facebookmetapixel
दूध के साथ फ्लेवर्ड दही फ्री! कहानी क्विक कॉमर्स की जो बना रहा नए ब्रांड्स को सुपरहिटWeather Update Today: उत्तर भारत में ठंड की लहर! IMD ने जारी किया कोहरा-बारिश का अलर्ट67% चढ़ सकता है सिर्फ ₹150 का शेयर, Motilal Oswal ने शुरू की कवरेज; BUY की दी सलाहअमेरिका का सख्त कदम, 13 देशों के लिए $15,000 तक का वीजा बॉन्ड जरूरीवेनेजुएला के तेल उद्योग पर अमेरिका की नजर: ट्रंप बोले- अमेरिकी कंपनियों को मिल सकती है सब्सिडीस्टॉक स्प्लिट का ऐलान: इस रियल्टी कंपनी के शेयर 15 जनवरी से होंगे स्प्लिट, जानें डिटेलStock Market Update: हैवीवेट शेयरों में बिकवाली से बाजार की कमजोर शुरुआत, सेंसेक्स 340 अंक गिरा; निफ्टी 26,200 के पासStocks To Watch Today: ONGC से Adani Power तक, आज बाजार में इन स्टॉक्स पर रहेगी नजरमजबूत फंडामेंटल के साथ शेयर बाजार में बढ़त की उम्मीद, BFSI क्षेत्र सबसे आगे: रमेश मंत्रीअमेरिकी प्रतिबंधों से वेनेजुएला की तेल अर्थव्यवस्था झुलसी, निर्यात पर गहरा असर; भारत का आयात भी घटा

कोबाड गांधी पुस्तक विवाद: महाराष्ट्र सरकार की भाषा सलाहकार समिति के प्रमुख,चार अन्य ने इस्तीफा दिया

Last Updated- December 14, 2022 | 3:43 PM IST

कोबाड गांधी पुस्तक विवाद: महाराष्ट्र सरकार की भाषा सलाहकार समिति के प्रमुख,चार अन्य ने इस्तीफा दिया
PTI / मुंबई  December 14, 2022

14 दिसंबर (भाषा) महाराष्ट्र सरकार द्वारा कथित माओवादी विचारक कोबाड गांधी के संस्मरण के मराठी अनुवाद को दिया गया पुरस्कार वापस लिए जाने के फैसले के विरोध में राज्य की मराठी भाषा समिति के प्रमुख और साहित्य संबंधी बोर्ड के चार सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया है।

कोबाड गांधी की ‘फ्रैक्चर्ड फ्रीडम: ए प्रीजन मेमॉयर’ के मराठी अनुवाद के लिए अनघा लेले को यशवंतराव चव्हाण साहित्य पुरस्कार 2021 देने की छह दिसंबर को घोषणा की गई थी, जिसे सोमवार को राज्य सरकार ने वापस लेने का फैसला करते हुए पुरस्कार चयन समिति को भंग कर दिया।

कोबाड के माओवादियों से कथित संबंध होने के कारण पुरस्कार देने के फैसले की सोशल मीडिया पर आलोचना के बाद सरकार ने यह फैसला किया था।

लेखक एवं राज्य सरकार की भाषा सलाहकार समिति के अध्यक्ष लक्ष्मीकांत देशमुख ने सरकार के फैसले के खिलाफ बुधवार को पद से इस्तीफा देने की घोषणा की।

देशमुख ने विद्यालय शिक्षा एवं मराठी भाषा के मंत्री दीपक केसरकर को लिखे एक पत्र में कहा, ‘‘ महाराष्ट्र में साहित्य पुरस्कार में इतना राजनीतिक हस्तक्षेप कभी नहीं किया गया, केवल 1981 में विनय हार्दिकर की किताब को तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा इसी तरह अस्वीकृत किया गया था और इस कदम की भी काफी आलोचना की गई थी। इस सरकार ने भी एकतरफा फैसला किया है और इसके विरोध में, मैं राज्य सरकार की भाषा सलाहकार समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे रहा हूं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘कोबाड की किताब माओवादियों का समर्थन या उनकी हिंसात्मक कार्रवाईयों को बढ़ावा नहीं देती, लेकिन फिर भी राज्य सरकार ने एकतरफा फैसला किया।’’

महाराष्ट्र कैडर के एक पूर्व आईएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) अधिकारी देशमुख अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

पुरस्कार चयन समिति के तीन सदस्यों डॉ. प्रज्ञा दया पवार, नीरजा और हेरंब कुलकर्णी ने सरकार के फैसले को ‘‘लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का अपमान’’ बताते हुए मंगलवार को राज्य साहित्य एवं संस्कृति बोर्ड से इस्तीफा दे दिया।

ये उस समिति के सदस्य थे, जिसने कोबाड गांधी की ‘फ्रैक्चर्ड फ्रीडम: ए प्रीजन मेमॉयर’ के मराठी अनुवाद के लिए अनघा लेले को यशवंतराव चव्हाण साहित्य पुरस्कार 2021 देने की घोषणा की थी।

बोर्ड के एक और सदस्य विनोद शिरसाठ ने भी बाद में इस्तीफा देने की घोषणा की। शिरसाठ मराठी साप्ताहिक पत्र ‘साधना’ के संपादक हैं।

डॉ. पवार ने अपने बयान में कहा, ‘‘ महाराष्ट्र सरकार का चयन समिति को भंग करने का फैसला एकतरफा है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का अपमान है। मैंने महाराष्ट्र साहित्य एवं संस्कृति बोर्ड से इस्तीफा देने का फैसला किया है।’’

कुलकर्णी ने कहा, ‘‘कोबाड की किताब पर कोई प्रतिबंध नहीं है, तब भी महाराष्ट्र सरकार ने अनुवादित संस्करण को पुरस्कार देने का अपना फैसला वापस ले लिया। सरकार का यह रवैया भविष्य में ऐसी प्रक्रिया का हिस्सा बनने से लोगों को हतोत्साहित करेगा। अगर बोर्ड हमारा समर्थन नहीं कर रहा तो बेहतर यही है कि मैं इस्तीफा दे दूं। कृपया मेरा इस्तीफा स्वीकार करें।’’

नीरजा ने भी इस्तीफे की यही वजह बतायी। उन्होंने कहा, ‘‘अगर बोर्ड हमारे साथ नहीं खड़ा है और हमारा समर्थन नहीं कर रहा है, तो बेहतर यही है कि हम इसकी सदस्यता से इस्तीफा दे दें। मैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करती हूं और मैं सरकार के फैसले से बेहद दुखी हूं।’’

सरकार द्वारा सोमवार को जारी एक बयान के अनुसार, चयन समिति के निर्णय को ‘‘प्रशासनिक कारणों’’ से पलट दिया गया और पुरस्कार (जिसमें एक लाख रुपये की नकद राशि शामिल थी) को वापस ले लिया गया है।

भाषा निहारिका सुभाष

First Published - December 14, 2022 | 10:13 AM IST

संबंधित पोस्ट