facebookmetapixel
Advertisement
Explainer: पुराने टैक्स नोटिस का झंझट खत्म? पुरानी डिमांड माफी का पूरा सच और पोर्टल पर सुधार का तरीकादेश में चीनी उत्पादन 7% बढ़ा, महाराष्ट्र और कर्नाटक में रिकॉर्ड पैदावार; पर UP में दिखी हल्की गिरावटस्टैंडर्ड चार्टर्ड के 4.5 लाख क्रेडिट कार्ड ग्राहकों को खरीदेगा फेडरल बैंक, बड़े शहरों में पकड़ बढ़ाने की कोशिशWaaree Energies: नतीजों के बाद शेयर में क्यों आई 11% की तगड़ी गिरावट? Q4 में मुनाफा 75% बढ़ा, रेवेन्यू हुआ डबलहर शेयर पर 2200% डिविडेंड देगी FMCG कंपनी, आ गई रेकॉर्ड डेट; Q4 में कमाया ₹2,994 करोड़ का मुनाफाAdani Ports Q4 Results: मुनाफा 10% बढ़कर ₹3,329 करोड़ पहुंचा, ₹7.5 डिविडेंड का ऐलानETF में रिकॉर्ड निवेश: FY26 में ₹1.8 लाख करोड़ का इनफ्लो, गोल्ड-सिल्वर ने मारी बाजीगोल्ड लोन देती है कंपनी, कमजोर बाजार में भी 6% उछला शेयर; ब्रोकरेज ने 34% अपसाइड का दिया टारगेटOnEMI Technology IPO: अप्लाई करने के लिए खुला, प्राइस बैंड ₹162-171 पर तय; सब्सक्राइब करना चाहिए या नहीं?तेल बाजार में भूचाल: ब्रेंट क्रूड $125 के पार, ईरान-अमेरिका तनाव से बढ़ी चिंता

साप्ताहिक मंथन: सांस्कृतिक जड़ों की तलाश

Advertisement

कोई यह दलील भी दे सकता है यह भारत द्वारा लुटियंस दिल्ली पर आक्रमण की कहानी नहीं है जैसा कि प्रस्तुत किया जा रहा है।

Last Updated- September 08, 2023 | 10:10 PM IST
indian flag

प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल के अंत में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि उन्हें इस बात का पछतावा है कि वह लुटियंस दिल्ली को नहीं जीत सके। लुटियंस दिल्ली का प्रयोग आमतौर पर अंग्रेजी भाषी कुलीनों या सत्ता प्रतिष्ठान के भारतीय संस्करण के लिए किया जाता है।

अब जबकि उनका दूसरा कार्यकाल समापन की ओर बढ़ रहा है तो मोदी सत्ता प्रतिष्ठान पर जीत हासिल करने में नहीं बल्कि उसे विस्थापित करने में कामयाब रहे हैं, जो न केवल राजधानी बल्कि पूरे देश को नया रूप देने की उनकी व्यापक योजना का हिस्सा है।

दिल्ली में इस व्यापक प्रयास का एक हिस्सा पुराने कुलीनों की रिहाइश पर कब्जा या उन्हें ध्वस्त करना भी है। थिंक टैंक और नागरिक समाज के विभिन्न संगठन जो अपने ढंग से काम करना चाहते थे उनकी फंडिंग रोक दी गई है या वहां ऐसे लोगों को तैनात कर दिया गया है जो सरकारी सोच विचार रखते हैं। अन्य संस्थानों से कहा गया है कि वे अपने बोर्ड और अपने चर्चा वाले पैनलों में सरकार के लोगों को स्थान दें।

जिमखाना क्लब (जिसके सदस्यों ने उसे एक सीमित क्लब में बदल दिया है) का प्रशासन अब सरकार के पास है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को लगातार ऐसे कुलपतियों के अधीन रखा गया है जो संभव होने पर इसके चरित्र को बदल देंगे। जबकि उदारवादी शैक्षणिक संस्थान अशोक यूनिवर्सिटी को उदारवाद की सीमा समझा दी गई है। स्कूली पाठ्यपुस्तकों को नए सिरे से लिखा जा रहा है जबकि एक आज्ञापालन न करने वाले टेलीविजन चैनल को एक मित्र कारोबारी ने खरीद लिया है।

Also read: Opinion: तेजी से बढ़ रहा जलवायु परिवर्तन का खतरा

कोई यह दलील भी दे सकता है यह भारत द्वारा लुटियंस दिल्ली पर आक्रमण की कहानी नहीं है जैसा कि प्रस्तुत किया जा रहा है। इसके बावजूद इसमें ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ यानी भारत के विचार को फिर से बताना शामिल है। दिल्ली के वास्तु मानचित्र में परिवर्तन करके, नए कानूनों को हिंदी नाम देकर, नाम बदलने की होड़ और धर्मनिरपेक्ष स्थानों पर हिंदू छवियों और प्रतीकों को अधिक स्थान देकर सरकार यह स्पष्ट कर रही है कि वह उत्तर औपनिवेशिक भारत की पहचान को पीछे छोड़कर एक ‘नए भारत’ को जन्म दे रही है जिसकी जड़ें कहीं अधिक गहरी सांस्कृतिक हैं। माफ कीजिएगा नए भारत को क्योंकि इंडिया और हिंदू का भाषाई मूल एक ही है और विदेशी है। बहरहाल नाम बदलने के असर को लेकर चिंता देखने को मिल सकती है।

मुद्दा नाम परिवर्तन, सत्ता परिवर्तन और पहचान की राजनीति से परे जाता है। अब इस धारणा को चुनौती पेश की जा रही है कि यूरोपीय जागरण ने ऐसे विचार पेश किए जिनकी सार्वभौमिक वैधता है। उदाहरण के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समता और व्यक्ति के व्यापक अधिकारों को फ्रांस की क्रांति के समय उल्लिखित किया गया था और वे 150 वर्ष बाद संयुक्त राष्ट्र के सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा पत्र में भी नजर आए।

भारत के संविधान ने मौलिक अधिकारों के साथ आत्मज्ञान के उन मूल्यों को प्रदर्शित किया। परंतु अलेक्सांद्र दुगिन (कथित तौर पर पुतिन के पसंदीदा) जैसे रूसी विचारक तथा अन्य ने पश्चिमी सार्वभौमिकता को लोकप्रिय राष्ट्रवाद के विरुद्ध खड़ा किया तथा व्यक्तिगत अधिकारों को सामूहिक बेहतरी के समक्ष। तर्क यह है कि सार्वभौमिकता सांस्कृतिक अंतरों को समाप्त करती है, इसका प्रतिवाद यह होगा कि उदारवाद इन अंतरों से निपटने का मार्ग देता है।

सांस्कृतिक सापेक्षता परंपरा से जुड़े कई कुलीनों को स्वाभाविक रूप से आकर्षक लगती है हालांकि अब कोई भी ‘एशियाई मूल्यों’ की हिमायत नहीं करता। दिक्कत यह है कि सांस्कृतिक जड़ों वाली राजनीतिक व्यवस्था की खूबसूरती अक्सर उसे धारण करने वाले की आंखों में होती है। तमिलनाडु के राजनेताओं ने हाल ही में सनातन धर्म की परंपरा पर हमला किया।

Also read: चीन की दीवार में मंदी की बढ़ती दरार

चीन चाहेगा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कन्फ्यूशियस के विचारों के अनुरूप सौहार्द का प्रवाह हो, लेकिन क्षेत्र के छोटे देश इस पर आपत्ति प्रकट कर सकते हैं। इस बीच व्लादीमिर पुतिन के मन में रूस और यूक्रेन के इतिहास, संस्कृति और पहचान का लेकर जो समझ है वह हम सब देख ही रहे हैं। जब कोई व्यक्ति संस्कृति में निहित हल की ओर देखता है तो उसे सावधान रहना चाहिए कि यह कहां जा सकता है।

अगर कोई इंगलहार्ट-वेल्जेल के विश्व के सांस्कृतिक मानचित्र का रुख करे जो दो अक्षों पर चित्रित है तो भारत ने पारंपरिक से धार्मिक-तार्किक मूल्यों की ओर नैसर्गिक बदलाव को पलट दिया है। उसने अस्तित्व मूल्यों पर ध्यान केंद्रित किया है जो स्व अभिव्यक्ति के मूल्यों से अलग हैं। यह विश्लेषणात्मक ढांचा हमें समझा सकता है कि आखिर क्यों मोदी सरकार द्वारा दिया जा रहा सांस्कृतिक जोर उन लोगों को प्रभावित कर सकता है जो आत्म साक्षात्कारी कुलीनों का हिस्सा नहीं हैं।

भारत कभी विरोधाभासों से मुक्त नहीं रहा है। प्यू रिसर्च के 2017 के एक सर्वे की रिपोर्ट में कहा गया है कि बहुत बड़ी तादाद में भारतीय जहां लोकतंत्र की कीमत समझते हैं वहीं बड़ी तादाद में वे अधिनायकवादी और एक मजबूत नेता के शासन या सैन्य शासन को भी सही मानते हैं। मोदी काफी हद तक एक मजबूत नेता हैं और वह ‘भारत को लोकतंत्र की जननी’ बताते हुए एकदम सही नजर आते हैं।

Advertisement
First Published - September 8, 2023 | 10:10 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement