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जीडीपी वृद्धि के अनुमानों के आंकड़ों की क्या हैं खामियां

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Last Updated- January 13, 2023 | 12:00 AM IST
GDP Growth

तीन वर्षों में जीडीपी वृद्धि से जुड़े कई अनुमानित आंकड़े जारी करने की प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। इसका बजट बनाने से भी फायदा होगा। बता रहे हैं ए के भट्टाचार्य

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) किसी भी एक वर्ष के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था के वार्षिक आकार का अनुमान निकालने की प्रक्रिया छह बार दोहराता है। ये आंकड़े 36 महीने यानी तीन साल की अवधि में जारी किए जाते हैं। उसी वर्ष के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) संख्या के अनुमान की पहली और अंतिम दोहराई गई प्रक्रिया के बीच की तुलना करने पर कई महत्त्वपूर्ण अंतर सामने दिखने लगते हैं।

कुछ वर्षों में यह अंतर पहली बार में ही अधिक अनुमान के रूप में दिखता है जबकि अन्य दोहराई गई प्रक्रिया में अनुमानों का आंकड़ा कम हो जाता है। उदाहरण के तौर पर पहले अग्रिम अनुमान (एफएई) के अनुसार वर्ष 2016-17 में भारत के जीडीपी में वास्तविक वृद्धि 7.1 प्रतिशत थी। लेकिन तीसरे संशोधित अनुमान के माध्यम से उस संख्या की छठी और अंतिम पुनरावृत्ति के मुताबिक वर्ष 2016-17 के लिए जीडीपी वृद्धि दर 8.3 प्रतिशत थी। वर्ष 2017-18 में भी कुछ ऐसा ही हुआ था, हालांकि संशोधित अनुमानों के अंतर का दायरा छोटा था और यह पहले अनुमान के 6.5 प्रतिशत से बढ़कर अंतिम चरण के दौरान 6.8 प्रतिशत तक हो गया।

वर्ष 2019-20 में एक समस्या अधिक अनुमान लगाए जाने से जुड़ी थी। पहले अग्रिम अनुमान के अनुसार, वर्ष 2019-20 के लिए जीडीपी का आंकड़ा 5 प्रतिशत था। लेकिन जनवरी 2022 में दूसरा संशोधित अनुमान जारी होने तक इसे घटाकर 3.7 प्रतिशत कर दिया गया था। इंतजार करके यह देखना जरूरी है कि इस महीने के अंत तक जारी होने वाला तीसरा संशोधित अनुमान जो इस अवधि के लिए आखिरी होगा उससे इस आंकड़े में कमी आती है या फिर संशोधन के बाद इसमें वृद्धि होती है।

कोविड वाले वर्षों के दौरान भी अनुमान के आंकड़ों में अंतर की समस्या दूर नहीं हुई। वर्ष 2020-21 के पहले अग्रिम अनुमान के अनुसार आंकड़ों के कम होकर 7.7 प्रतिशत तक होने के मुकाबले, चौथे अनुमान संशोधन या पहले संशोधित अनुमान में ताजा आंकड़े 6.6 प्रतिशत के साथ छोटी गिरावट को दर्शाते हैं। इसी तरह वर्ष 2021-22 के लिए वृद्धि के आंकड़े को पहले ही एफएई में 9.2 प्रतिशत से घटाकर अस्थायी अनुमान में 8.7 प्रतिशत कर दिया गया है जो तीसरी बार दोहराई गई प्रक्रिया है।

राष्ट्रीय आय के अनुमानों की संशोधन प्रक्रिया की पुनरावृत्ति के बाद जीडीपी आंकड़ों में इस तरह का अंतर दरअसल उन यथार्थवादी और तर्कपूर्ण योजना के लिए मुश्किल साबित होते हैं जो इन संख्या के आधार पर ही तैयार किए जाते हैं। नीति नियोजक और अर्थशास्त्रियों को बार-बार बदलते आंकड़ों से जूझना पड़ता है खासतौर पर जब इन्हें जारी किया जाता है। नतीजतन, अर्थव्यवस्था के वास्तविक प्रदर्शन और उसकी संभावनाओं से जुड़ा उनका आकलन स्पष्ट रूप से प्रभावित होता है।

पिछले सप्ताह पहले अग्रिम अनुमान के माध्यम से जारी, वर्ष 2022-23 के लिए 7 प्रतिशत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर अनुमान को लेकर बना उत्साह इस संभावना की वजह से काफी हद तक योग्य माना जाना चाहिए कि यह संख्या अनुमानों की अगली पांच पुनरावृत्ति में संशोधित होगी और इसे अगले तीन वर्षों के दौरान उपलब्ध कराया जा सकता है।

वर्ष 2022-23 के लिए 7 प्रतिशत की वृद्धि दर अब 2025 में 6 प्रतिशत या उससे भी कम या 8 प्रतिशत भी हो सकती है। लेकिन तब तक आम चुनाव बीत चुके होंगे और भारत की वर्ष 2022-23 की वृद्धि पर बहस पुरानी पड़ चुकी होगी और वैसे भी मीडिया भी संशोधित आंकड़ों पर बहुत कम ध्यान देता है। लेकिन नीति निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों के लिए यह बात बेहद डरावनी साबित हो सकती है।

भारत की डेटा संग्रह प्रणाली में कई समस्याएं

वास्तव में भारत की डेटा संग्रह प्रणाली में कई समस्याएं हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि तीन वर्षों की अवधि में राष्ट्रीय आय में दिखने वाले अंतर की इस विशिष्ट समस्या पर उस तरह का ध्यान नहीं दिया गया है जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था।

हालांकि, वर्षों से इस समस्या को हल करने की सत्ता-प्रतिष्ठान की अनिच्छा साफतौर पर समझ आती है। केंद्र सरकार के शीर्ष पदों पर बैठे राजनेताओं के लिए इस तरह के बदलाव वाले अप्रिय आर्थिक समाचारों को उभरने न देना ही उनकी इच्छा के अनुरूप प्रतीत होते हैं।

वर्ष 2019-20 के लिए 5 प्रतिशत की वृद्धि दर की घोषणा जनवरी 2020 में की गई जिसने निश्चित रूप से आर्थिक प्रबंधन करने के लिए सरकार की प्रतिष्ठा बढ़ाने में मदद की और तीन साल बाद जनवरी 2022 में 4 प्रतिशत से कम की वास्तविक आर्थिक वृद्धि दर के सामने आने तक नुकसान कम हो गया क्योंकि कुशलता से आर्थिक प्रबंधन करने से जुड़ा राजनीतिक कथ्य बरकरार रहा।

इस बात पर भी गौर करें कि वर्ष 2017-18 के लिए जीडीपी वृद्धि दर का पहला संशोधित अनुमान 7.2 प्रतिशत आंका गया था जिसे बाद में अनुमान में संशोधन की प्रक्रिया के दौरान घटाकर क्रमश: 7 प्रतिशत और 6.8 प्रतिशत कर दिया गया था। आम चुनाव से कुछ महीने पहले जनवरी 2019 में, पहला संशोधित अनुमान जारी किया गया था।

अनुमान में दिखने वाले अंतर के कई सांख्यिकीय कारण हो सकते हैं, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि राष्ट्रीय आय से जुड़ी संख्याओं के एक ही सेट के छह संशोधनों और इस तरह के महत्वपूर्ण बदलावों से पैदा हुए समस्याओं को जल्द हल करने की आवश्यकता है।

एक और कारण भी है जिसकी वजह से अनुमानों में दिखने वाले अंतर से जुड़ी समस्या का हल निकालने में कोई देरी नहीं की जानी चाहिए। किसी एक वर्ष के लिए सकल घरेलू उत्पाद का पहला अग्रिम अनुमान आमतौर पर अगले वर्ष के केंद्रीय बजट के लिए एक महत्वपूर्ण इनपुट के रूप में कारगर होता है।

उदाहरण के लिए वर्ष 2022-23 में 7 प्रतिशत की वास्तविक वृद्धि (जो नॉमिनलरूप में 15.4 प्रतिशत अनुमानित है) वर्ष 2023-24 में अर्थव्यवस्था के नॉमिनल आकार और सरकार के राजस्व के साथ-साथ खर्च में वृद्धि का अनुमान लगाने के लिए एक आधार प्रदान करेगी।

अब अगर वृद्धि के ये आंकड़े कम आंके जाते हैं या लगभग 1.5 या 2 प्रतिशत अंक की वृद्धि होती है तब इसका बजट योजना पर अपरिहार्य रूप से प्रभाव पड़ेगा। वर्ष 2023-24 के लिए नॉमिनल वृद्धि के अनुमानों को नुकसान पहुंच सकता है।

इसके अलावा एक और समस्या है। ऐसे तेज बदलावों के साथ, वास्तविक राजकोषीय घाटे के अनुमानों पर नजर रखना मुश्किल हो जाता है। उदाहरण के तौर पर वर्ष 2021-22 में, बजट अनुमान के अनुसार, जीडीपी के 6.8 प्रतिशत का राजकोषीय घाटा वास्तविक आंकड़े सामने आने पर कम होकर 6.7 प्रतिशत हो जाएगा भले ही सरकार की उधारी 15 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 15.86 लाख करोड़ रुपये हो गई। याद रखें कि इस प्रक्रिया में केंद्र को फायदा होता है।

सरकार वादे के अनुरूप राजकोषीय मजबूती के लक्ष्य को पूरा करने से जुड़े अपने रिकॉर्ड को खराब किए बिना अधिक खर्च करने में कामयाब होती है।
वर्ष 2022-23 में भी कुछ ऐसा ही होने की संभावना है। भले ही उधारी का स्तर जस का तस बना रहे, लेकिन सरकार का घाटा जीडीपी के 6.44 फीसदी के बजट अनुमान से कम होना तय है। यह स्पष्ट रूप से केंद्र को राजकोष की मजबूत स्थिति के संदर्भ में अधिक विश्वसनीय प्रदर्शन करने में कुछ सहूलियत देगा।

ऐसा लगता है कि यह तरीका राजकोषीय मजबूती को लेकर कम वादे करने और बेहतर नॉमिनल वृद्धि के आंकड़ों की मदद से ज्यादा परिणाम देने से जुड़ा है।

बजट के आंकड़ों में कई बदलाव खर्च के अधिक दबाव के कारण होते हैं, जिसकी भरपाई राजस्व में अप्रत्याशित तेजी से हो सकती है। लेकिन प्रमुख आंकड़ों में इन तेज उतार-चढ़ावों में से कुछ को खत्म किया जा सकता है अगर देश की राष्ट्रीय आय से जुड़ी आधार संख्या के अंतर को तार्कित तरीके से नियंत्रण में रखा जाए और 36 महीने से कम की अवधि में जारी किया जाए। अगर अमेरिका इस तरह के डेटा संशोधनों की प्रक्रिया में कम दोहराव और कम समय में ही जारी कर सकता है तब इसका कोई कारण नहीं है कि भारत इसका अनुकरण करने में सक्षम न हो।

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First Published - January 12, 2023 | 11:46 PM IST

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