को आप किस प्रकार देखते हैं?
भारत का मध्यावधि से दीर्घावधि वृद्धि परिदृश्य दमदार है और कई ढांचागत कारकों से भरोसा मिलता है। पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण है भारत की मानव पूंजी जो कुशल, महत्त्वाकांक्षी और जनसांख्यिकी लिहाज से अनुकूल है। दूसरा, इसकी संस्थाओं की ताकत से उसे स्थिरता मिलती है। तीसरा, लगातार किए गए सुधारों का स्वरूप भी सकारात्मक रहा है। इसके तहत कारोबारी सुगमता और विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
संसद के शीतकालीन सत्र सहित हालिया विधायी गतिविधियों में सुधार के लिए सरकार की प्रतिबद्धता दिखती है। ये कारक दमदार उपभोग, निवेश की रफ्तार और सार्वजनिक खर्च में तेजी के साथ मिलकर वृद्धि को रफ्तार देने के लिए एक ताकतवर इंजन तैयार करते हैं। हालांकि व्यापार संबंधी प्रतिकूलताएं चुनौतियां पैदा कर सकती है लेकिन दीर्घकालिक पृरिदृश्य दमदार बना हुआ है। हमारे अलावा अन्य वैश्विक कंपनियां भारत की ओर आकर्षित हो रही हैं क्योंकि यहां पैमाना और गति दोनों हैं जो दुनिया में एक दुर्लभ संयोग है।
आईपीओ बाजार के लिए साल 2026 को आप कैसा देखते हैं?
हमें आईपीओ जारी होने अथवा निवेशकों की दिलचस्पी में कोई कमी नहीं दिख रही है। संभावित आईपीओ की स्थिति दमदार है। उद्योग के अनुमानों के अनुसार 190 से अधिक कंपनियां 25 अरब डॉलर से अधिक की रकम जुटाने की योजना बना रही हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मात्रा से अधिक गुणवत्ता की ओर झुकाव दिख रहा है। निर्गम जारी करने वाली कंपनियां बुनियादी बातों यानी प्रशासन, रकम के उपयोग पर स्पष्टता, दीर्घकालिक नकदी प्रवाह, लाभप्रदता आदि पर ध्यान दे रही हैं।
क्या आपको लगता है कि विलय एवं अधिग्रहण की रफ्तार भी बरकरार रहेगी?
भारत में विलय-अधिग्रहण का परिदृश्य दमदार है। हम उम्मीद करते हैं कि 2026 में यह गति जारी रहेगी। उद्योग के अनुमानों के अनुसार, 2025 में विलय-अधिग्रहण का वॉल्यूम एक साल पहले के मुकाबले 81 फीसदी बढ़कर 87 अरब डॉलर हो गया। इसे मुख्य तौर पर रणनीतिक एवं सीमापार सौदों से बल मिला। साल 2026 के लिए संभावित सौदों का परिदृश्य और भी मजबूत दिख रहा है।
विभिन्न क्षेत्रों में इसके लिए निष्पादन एवं इरादे दमदार हैं लेकिन मूल्यांकन का स्तर विचारणीय है। रणनीतिक खरीदारों के लिए, वृद्धि संबंधी रणनीतियां बाजार हिस्सेदारी का विस्तार करने और तकनीकी क्षमताओं का अधिग्रहण करने पर केंद्रित हैं। अनुकूल सरकारी नीतियों द्वारा समर्थित एआई, एसएएएस, स्वास्थ्य सेवा, कंज्यूमर वेलनेस, बैंकिंग और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में जबरदस्त दिलचस्पी दिख रही है। विलय-अधिग्रहण के लिए परिदृश्य सकारात्मक बना हुआ है।
इन्वेस्टमेंट बैंकिंग क्षेत्र में मौजूद अवसरों का फायदा उठाने के लिए आपकी क्या योजना है?
जहां तक बैंक ऑफ अमेरिका का सवाल है तो हमारी ताकत हमारे लोगों में निहित है। हमने भारत में अपनी इन्वेस्टमेंट बैंकिंग और इक्विटी कैपिटल मार्केट क्षमताओं को काफी मजबूत किया है।
भारत में इन्वेस्टमेंट बैंकिंग कारोबार के लिए आप किन बातों से आश्वस्त हैं?
साल 2025 की ही तरह 2026 भी एक दमदार वर्ष बनने जा रहा है। जहां तक इन्वेस्टमेंट बैंकिंग का सवाल है तो उद्योग के अनुमानों के अनुसार, भारत ने पिछले साल बैंकिंग फीस के लिए रिकॉर्ड बनाया जो 1 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर गया। हम उम्मीद करते हैं कि यह दिलचस्पी आगे भी जारी रहेगी।