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आज की दुनिया में ट्रंप का जी2 सपना महज कागजी, वैश्विक प्रभाव से रहित

आज का जी2 अर्थात दो महाशक्तियों वाली व्यवस्था बुनियादी तौर पर अस्थिर है और उसमें पूरी दुनिया को प्रभावित कर पाने की ताकत नहीं है। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं आर जगन्नाथ

Last Updated- November 06, 2025 | 10:04 PM IST
Trump and Xi Jinping
इलस्ट्रेशन- अजय मोहंती

चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ अपनी हालिया बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने दो महाशक्तियों (जी2) के नेतृत्व वाली एक नई विश्व व्यवस्था की संभावना जताई। उनका कहना यह था कि ये दो महाशक्तियां मिलकर दुनिया पर राज कर सकती हैं और यह तय कर सकती हैं कि सभी के लिए क्या सही है।

बहरहाल, 2025 का जी2 आंशिक रूप से एक भ्रम हो सकता है। विशेष रूप से इसलिए क्योंकि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, जलवायु परिवर्तन, ताइवान और वैश्विक सुरक्षा से जुड़े तकरीबन हर मुद्दे पर एक दूसरे के विपरीत नजरिया है। एक बात स्पष्ट है कि जी1 और जी2 दोनों जानते हैं कि उनके भौगोलिक दबदबे का क्षेत्र वर्तमान स्तर से बढ़ नहीं सकता है। वेनेजुएला को अमेरिका की धमकी बताती है कि वह अमेरिकी महाद्वीप में अपने प्रभुत्व को लेकर कितना चिंतित है और चीन को पता है कि वह भारत या जापान को एक सीमा से अधिक परेशान नहीं कर सकता है। किसे पता यूक्रेन युद्ध समाप्त होने के बाद रूस पर उसका कितना प्रभाव दिखाई देगा?

यह विश्व युद्ध के बाद उभरे जी2 के हालात से एकदम अलग है। उस वक्त भी अमेरिका ही इकलौती सैन्य और आर्थिक महाशक्ति था और करीब एक दशक तक हालात जी1 जैसे ही रहे। उसके बाद ही सोवियत संघ परमाणु शक्ति बना और दूसरी महाशक्ति बन सका। उसने समाजवादी विचारधारा के आधार पर बहुत तेजी से सैन्य और आर्थिक क्षमता हासिल की।

उसे एशिया, अफ्रीका और लातिन अमेरिका के नए-नए स्वतंत्र हुए उपनिवेशों और गरीब देशों का भी साथ मिला। इसके बावजूद सोवियत संघ कभी पूर्ण आर्थिक महाशक्ति नहीं बन सका और हम अभी भी हालात को जी2 नहीं बल्कि जी1.5 ही कह सकते हैं। बावजूद इसके कि 1990 के दशक के आरंभ तक सोवियत संघ ही अमेरिका का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी था। उसे यह भूमिका देने में उसकी मजबूती से अधिक शेष विश्व की कमजोरी वजह थी।

परंतु चीन और अमेरिका वाला आज का जी2 व्यापक राष्ट्रीय शक्ति के मामले में अधिक समतुल्य है और सैद्धांतिक तौर पर यह तभी वास्तविक जी2 हो सकता है जबकि उनके लक्ष्य कुछ स्थानों पर साझा हों। सैन्य और आर्थिक शक्ति के मामले में अमेरिका आगे है लेकिन यह बढ़त आंशिक रूप से एक भ्रम है। कारण: यह केवल तभी काम आता है जब हम आर्थिक शक्ति को डॉलर में आंकें। हकीकत यह है कि अमेरिका के पराभव के साथ ही डॉलर में भी गिरावट आएगी। क्रय शक्ति समता यानी पीपीपी के मामले में चीन पहले ही अमेरिका से आगे है और तकनीक के मामले में भी वह तेजी से आगे बढ़ रहा है।

अमेरिका और चीन को ज्यादा से ज्यादा जी 1.75 कहा जा सकता है क्योंकि दोनों ही पक्षों में पूरी दुनिया को प्रभावित करने की क्षमता नहीं है बशर्ते कि वे एकजुट न हो जाएं। फिलहाल तो इसकी संभावना भी नहीं नजर आती है। वे एक ही विचार पर सहमत नजर आते हैं और वह है भारत के उदय को धीमा करना। परंतु वे ऐसा पहले से करते आ रहे हैं। वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा ही करना चाहेंगे।

1990 के दशक के पहले के जी2 और अब में अंतर यह है कि पहले दोनों ध्रुवों के चारों ओर केवल अनुसरण करने वाले मुल्क ही होते थे। युद्ध के बाद का यूरोप तब पस्त पड़ा था, और बाकी दुनिया औपनिवेशिक बेड़ियों को तोड़ने की शुरुआत कर रही थी, जिसमें गरीब और भूखे लोगों का दुनिया का सबसे बड़ा भंडार बसता था। आज, अगर अफ्रीका के बहुत छोटे या अत्यधिक गरीब देशों को छोड़ दें, तो एशिया में प्रमुख आर्थिक और सैन्य शक्तियां उभर रही हैं। समय के साथ यूरोपीय शक्तियां और जापान भी, जो लगभग एक सदी से अमेरिका के इशारे पर चल रहे थे, अपनी आवाज फिर से पा सकते हैं। वे भी जानते हैं कि अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता, लेकिन अभी वे यह बात खुलकर नहीं कहेंगे क्योंकि उनकी निर्भरता बहुत अधिक है।

अमेरिकी महाद्वीप और पश्चिमी यूरोप में अमेरिका को कोई चुनौती नहीं है। चीन अभी भी एक एशियाई शक्ति ही है तथा भारत और जापान जैसी शक्तियां उसे चुनौती देती हैं। आज के जी2 सीमित अर्थों में ही शक्तिशाली हैं। सैन्य और आर्थिक गठजोड़ बरकरार हैं लेकिन कोई बड़ा देश इन दोनों से डरने वाला नहीं है।

आज अमेरिका और चीन एक-दूसरे पर निर्भर हैं। अमेरिका चीनी उत्पादों पर निर्भर है और चीन अमेरिका के बाजार पर। आर्थिक वास्तविकता इसका कारण स्पष्ट करती है। दोनों देश अब एक-दूसरे से अलग होने की कोशिश कर रहे हैं ताकि इस पारस्परिक निर्भरता से कोई पक्ष अनुचित लाभ न उठा सके। इसका अर्थ यह है कि बाकी दुनिया को चीन और अमेरिका में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है और वे दोनों के साथ स्वतंत्र रूप से व्यवहार कर सकते हैं, कम से कम पर्याप्त रूप से बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के मामले में।

वर्ष2025 में आर्थिक शक्ति भी 1945 की तुलना में अधिक बंटी हुई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक डॉलर के संदर्भ में अमेरिकी अर्थव्यवस्था 30.5 लाख करोड़ डॉलर की है जबकि चीन की 19.23 लाख करोड़ डॉलर। परंतु अगर अगली पांच या छह शक्तियों मसलन जर्मनी, जापान, भारत, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस को मिलाकर देखा जाए तो वे चीन के समान ही बड़ी हैं। परंतु पीपीपी के नजरिये से ये काफी अलग नजर आता है। इस लिहाज से चीन 40.72 लाख करोड़ डॉलर की जीडीपी के साथ बहुत आगे है। अमेरिका 30.6 लाख करोड़ डॉलर और भारत 17.71 लाख करोड़ डॉलर वाला है।

अगले पांच देश यानी रूस, जापान, जर्मनी, इंडोनेशिया और ब्राजील का कुल पीपीपी जीडीपी अमेरिका के बराबर है। रूस को अक्सर आर्थिक नाकामी के लिए याद किया जाता है। वह 7.14 लाख करोड़ डॉलर की पीपीपी जीडीपी के साथ भारत के बाद चौथे स्थान पर है। अपनी आंतरिक कीमतों के संदर्भ में रूस शायद ही आर्थिक रूप से कमजोर है।

आज का जी2 कागज पर अधिक मजबूत दिखता है लेकिन 1945 के उलट बाद वाले पांच देश आर्थिक और सैन्य दृष्टि से इतने कमजोर नहीं हैं कि उन पर दबाव बनाया जा सके। डॉलर के संदर्भ में अमेरिका और चीन दोनों वैश्विक जीडीपी में 42 फीसदी हिस्सेदार हैं जबकि आईएमएफ के मुताबिक पीपीपी के संदर्भ में उनकी हिस्सेदारी घटकर 34 फीसदी रह जाती है।

आज का जी2 परिदृश्य मूल रूप से अस्थिर है, क्योंकि कई ऐसे देश या समूह हैं जिनके पास स्वतंत्र रूप से या समूहों में ठोस सौदेबाजी की शक्ति है। दूसरे शब्दों में, ऐसा कोई वास्तविक जी2 नहीं है जो केवल अपने हितों में काम कर सके। यही कारण है कि भारत वैश्विक मंच पर बड़ी भूमिका निभा सकता है।

यदि भारत यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप और रूस को यूरेशिया में साथ काम करने के लिए प्रेरित कर सके, और यदि जापान, भारत और आसियान मिलकर एशिया में चीन की आर्थिक शक्ति को संतुलित करें, तो हम एक बेहतर दुनिया और नई बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था बना सकते हैं। यदि चीन को एशिया में संतुलित किया जाए और अमेरिका को उत्तर और दक्षिण अमेरिका में उसकी दादागीरी तक सीमित रखा जाए, तो दुनिया में आर्थिक और सैन्य हितों का बेहतर संतुलन स्थापित हो सकता है।


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

First Published - November 6, 2025 | 9:55 PM IST

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