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तकनीकी तंत्र: चुनावों में सामान्य नैरेटिव क्यों होते हैं नाकाम

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भारत में 2017 के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के सर्वेक्षण में, केरल में सबसे अधिक 96 प्रतिशत साक्षरता दर दर्ज की गई थी और सबसे कम साक्षरता दर बिहार में 71 प्रतिशत थी।

Last Updated- May 20, 2024 | 11:24 PM IST
'INDIA' alliance decides to boycott programs of 14 anchors, BJP compares it with emergency

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए 2024 के चुनाव अभियान की एक बड़ी चुनौती यह है कि उसे विपक्षी दलों की ओर से प्रधानमंत्री पद का कोई ऐसा दावेदार नहीं मिल रहा है जिसके खिलाफ मोर्चा खोला जा सके। अगर ऐसा होता तब भाजपा को विपक्ष के प्रधानमंत्री पद के दावेदार के खिलाफ जोरदार तरीके से मुहिम छेड़ने में काफी आसानी हो जाती।

वर्ष 2014 से ही भाजपा की लोक सभा की चुनावी रणनीति, एक व्यक्ति पर केंद्रित राष्ट्रपति शैली वाले प्रचार अभियान पर आधारित रही है। यह बेहद सामान्य रणनीति है लेकिन स्टार प्रचारक के होने का फायदा भी पार्टी को मिलता रहा है।

हालांकि पार्टी के पक्ष में यह बात ज्यादा अच्छी होती अगर सामने विपक्ष का कोई कमजोर प्रधानमंत्री उम्मीदवार होता। ऐसे में इस उम्मीदवार को लक्षित करना और तुलनात्मक रूप से कमतर दिखाना भी सरल हो जाता। लेकिन इस चुनाव में ऐसा कोई एक व्यक्ति सामने नहीं हैं जिसे सत्ता पक्ष के मुख्य चेहरे के बरक्स खड़ा कर निशाना साधा जाए।

विपक्ष से जुड़े किसी ऐसे व्यक्ति के अभाव में सत्ता पक्ष के स्टार प्रचारक को मतदाताओं से स्थानीय मुद्दों पर बात करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है, जबकि क्षेत्रीय दल कई स्पष्ट और भावनात्मक तर्क पेश करने में सक्षम हैं।

विपक्ष थोड़ा बेहतर तरीके से ऐसे संगठित है कि कई क्षेत्रीय दल अपने गढ़ में अच्छी टक्कर देने के लिए तैयार हैं और कांग्रेस भी द्विपक्षीय गठबंधन में कनिष्ठ साझेदार बनने के लिए तैयार है। इसी वजह से भाजपा के स्टार प्रचारक को वास्तविक मुद्दों के बजाय अक्सर निजी हमले का सहारा लेना पड़ रहा है।

मिसाल के तौर पर उन्होंने अपमानजनक लहजे में किसी एक राज्य के मुख्यमंत्री के लिए दावा किया कि मुख्यमंत्री को जिले के मुख्यालय का नाम नहीं पता है और दूसरी क्षेत्रीय पार्टी को ‘फर्जी बच्चा’ भी कह दिया।

आखिरी दो लोक सभा चुनावों के मुद्दे स्पष्ट और सामान्य थे जिसे भाजपा ने अच्छी तरह सोच-समझकर तैयार करते हुए पेश भी किया। वर्ष 2014 में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया गया कि भाजपा के मुख्य उम्मीदवार ऐसे सुधारक हैं जो भ्रष्टाचार खत्म कर वृद्धि की रफ्तार बढ़ाएंगे। हकीकत चाहे जो भी हो लेकिन यह कथ्य (नैरेटिव) लोगों को बेहद भाया।

वर्ष 2019 में भी ‘देश की सुरक्षा करने वाले’ जैसी बातें लोगों ने स्वीकार कीं। इसी वजह से भाजपा ‘चुनावी लहर’ में दो बार जीतने में सक्षम रही। पार्टी की वोट हिस्सेदारी में वर्ष 2009 (22 फीसदी) और 2019 (37 फीसदी) के बीच 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई और इसकी सीटें भी 116 (वर्ष 2009) से बढ़कर 303 (वर्ष 2019) हो गईं।

वर्ष 2024 के चुनाव का सामान्य मुद्दा, बेरोजगारी और आर्थिक संकट से जुड़ा है और भाजपा इस स्थिति में नहीं है कि वह दावा कर सके कि उसके पास इसका कोई ठोस समाधान है क्योंकि पार्टी 10 साल से सत्ता में है और वह इन मुद्दों पर कोई सार्थक पहल करने में सक्षम नहीं हो पाई है।

भारत इतना विविधताओं और असमानताओं से भरा हुआ है कि इसे किसी सरल कथ्य या बयान से नहीं समझाया जा सकता। यहां दुनिया के किसी भी देश से ज्यादा मान्यता प्राप्त भाषाएं हैं। यहां की जलवायु तथा भौगोलिक दशाओं में भी काफी विविधता है। इसके अलावा आर्थिक और मानव विकास सूचकांक (HDI) में भी बड़ा अंतर है।

विविधता के मामले में इसकी केवल यूरोपीय संघ के साथ तुलना की जा सकती है जो एक महाद्वीप में फैले 27 अलग-अलग संप्रभु राष्ट्रों का समूह है। हालांकि यूरोपीय संघ भी भारत की तुलना में कम विविधता वाला है। वहां आर्थिक असमानता भी कम होने के साथ ही मानव विकास सूचकांक का दायरा भी कम है। असमानता मापने के लिए प्रति व्यक्ति आय और साक्षरता दर को आधार माना जा सकता है।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के अनुमान के अनुसार, वित्त वर्ष 2022-23 में बिहार (सबसे गरीब राज्य) की प्रति व्यक्ति आय लगभग 48,000 रुपये सालाना थी जबकि गोवा में यह सालाना लगभग 4.7 लाख रुपये थी जो देश के शीर्ष और सबसे निचले मानकों वाले राज्यों के बीच लगभग 10:1 के अंतर को दर्शाता है। राष्ट्रीय स्तर पर प्रति व्यक्ति औसत आमदनी लगभग 1.48 लाख रुपये थी।

यूरोपीय संघ के देशों में बुल्गारिया सबसे गरीब है जिसकी प्रति व्यक्ति आय 16,900 डॉलर है वहीं लक्जमबर्ग सबसे अमीर है, जिसकी प्रति व्यक्ति आय 1,31,380 डॉलर है। यूरोपीय संघ की औसत प्रति व्यक्ति आय 36,000 डॉलर है। पूरे यूरोपीय संघ में साक्षरता दर करीब शत-प्रतिशत है।

भारत में 2017 के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के सर्वेक्षण में, केरल में सबसे अधिक 96 प्रतिशत साक्षरता दर दर्ज की गई थी और सबसे कम साक्षरता दर बिहार में 71 प्रतिशत थी।

इसी तरह जीवन प्रत्याशा, शिशु मृत्यु दर, कुल प्रजनन दर आदि में भी इतना ही बड़ा अंतर हैं। सिक्किम, नगालैंड, मिजोरम और केरल (प्रत्येक हजार में 5 से कम) में शिशु मृत्यु दर जर्मनी के बराबर है जबकि असम, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में शिशु मृत्यु दर 40 से ऊपर है जो लगभग सूडान के समान स्तर पर है।

इसका मतलब है कि राष्ट्रीय स्तर पर सामान्य कथ्य के अनुरूप की गई नीतिगत पहल ज्यादा उपयोगी नहीं होती है। उदाहरण के लिए पूरे भारत में शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए एक समान तरीके से बनाई गई योजना निश्चित रूप से बेतुकी होगी। कई मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं में भी इसी तरह के बेतुकेपन की झलक मिलती है।

चुनावी लहर सामान्य बयानों और कथ्यों से बनाई जा सकती है। लेकिन भारत को सामान्य बयानों और कथ्यों के आधार पर काम करने वाली एक मजबूत केंद्र सरकार की आवश्यकता नहीं है। इसे राज्यों और क्षेत्रों में क्षेत्रीय दलों के प्रतिनिधित्व वाले एक ऐसे गठबंधन की आवश्यकता है जो असमानताओं का प्रबंधन प्रभावी ढंग से कर सके।

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First Published - May 20, 2024 | 10:33 PM IST

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