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शहरी झु​ग्गी बस्तियां और विकास का क्रम

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शहरी पारिस्थितिकी तंत्र जटिल और गतिशील माहौल होता है जहां मनुष्य और प्र​कृति जटिल तरीके से एक दूसरे के साथ संवाद करते हैं।

Last Updated- September 22, 2023 | 9:39 PM IST
Slums in the urban ecosystem

झुग्गी बस्तियों को शहरी नृविज्ञान के स्थानों के रूप में प्रस्तुत करते समय हमारे सामने दो महत्त्वपूर्ण चुनौतियां उत्पन्न होती हैं- पहला, ऐसी जगहों को शहरी पारिस्थितिकी में ‘सामाजिक कारक’ के रूप में परिकल्पित करना, जैसा कि कुछ नृविज्ञानी करेंगे और दूसरा, यह समझना कि झुग्गियों के इर्दगिर्द की छवियां कैसी हैं और ये वहां रहने वाले लोगों के जीवन को किस प्रकार प्रभावित करती हैं। स्थान और लोग साझा ढंग से रहते हैं और एक दूसरे को आकार देते हैं।

शहरी पारिस्थितिकी तंत्र जटिल और गतिशील माहौल होता है जहां मनुष्य और प्र​कृति जटिल तरीके से एक दूसरे के साथ संवाद करते हैं। इन शहरी परिदृश्यों में ‘स्थान’ एक बहुआयामी सामाजिक कारक के रूप में उभरते हैं जो स्थानीय निवासियों और समग्र शहरी अनुभवों को आकार देने में अहम भूमिका निभाते हैं। शहरी संदर्भ में कोई स्थान केवल भौगोलिक जगह नहीं होती बल्कि वह एक सामाजिक-सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक संरचना होती है जो मानव व्यवहार, सामुदायिक गुणाभाग और समूचे माहौल को प्रभावित करती है।

इसी प्रकार झुग्गी-बस्तियां भी शहरीकरण के परिणामों को चुपचाप भुगतती भर नहीं हैं बल्कि वे शहरी पारिस्थितिकी तंत्र में भी अहम सामाजिक कारक की भूमिका निभाती हैं। उनका आर्थिक योगदान, सामाजिक नेटवर्क, राजनीतिक एजेंसी और पर्यावरण स्थायित्व को लेकर उनकी क्षमता दिखाती है कि वे शहरों को आकार देने में बहुआयामी भूमिका निभा सकती हैं।

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असाधारण स्तर के शहरीकरण के इस दौर में झुग्गियों की तादाद में इजाफा दुनिया भर में एक चौंकाने वाली प्रवृत्ति बन गया है। इन भीड़भाड़ वाली रिहाइशी बस्तियों में अक्सर बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव होता है। ये बस्तियां हमें इस बात की बार-बार याद दिलाती हैं कि तेजी से विस्तारित होते शहरों में किस प्रकार की सुविधाओं की आवश्यकता है।

भीड़भाड़ और कमतर जीवनस्तर इन झुग्गियों की पहचान हैं। आमतौर पर इन बस्तियों में वंचित समुदायों के लोग रहते हैं। इनमें शहरी गरीब, प्रवासी श्रमिक और अल्पसंख्यक वर्ग के लोग रहते हैं जिनके प्रति समाज का रवैया भी ठीक नहीं रहता क्योंकि वे झुग्गियों में रहते हैं। इसकी वजह से उनमें शर्मिंदगी का भाव रहता है और वे खुद को समाज से अलग-थलग महसूस करते हैं।

अलगाव की यह भावना उन्हें व्यापक समुदाय से अलग कर सकती है। झुग्गी बस्ती वाले इलाकों में सामाजिक समर्थन नेटवर्क की कमी इस मसले को और अधिक जटिल बना देती है। ऐसे में लोगों के लिए अपने संघर्ष को साझा करना या मदद मांगना मुश्किल हो जाता है।

अपनी विपरीत जीवन परिस्थितियों के बावजूद झुग्गियां शहरी व्यवस्था की कोई अक्रिय इकाई नहीं हैं। अक्सर ग्रामीण इलाकों से शहरों में बेहतर जीवन की तलाश में आने वाले प्रवासी श्रमिक सबसे पहले झुग्गियों के संपर्क में आते हैं। आबादी की यह आवक शहरों में वृद्धि को गति देती है और विभिन्न उद्योगों के लिए सस्ते श्रमिक उपलब्ध कराके अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करती है।

इन झुग्गियों को खराब शासन, प्रशासनिक अनदेखी और शहरीकरण के अत्यधिक दबाव का सह-उत्पाद माना जाता है। परंतु किसी शहर में इन झुग्गियों के अस्तित्व और इनके असर को नकारना सही नहीं होगा। यह मानना आवश्यक है कि झुग्गियों की अपनी विशेष जगह होती है। ये आर्थिक गतिविधियों के स्रोत होने के साथ-साथ राजनीतिक प्रभाव भी रखती हैं। यहां तक कि जब झुग्गियां एक जटिल समस्या का प्रतिनिधित्व करती हैं तब वे शहरी विकास की दिशा में एक अहम अवसर उपलब्ध कराती हैं जो आर्थिक और नैतिक दृष्टि से अनिवार्य है। उन्हें विकास के विपरीत मानना और उन्हें यूं ही छोड़ देना कोई हल नहीं है।

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इसके बजाय इन स्थानों को बदलकर लाखों लोगों को बेहतर जीवन देने की आवश्यकता है। शहरी क्षेत्रों में झुग्गियों की एक बुनियादी भूमिका है शहरी गरीबों को आवास मुहैया कराना। झुग्गियों को शहरी समृद्धि के लिए बदलना एक जटिल और बहुमुखी चुनौती है जिसके लिए सामाजिक, आर्थिक और बुनियादी क्षेत्र में हस्तक्षेपों की आवश्यकता होगी।
शहरी क्षेत्रों में अक्सर झुग्गियां अक्सर अनिवार्य सेवाओं तक पहुंच, आर्थिक अवसरों और ​रियायती आवासों की कमी के कारण उभरती हैं।

इस मसले को हल करने के लिए कई रणनीतियों को ​क्रियान्वित किया जा सकता है और शहरी समृद्धि में इजाफा किया जा सकता है। सबसे पहले इन इलाकों में जलापूर्ति, स्वच्छता और बिजली की व्यवस्था सुनिश्चित की जा सकती है। इससे न केवल निवासियों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार होगा बल्कि वे इलाके अधिक रिहाइशी और निवेश के लिए अधिक आकर्षक हो जाएंगे।

दूसरा, जमीन और संपत्ति के अधिकार से जुड़े मुद्दों को हल करना अक्सर झुग्गियों की स्थितियों को अधिक ​स्थिर बनाने में मदद मिलेगी। भू-स्वामित्व को औपचारिक स्वरूप देने से आवास और अधोसंरचना निवेश को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी। तीसरा, कौशल विकास और व्यावसायिक प्रशिक्षण मुहैया कराके झुग्गियों के रहवासियों में रोजगार का स्तर बढ़ाया जा सकता है। इससे रोजगार की स्थिति में बेहतरी आएगी और आय का स्तर बढ़ेगा। इससे आर्थिक समृद्धि में बेहतरी आएगी।

चौथा, झुग्गियों के पुनर्विकास में पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ व्यवहार को अपनाने से मसलन पर्यावरण के अनुकूल बुनियादी विकास, कचरा प्रबंधन और ऊर्जा किफायत वाले उपाय अपनाकर दीर्घकालिक शहरी समृद्धि को बढ़ावा दिया जा सकता है। पांचवां, शहरी नियोजना और विकास से जुड़ी नीतियों को समावेशी बनाने और झुग्गियों में रहने वालों की जरूरतों को समझते रहने की आवश्यकता है।

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अंत में आंकड़ों और तकनीक का इस्तेमाल करके झुग्गियों में चल रही बदलाव लाने वाली परियोजनाओं की प्रगति और नतीजों की निगरानी की जा सकती है। ऐसा करके उन क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है जहां अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।

झुग्गियों को समृद्ध शहरी इलाकों में बदलना एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है जिसके लिए सरकारी एजेंसियों, शहरी नियोजकों, गैर सरकारी संगठनों और प्रभावित समुदायों की सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता है। सफलता समग्र रुख पर निर्भर करती है जो शहरी विकास के सामाजिक, आर्थिक और अधोसंरचना संबंधी रुख को संबोधित करते हुए झुग्गियों में रहने वालों की बेहतरी और उनकी गरिमा को प्राथमिकता दे।

(कपूर इंस्टीट्यूट फॉर कंपीटिटिवनेस, इंडिया में चेयर और स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी में व्याख्याता हैं। देवरॉय प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन हैं)

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First Published - September 22, 2023 | 9:39 PM IST

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