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समुद्रों की कार्बन अवशोषण क्षमता और हमारी नीतियां

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Last Updated- December 13, 2022 | 10:56 AM IST
Carbon emission

कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए वर्षों तक स्वच्छ ईंधन पर ध्यान देने के बाद अब जलवायु संरक्षण के लिए काम करने वालों का ध्यान कार्बन सिंक की ओर है। यानी एक ऐसी व्यवस्था जहां वातावरण में होने वाले कार्बन उत्सर्जन को सोखा जा सके। उत्सर्जन कम करने के किसी भी अन्य विचार की तरह यहां भी बुरे विचारों की भी उतनी ही हिमायत की जा रही है जितनी अच्छे विचारों की।

संक्षेप में कहें तो कार्बन सिंक प्राकृतिक भी हो सकते हैं और कृत्रिम भी। हालांकि प्राकृतिक सिंक की तुलना में कृत्रिम सिंक बहुत कम हैं। प्राकृतिक सिंक के रूप में हमारे पास वन और समुद्र हैं। ये दोनों मिलकर मनुष्य द्वारा उत्सर्जित कुल कार्बन का 56 प्रतिशत अवशोषित करते हैं। इसमें वनों की हिस्सेदारी 30 फीसदी जबकि समुद्रों की 26 फीसदी है। वै​श्विक कार्बन परियोजना के अनुमान के मुताबिक 2022 तक कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करीब 40.6 अरब टन होगा जो 2019 के 40.9 अरब टन से थोड़ा ही कम होगा। 2019 का आंकड़ा अब तक का उच्चतम उत्सर्जन आंकड़ा है।

नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को तेजी से अपनाये जाने के बावजूद वै​श्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन अभी भी काफी अ​धिक है। जलवायु संबंधी तमाम अन्य आकलनों की तरह ही ये भी अनुमान हैं, न कि सटीक आंकड़े। शोधकर्ताओं को लगता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वनों और समुद्रों की कार्बन अवशोषण की क्षमता धीरे-धीरे कम हो रही है। बहरहाल, एक और नजरिया जोर पकड़ रहा है और वह यह कि समुद्र न केवल वातावरण से अनुमान से अ​धिक कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण करते हैं ब​​ल्कि उनकी यह क्षमता और अ​धिक बढ़ाई जा सकती है।

कृत्रिम या मानवनिर्मित कार्बन सिंक से तात्पर्य ऐसी प्रक्रियाओं से है जिनकी मदद से उत्सर्जन के एक स्तर पर कार्बन को सीमित किया जाता है और फिर उसे सतह के नीचे दफन कर दिया जाता है। मानवनिर्मित कार्बन सिंक के लिए जरूरी तकनीक तो लंबे समय से मौजूद है लेकिन उन पर गंभीरता से विचार अब शुरू हुआ है। इसके बावजूद निकट भविष्य में उनकी भूमिका वैसी नहीं हो सकेगी जैसी कि प्राकृतिक सिंक की है।

प्राकृतिक कार्बन सिंक का एक बड़ा लाभ यह है कि वे न केवल पहले से मौजूद हैं और ढेर सारे उत्सर्जन का अवशोषण कर रहे हैं ब​ल्कि यह भी कि वे एक प्राकृतिक कार्बन चक्र का अनुसरण करते हैं जिसे प्रकृति ने ही तैयार किया है। प्राकृतिक वन जितना कार्बन डाइऑक्साइड निकालते हैं उससे दोगुनी मात्रा में कार्बन का अवशोषण करते हैं। पुराने वनों में कार्बन अवशोषण की क्षमता नए वनों से अ​धिक होती है। चाहे जो भी हो लेकिन इससे दुनिया भर में वन क्षेत्र बढ़ाने और पेड़ों की कटाई रोकने की एक तगड़ी वजह सामने आती है।

परंतु वास्तव में जलवायु​ नी​ति निर्माताओं का ध्यान समुद्रों ने अपनी ओर खींचा है। इसे लेकर अच्छी और बुरी दोनों तरह की सलाह सामने आई हैं। समुद्र में मौजूदा छोटे पौधे कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण करके उसे समुद्री जीवों के भोजन में बदलने में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में समुद्र और पर्यावरण विज्ञानियों में इस बात को लेकर नए सिरे से​ दिलचस्पी उत्पन्न हुई है कि क्या समुद्रों में इन पौधों को बढ़ाने की दिशा में काम किया जा सकता है क्योंकि बीते कुछ वर्षों से तमाम वजहों से इन पौधों की वृद्धि और विविधता प्रभावित हुई है। भारत हाल ही में मैंग्रोव अलायंस फॉर क्लाइमेट में शामिल हुआ है। यह दोमुखी रणनीति अपनाएगा। पहले यह सुनि​श्चित करने का प्रयास करेगा कि मौजूदा मैंग्रोव में कमी न आए। दूसरा यह प्रयास करेगा कि जहां भी संभव हो वहां मैंग्रोव में इजाफा किया जाए।

जाहिर सी बात है कि केवल मैंग्रोव की मदद से ही समुद्र की कार्बन डाइऑक्साइड खपत करने की क्षमता नहीं बढ़ाई जा सकती है। समुद्री वनस्पतियों, समुद्री घास, तथा समुद्र की तलहटी में पाए जाने वाले छोटे पौधे भी समुद्र की कार्बन डाइऑक्साइड खपत की क्षमता में तेजी से इजाफा करते हैं। समय के साथ इनके प्राकृतिक विकास की दिशा में भी कदम उठाए जा सकते हैं।

परंतु जलवायु परिवर्तन की आपा​त ​स्थितियों के कारण कुछ शोधकर्ता और नीति निर्माता यह भी कह रहे हैं कि समुद्रों की कार्बन डाइऑक्साइड खपत की क्षमता बढ़ाने के लिए अ​धिक कड़े उपाय अपनाने होंगे। इसमें पाइप के सहारे समुद्र तल में शुद्ध तरल कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ना शामिल है जहां यह सतह में समाहित हो जाएगी।

इस विचार में दिक्कत यह है कि इसके प्रभावों का समुचित अध्ययन नहीं किया गया है। कुछ मामलों में यह भी सामने आया है कि यह भूकंप उत्पन्न कर सकता है। बड़ा खतरा यह है कि इससे समुद्र का तापमान और उसका रासायनिक संतुलन बिगड़ सकता है। इससे मौजूदा समुद्री जीवों और जैव विविधता को भी काफी नुकसान पहुंच सकता है जो विकास कार्यों तथा अत्य​धिक उत्खनन आदि के कारण पहले ही मु​श्किल में हैं। बीती आधी सदी में समुद्र के नीचे केबल बिछाने से लेकर समुद्री सतह के खनन और बड़े पैमाने पर मछली मारने जैसी गतिवि​धियां हुई हैं। इससे कई तरह की मछलियों की तादाद कम हुई है। अब तटीय इलाकों में पवन और सौर फार्म जैसी नई गतिवि​धियों के शुरू होने से भी समुद्री जीवन को खतरा उत्पन्न हो रहा है। प्लास्टिक तथा अन्य प्रदूषक तत्त्वों ने पहले ही समुद्रों की हालत खराब कर रखी है।

समुद्र इतने विशाल हैं कि अक्सर उन्हें पहुंचने वाले नुकसान का अनुमान नहीं लग पाता लेकिन अब इन पर समुचित अध्ययन शुरू हो गया है। अध्ययन दिखाते हैं कि समुद्री तितलियों की आबादी बुरी तरह प्रभावित हुई है क्योंकि समुद्र में कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ी है और समुद्र का पीएच स्तर बदला है। इन तितलियों की आबादी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह व्हेल समेत कई समुद्री जीवों का भोजन है। इसी तरह समुद्र के रासायनिक ढांचे और तापमान में बदलाव से समुद्री मछलियों के व्यवहार में परिवर्तन आ सकता है और ऐसी घटनाओं का सिलसिला शुरू हो सकता है जिसके दीर्घकालिक परिणाम हो सकते हैं। पृथ्वी को जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले नुकसान से बचाना जरूरी है। लेकिन यह भी महत्त्वपूर्ण है कि हम याद रखें कि उत्सर्जन कम करने के लिए उठाए जाने वाले कदम और अ​धिक नुकसान पहुंचाने वाले न हों।

(लेखक बिज़नेस टुडे और बिज़नेसवर्ल्ड के पूर्व संपादक और संपादकीय परामर्श संस्था प्रोजैक व्यू के संस्थापक हैं)

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First Published - December 12, 2022 | 11:53 PM IST

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