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नीति नियम: अमेरिकी चुनाव में मिडवेस्ट धारणा की पड़ताल…

कमला हैरिस और पूर्व राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के बीच की जंग वास्तव में हैरिस के बॉस और राष्ट्रपति जो बाइडन के एक अहम राजनीतिक सिद्धांत का इम्तहान भी होगी।

Last Updated- November 04, 2024 | 10:42 PM IST
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आए दिन ऐसा मौका आता ही रहता है जब किसी देश की राजनीति पर लग रहे कयास पूरी तरह धवस्त हो जाते हैं। भारत के मामले में भी जब तब ऐसा होता रहता है। इसका हालिया उदाहरण 2014 में दिखा था, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) को बहुमत दिलाया और दशकों से चली आ रही यह धारणा तोड़ दी कि देश पर शासन के लिए अब गठबंधन जरूरी शर्त है।

इस सप्ताह अमेरिका में भी ऐसा अवसर आ सकता है। उप राष्ट्रपति कमला हैरिस और पूर्व राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के बीच की जंग वास्तव में हैरिस के बॉस और राष्ट्रपति जो बाइडन के एक अहम राजनीतिक सिद्धांत का इम्तहान भी होगी।

बाइडन प्रशासन का वह सिद्धांत कहता है कि व्हाइट हाउस का दरवाजा अमेरिकी मिडवेस्ट में श्वेत कामकाजी वर्ग के लिए नीतियां तैयार करने से ही खुलता है। मिडवेस्ट में नेब्रास्का, इंडियाना, इलिनॉय, आयोवा, कांसास, मिनिसोटा, मिशिगन, नॉर्थ डकोटा, ओहायो, साउथ डकोटा और विस्कॉन्सिन आदि राज्य आते हैं।

दो दशक से भी अधिक समय से अमेरिका की राजनीति इन्हीं राज्यों के इर्दगिर्द घूमती रही है। 2004 में जॉन केरी और जॉर्ज डब्ल्यू बुश के बीच चुनाव में ओहायो राज्य निर्णायक रहा था। अब यह राज्य पूरी तरह रिपब्लिकन पार्टी की पकड़ में हैं। 2016 में हिलेरी क्लिंटन की हार में मिशिगन और विस्कॉन्सिन जैसे राज्य निर्णायक रहे, जो कभी डेमोक्रेट्स के गढ़ थे। लेकिन इन दोनों राज्यों में जीत दर्ज करने के बाद भी अगर हैरिस को चुनाव जीतना है तो उन्हें पेन्सिलवेनिया को फतह करना ही होगा। पेन्सिलवेनिया कभी मिडवेस्ट प्रांत नहीं रहा लेकिन वह इस क्षेत्र से सांस्कृतिक और आर्थिक जुड़ाव महसूस करता है।

ऐसे में अमेरिकी राजनीति में इस धारणा का बोलबाला है: मध्य अमेरिका में कभी औद्योगीकृत रही पट्टी वॉशिंगटन की कुलीन राजनीति के हाथों ठगा महसूस करती है और इन राज्यों में श्वेत कामकाजी वर्ग का दबदबा है। यह वर्ग उस गुजरे जमाने को याद करता है, जब यह इलाका पूरी दुनिया के लिए औद्योगिक गतिविधियों का केंद्र था। यह श्वेत कर्मचारी वर्ग जिसे भी अपने मूल्यों से जुड़ा पाता है या अपने हितों की रक्षा करता पाता है उसी को वोट देता है।

वर्ष 2008 के संकट के समय इन लोगों ने बराक ओबामा पर भरोसा किया। वर्ष 2016 में उन्हें लगा कि ट्रंप नौकरियों को स्वदेश ले आएंगे और 2020 में उन्हें लगा कि बाइडन का पुरानी शैली का समर्पण और उनकी जमीनी परवरिश सक्षम तथा समर्पित प्रशासन देगी।

ऐसी धारणाओं या कहानियों को झूठा नहीं कहा जा सकता है। उन्हें किसी कसौटी पर परखा भी नहीं जा सकता। मगर यह जरूर देखा जा सकता है कि अगर श्वेत कामकाजी वर्ग को वह सब दे दिया जाए, जो वह चाहता है तो क्या वाकई चुनावी नतीजों पर कोई फर्क पड़ेगा। पिछले कुछ समय से दावा किया जा रहा है कि औद्योगिक उत्पादन को दोबारा अमेरिका में लाने वाली नीतियां श्वेत कामगार वर्ग की नाराजगी को दूर कर देंगी।

बाइडन प्रशासन का पूरा जोर इसी बात पर रहा। अगर उनके द्वारा चुना गया उत्तराधिकारी मिडवेस्ट में उनसे भी खराब प्रदर्शन करता है तो पिछले कुछ दशकों से चली आ रही राजनीतिक धारणाएं मतपेटी की सबसे अहम कसौटी पर दम तोड़ देंगी।

अमेरिकी राजनीतिक वर्ग को औद्योगिक नीति के बल पर वोट जुटाना नहीं आता। बहुत धन खर्च किया जाता है और उसमें से ज्यादातर राजनीतिक तौर पर गलत जगहों में खर्च होता है। लेकिन यह बात भी सही है कि कोई सनकी राष्ट्रपति चुनावी नक्शे को नए सिरे से खींचने के लिए कई दूसरे रास्ते अपना सकता था।

उदाहरण के लिए अमेरिका के दक्षिण-पश्चिम में टेक्सस से एरिजोना तक सबसे तेज वृद्धि कर रहे राज्य डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर ढुलक रहे हैं और उनके ढुलकने की रफ्तार खास नीतियों के जरिये तेज की जा सकती थी।

परंतु बाइडन ने अपने कार्यकाल और अपनी विदेश नीति की दिशा तय करते समय इसी बात पर जोर दिया कि 2024 में मिडवेस्ट उनके पाले में रहे। अगर औद्योगिक नीति, मध्य वर्ग के लिए विदेश नीति, वॉशिंगटन सहमति के अंत, उच्च व्यापार अवरोध आदि नाकाम रहे हैं तो उनकी शैली की राजनीति को हासिल क्या हुआ?

बाइडन जिस आर्थिक संकट को हल करने की कोशिश में लगे रहे, इस क्षेत्र में सांस्कृतिक बदलाव शायद उससे ज्यादा लंबे समय तक टिकता है। तकरीबन एक सदी से अमेरिका के दक्षिणी राज्य रिपब्लिकन पार्टी का विरोध करते हुए पूरी मजबूती के साथ उस डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ रहे, जिसका गठन 19वीं सदी में दक्षिण में दास प्रथा के विरोध के लिए हुआ था। 1960 के दशक में जब डेमोक्रेटिक पार्टी नागरिक अधिकारों का दल बन गई तो वे राज्य उससे दूर हो गए। बिल क्लिंटन दक्षिणी राज्यों से ही थे और वर्ष 1996 में वहां का आधा इलाका जीतने में वह कामयाब रहे। मगर दक्षिण से ही आए अल गोर 2000 में सब कुछ हार गए और अपने गृह राज्य टेनेसी तक में नहीं जीत सके।

इस बदलाव को धीमा करने का एक ही तरीका है – सांस्कृतिक बदलाव या आबादी में बदलाव। अल गोर की पराजय के 20 साल बाद रुख बदलने के संकेत नजर आ रहे हैं। पुराने दक्षिण का दिल कहलाने वाला वर्जीनिया अब डेमोक्रेट राज्य है। बाइडन ने 2000 में जॉर्जिया प्रांत जीता। इसमें अटलांटा के बढ़ते आकार और समृद्धि का योगदान रहा।

सबक यह है कि व्यापक राजनीतिक आख्यान, खासतौर पर अर्थव्यवस्था के बारे में दावों से प्रेरित आख्यान, अक्सर जमीनी हकीकत से दूर होते हैं। हम भारतीयों को भी इस तरह की सरल कहानियों के बहकावे में नहीं आना चाहिए।

उदाहरण के लिए भाजपा 2004 में सुधारों के कारण नहीं हारी और न ही 2019 में वह कल्याण योजनाओं के कारण जीती। आम चुनावों में कहीं अधिक गहरे रुझान काम करते हैं।

First Published - November 4, 2024 | 10:42 PM IST

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