सर्वोच्च न्यायालय ने आज टाइगर ग्लोबल मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि मॉरीशस की निवेश संस्थाओं के 2018 में फ्लिपकार्ट से बाहर निकलने से होने वाले पूंजीगत लाभ पर भारत में कर लगाया जा सकता है क्योंकि ये लेनदेन अस्वीकार्य रूप से कर चोरी जैसे थे। आयकर विभाग के पक्ष में फैसला देते हुए जस्टिस जेबी पारदीवाला और आर महादेवन के पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के अगस्त 2024 के फैसले को रद्द कर दिया जिसने टाइगर ग्लोबल इंटरनैशनल II, III और IV होल्डिंग्स को संधि के तहत राहत दी थी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया पता चलता है कि निवेश संरचना भारतीय कर से बचने के लिए की बनाई गई थी। अदालत ने कहा, ‘करदाता के लिए कर देनदारी से बचने के लिए अपने लेनदेन की योजना बनाने की कानून में अनुमति है लेकिन एक बार जब तंत्र को अवैध या दिखावटी पाया जाता है तो यह स्वीकार्य बचाव नहीं रह जाता और अस्वीकार्य बचाव या कर चोरी बन जाता है।’
फ्लिपकार्ट से निवेश निकालने का मामला यह मामला 2018 में वॉलमार्ट द्वारा ई-कॉमर्स कंपनी फ्लिपकार्ट में बहुलांश हिस्सेदारी खरीदने और फिर फ्लिपकार्ट से टाइगर ग्लोबल के बाहर निकलने से जुड़ा है। टाइगर ग्लोबल के निवेश को मॉरीशस की संस्थाओं के माध्यम से किया गया था।
करदाताओं ने भारत-मॉरीशस दोहरे कराधान बचाव समझौते के तहत पूंजीगत लाभ कर से छूट का दावा किया। मॉरीशस के अधिकारियों द्वारा जारी किए गए कर निवास प्रमाण पत्रों (टीआरसी) के साथ तर्क दिया गया कि लेनदेन वास्तविक और व्यावसायिक रूप से किए गए थे। हालांकि भारतीय कर अधिकारियों ने संधि लाभों से इनकार कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि मॉरीशस की संस्थाओं में वास्तविक वाणिज्यिक तत्व नहीं था और प्रभावी नियंत्रण तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया मॉरीशस के बाहर थी। कर विभाग ने यह भी तर्क दिया कि सारी कवायद मुख्य रूप से भारतीय कर से बचने के लिए की गई थी।
मॉरीशस में वाणिज्यिक तत्व की कमी का हवाला देते हुए कर अधिकारियों ने टाइगर ग्लोबल के टीआरसी को दरकिनार करते हुए 14,500 करोड़ रुपये (वर्तमान विनिमय दर पर 1.7 अरब डॉलर से अधिक) की मांग की थी।
साल 2020 में एएआर ने टाइगर ग्लोबल के अग्रिम निर्णयों के लिए आवेदनों पर विचार करने से इनकार कर दिया। प्राधिकरण का तर्क था कि लेनदेन पहली नजर में कर बचाव के लिए बनाई गई प्रतीत होती है। एएआर ने कहा कि भारत-मॉरीशस संधि का उद्देश्य गैर-भारतीय कंपनियों में शेयरों के हस्तांतरण से होने वाले पूंजीगत लाभ में छूट देना नहीं था।
दिल्ली उच्च न्यायालय ने बाद में एएआर के आदेश को रद्द कर दिया। उसने कहा कि करदाता संधि के तहत मिलने वाले लाभ के हकदार थे और भारत में उनके लाभ कर योग्य नहीं थे। इसके बाद कर विभाग ने इस फैसले को उच्च्तम न्यायालय में चुनौती दी। कर विभाग की अपील को स्वीकार करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय ने एएआर के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने में गलती की है।
कर विभाग यह जांच करने का हकदार था कि संधि छूट का दावा वैध था या नहीं और क्या व्यवस्था वैध निवेश संरचना के रूप में योग्य है।
पीठ ने कहा, ‘कर विभाग को लेनदेन की जांच करने का अधिकार है ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि छूट के लिए करदाताओं का दावा वैध है या नहीं। रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों से पता चलता है कि व्यवस्था अनुमति लायक कर योजना की नहीं है।’
अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि कर निवास प्रमाण पत्र अकेले संधि लाभों को सुरक्षित करने के लिए पर्याप्त थे। अदालत ने कहा कि संधि संरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता है जहां अंतर्निहित व्यवस्था स्वयं अस्वीकार्य है। फैसले में कहा गया है, ‘एक बार जब यह तथ्यात्मक रूप से पाया जाता है कि सूचीबद्ध इक्विटी शेयरों को कानून के तहत अस्वीकार्य व्यवस्था के अनुसार स्थानांतरित किया गया था तो करदाता दोहरा कराधान निषेध संधि की धारा 13(4) के तहत छूट का दावा करने के हकदार नहीं हैं।’
पीठ ने कर विभाग के इस दृष्टिकोण का भी समर्थन किया कि पूंजीगत लाभ विदेशी कंपनी के शेयरों के हस्तांतरण से हुआ है जिससे लेनदेन संधि प्रावधानों के साथ घरेलू कानून के तहत भारत के कराधान क्षेत्राधिकार के भीतर आता है। एक अलग समवर्ती राय में न्यायमूर्ति पारदीवाला ने इस फैसले को एक व्यापक नीति और भू-राजनीतिक संदर्भ में रखा, जिसमें सीमा पार लेनदेन में कर संप्रभुता के बढ़ते महत्व को रेखांकित किया गया। उन्होंने कहा, ‘आर्थिक संप्रभुता का महत्त्व बढ़ रहा है और भू-राजनीतिक मामले केंद्र में हैं।’ उन्होंने चेतावनी दी कि संधि ढांचे और जटिल विदेशी संरचनाओं का उपयोग किसी राष्ट्र के वैध कराधान अधिकारों को कमजोर करने के लिए नहीं किया जा सकता है।
हालांकि भारत ने निवेश को बढ़ावा देने और दोहरे कराधान को रोकने के लिए कर संधियां की हैं लेकिन ऐसे समझौतों की व्याख्या इस तरह से नहीं की जा सकती है जिससे कृत्रिम व्यवस्थाओं के माध्यम से गैर-कराधान की सुविधा मिले।
सीए फर्म सीएनके में पार्टनर पल्लव प्रद्युम्न नारंग ने कहा, ‘अदालत ने माना है कि कर निवास प्रमाण पत्र होने भर से उस जांच को नहीं रोक सकता है जिसमें दखल देने वाली मॉरिशस की इकाई को एक जरिया दिखाया गया हो। भारत-मॉरिशस दोहरा कराधान निषेध संधि में बदलाव के आधार पर अदालत ने यह माना है कि सधि के लाभ तब नहीं मिलते, जब आय प्राप्ति के ढांचे से पता चलता हो कि यह कर बचाने के लिए किया गया था।
इस फैसले का टाइगर ग्लोबल पर व्यापक वित्तीय प्रभाव पड़ेगा। लगभग 14,500 करोड़ रुपये की मांग फ्लिपकार्ट में बेची गई हिस्सेदारी (1.6 अरब डॉलर) के मूल मूल्य से भी अधिक है क्योंकि आठ वर्षों में ब्याज और जुर्माने जुड़ गए हैं।
वेद जैन ऐंड एसोसिएट्स में पार्टनर अंकित जैन ने कहा, ‘ऐतिहासिक रूप से भारत-सिंगापुर दोहरा कराधान निषेध संधि को मॉरीशस की तुलना में सुरक्षित माना जाता रहा है क्योंकि इसमें लाभों की एक विशिष्ट सीमा शामिल है।’
विलय और अधिग्रहण पर फैसले के प्रभाव के बारे में बात करते हुए शार्दूल अमरचंद मंगलदास ऐंड कंपनी में पार्टनर गौरी पुरी ने कहा, ‘टाइगर ग्लोबल का मामला उन सभी वर्तमान और पूर्व विलय एवं अधिग्रहण सौदों को प्रभावित करेगा जहां कर संधि लाभों का दावा किया गया है। निजी इक्विटी कंपनियों और विदेशी पोर्टफोलिया निवेशकों को अपनी निवेश संरचनाओं को देखने और प्रतिफल पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। कर संधि दावों को लेकर मुकदमेबाजी बढ़ सकती है और कर बीमा बाजार को प्रभावित कर सकती है।’