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चुनाव के दौरान नीति निर्माण और इससे उपजे कुछ प्रश्न

देश के अफसरशाह अगली सरकार के कार्यकाल की नीतियां तैयार करने में व्यस्त हैं। परंतु हमारे देश में पारंपरिक रूप से ऐसा नहीं होता रहा है। इस संबंध में बता रहे हैं ए के भट्‌टाचार्य

Last Updated- April 10, 2024 | 10:14 PM IST
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भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारियों को इन गर्मियों में कुछ अस्वाभाविक अनुभव करना पड़ रहा है। लोक सभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है। निर्वाचन आयोग ने आदर्श आचार संहिता लागू कर दी है। इसके बावजूद वरिष्ठ अफसरशाह जो अक्सर आम चुनाव से कुछ सप्ताह पहले अपने रोजमर्रा के काम से आराम पाते हैं, उन्हें पहले से भी अधिक काम करना पड़ रहा है। अतीत में जिन अधिकारियों को चुनावी काम में लगाया जाता था उनके अलावा अधिकांश अफसरशाह चुनाव से पहले की अवधि को कुछ काम और प्रशिक्षण के साथ आराम से बिताते थे। परंतु इस बार हालात अलग हैं।

वर्ष 2024 अफसरशाहों के लिए अलग कैसे है? इस वर्ष की हकीकत यह है कि जो लोग चुनावी काम में नहीं लगे हैं वे जून 2024 में लगने वाली नई सरकार के क्रियान्वयन के लिए कार्य योजना बनाने में लगे हैं। यह कोई साधारण कार्य योजना नहीं है। इसमें ऐसे उपाय और नीतियां शामिल हैं जिन्हें नई सरकार को अपनाना चाहिए और जिन पर अगले पांच वर्ष के दौरान काम करना चाहिए।

इतना ही नहीं। इस योजना में ऐसे कदम भी शामिल हो सकते हैं जिन्हें सरकार को अपने नए कार्यकाल के पहले 100 दिन में उठाना चाहिए। 100 दिन क्यों? शायद 100 दिन की समय सीमा का अर्थ है उस गति और ध्यान केंद्रित करने की भावना भरना जिसके साथ नई निर्वाचित सरकार इन निर्णयों का क्रियान्वयन करेगी। या फिर शायद विचार यह है कि वैसा उत्साह पैदा किया जाए जैसा तीन दशक पहले पी वी नरसिंह राव के 100 दिन के नीतिगत कदमों ने जगाया था।

ऐसा भी नहीं है कि अफसरशाह आम चुनाव के बाद इस गति से काम नहीं करते। उदाहरण के लिए 2009 में अफसरशाहों ने कड़ी मेहनत करके सूचना प्रौद्योगिकी कंपनी सत्यम को वित्तीय धोखाधड़ी से उबारा था। कंपनी के मालिकों ने उसी वर्ष जनवरी में धोखाधड़ी की बात स्वीकार की थी।

वित्त मंत्रालय और कंपनी मामलों के मंत्रालय के अफसरशाहों ने कई रातों तक जाग-जागकर पेशेवरों की एक स्वतंत्र समिति की सहायता की थी ताकि वित्तीय संकट से जूझ रही कंपनी के लिए खरीदार तलाश किया जा सके। जैसा कि कई लोग मानते हैं ऐसा करके देश के सूचना प्रौद्योगिकी जगत की प्रतिष्ठा को भी बचाया गया। उसी वर्ष अप्रैल में हुई नीलामी के बाद टेक महिंद्रा के रूप में सत्यम को नया खरीदार मिल गया। यह चुनाव तथा नई सरकार के गठन से काफी पहले हो गया था।

इस समय ऐसी कोई परिस्थिति नहीं थी जो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को 2024 में ऐसी तेजी के लिए विवश करे। अफसरशाहों के बीच इस हड़बड़ी की वजह दूसरी है। मोदी ने पहले ही मतदाताओं से कह दिया है कि वे नई सरकार के गठन के शुरुआती कुछ दिनों में ही भ्रष्टाचार विरोधी कदमों के लिए तैयार रहें। ऐसी भी खबरें हैं कि मोदी सरकार इस योजना को इसलिए सामने रख रही है ताकि हर किसी को नई सरकार के दृष्टिकोण का पता चल जाए और यह भी कि वह भारत को 2047 तक विकसित देश बनाने की दिशा में कौन से प्रयास कर रही है।

कुछ खबरों में अधोसंरचना निर्माण पर नए सिरे से जोर देने की बात की जा रही है जबकि अन्य कह रही हैं कि कुछ वर्ष पहले संसद द्वारा पास चार श्रम संहिताओं सहित आर्थिक नीति संबंधी सुधारों को अंजाम दिया जाएगा। ऐसा लगता है कि वित्त मंत्रालय ने चुनाव के बाद पेश किए जाने वाले पूर्ण बजट की तैयारी शुरू कर दी है। रिजर्व बैंक को भी मोदी सलाह दे चुके हैं कि वह अगले कुछ सप्ताह के लिए आंतरिक चर्चा करे क्योंकि नई सरकार बनने के बाद कुछ कदम जल्दी उठाए जाएंगे।

ये पहल अस्वाभाविक क्यों लग रही हैं? वे इसलिए अस्वाभाविक लग रही हैं क्योंकि अतीत में किसी सरकार ने चुनाव के पहले अगले कार्यकाल की नीतियां नहीं बनाईं। मोदी ने भी 2019 के आम चुनाव के पहले ऐसा नहीं किया था। स्पष्ट है कि यह सत्ताधारी दल का आत्मविश्वास है जिसके चलते ऐसा किया जा रहा है। जून 2024 में भाजपानीत सरकार बनेगी यह तो विपक्षी दल भी मानते नजर आ रहे हैं। यही वजह है कि सरकार 2024-25 की कार्य योजना चुनाव से पहले ही बना रही है।

इन पहलों से दो तरह के प्रश्न उत्पन्न होते हैं। पहली तरह के प्रश्न उस परंपरा के बारे में हैं जिनका पालन सरकार को करना चाहिए। यही परंपरा है जो सरकार को एक सरकार को पांच साल के कार्यकाल में पांच पूर्णकालिक बजट प्रस्तुत करने की इजाजत देती है। यही वजह है कि गत फरवरी में वित्त मंत्री ने पूर्ण नहीं अंतरिम बजट पेश किया।

जबकि पूरा विश्वास था कि चुनाव के बाद भाजपा सत्ता में आएगी। ऐसे में अगर कोई आपात स्थिति नहीं है तो क्या एक सरकार चुनाव मैदान में उतरते हुए अफसरशाहों से यह कह सकती है कि वे चुनाव के बाद की सरकार के लिए कार्य योजना तैयार करें? क्या चुनाव की घोषणा के बाद सरकार के नियोजन या निर्णय प्रक्रिया में ठहराव आना चाहिए?

दूसरी तरह के सवाल इस बात से संबद्ध हैं कि चुनाव आयोग को अफसरशाहों द्वारा ऐसी नीतियों को तैयार किए जाने को किस तरह देखना चाहिए? यहां अहम सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग द्वारा चुनावों की तारीख घोषित करने के बाद सरकार की प्रकृति में कोई बदलाव आता है। एक बार आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद क्या सरकार को अगले पांच वर्ष की नीतियां बनाने में सक्रिय भागीदारी करने से रोका जाना चाहिए और यह काम नई सरकार पर छोड़ दिया जाना चाहिए?

एक और संवेदनशील मसला है। अगर केंद्रीय मंत्रालयों से कहा जाता है कि वे अगले पांच साल के लिए अपनी कार्य योजना बनाएं तो यह स्वाभाविक ही है। उनमें से कुछ की जानकारी चुनावों के दौरान भी सार्वजनिक हो सकती है। ऐसे में क्या सत्ताधारी दल को चुनाव लड़ रहे अन्य दलों पर बढ़त नहीं हासिल है जो केवल अपने चुनावी घोषणा पत्र पर भरोसा कर सकते हैं? क्या यही वजह नहीं है जिसके चलते रिजर्व बैंक ने 2014 में बैंक लाइसेंस के लिए नामों की घोषणा के पहले चुनाव आयोग से इजाजत मांगी थी?

जाहिर है इनमें से अधिकांश प्रश्नों का उत्तर अस्पष्ट हैं। परंतु ये शासन की भावना और आदर्श आचार संहिता के बीच अंतर को लेकर कुछ सोच-विचार की स्थिति तो पैदा करते ही हैं। ऐसे मुद्दों को लेकर बहस देश के लोकतंत्र और इसके संस्थानों को मजबूत करेगी।

First Published - April 10, 2024 | 10:14 PM IST

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