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Editorial: लोको पायलटों की कार्य-आराम नीति पर पुनर्विचार की सख्त जरूरत

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चिंता इस बात से जुड़ी है कि रेल चालकों (लोको पायलट) में थकान का प्रबंधन कैसे किया जाता है और दिनोंदिन व्यस्त होते रेल तंत्र में सुरक्षा के लिए यह क्या मायने रखता है

Last Updated- December 12, 2025 | 10:27 PM IST
Railway

विमानन क्षेत्र में उड़ान ड्यूटी समय सीमा (एफडीटीएल) दिशानिर्देश प्रभावी होने के बाद इंडिगो में हुई उथल-पुथल के बाद भारतीय रेल में लंबे समय से चली आ रही मगर अनसुलझी चिंता फिर उभर आई है। यह चिंता इस बात से जुड़ी है कि रेल चालकों (लोको पायलट) में थकान का प्रबंधन कैसे किया जाता है और दिनोंदिन व्यस्त होते रेल तंत्र में सुरक्षा के लिए यह क्या मायने रखता है। रेल चालक अभी भी ‘काम के घंटे और आराम की अवधि’ (एचओईआर) ढांचे के तहत काम करते हैं जिसमें प्रति सप्ताह औसतन 52 घंटे तक कार्य करने की अनुमति है।

ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन की मांग है कि यात्री रेलगाड़ियों के लिए कार्य का समय छह घंटे और मालगाड़ियों के लिए आठ घंटे तक रखा जाए, साथ ही प्रत्येक यात्रा के बाद 16 घंटे का आराम, दैनिक आराम के अलावा साप्ताहिक आराम और चालकों के लिए निर्धारित कार्य वितरण योजना (क्रू शेड्यूलिंग) में थकान-जोखिम ढांचे का इस्तेमाल किया जाए। इन प्रस्तावों का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया जाना चाहिए। ये मोटे तौर पर वैश्विक स्तर पर प्रचलित श्रेष्ठ कार्य व्यवहार को दर्शाते हैं जिसमें काम के घंटे और आराम के नियम इस वैज्ञानिक प्रमाण पर आधारित होते हैं कि थकान मानव की कार्यक्षमता को किस हद तक प्रभावित करते हैं।

भारतीय रेल में कर्मचारियों की कमी से समस्या और गंभीर हो गई है। 1 मार्च 2024 तक रेलवे में रेल चालक के लगभग 15 फीसदी पद रिक्त थे। दक्षिण रेलवे में कर्मचारियों की कमी के कारण यात्रियों की भारी मांग के बावजूद अतिरिक्त सेवाओं की शुरुआत में देरी हुई है। रेलवे ने 1,20,000 से अधिक रिक्तियों के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा जरूर की है मगर यह धीमी है और इसका लाभ मिलने में थोड़ा समय लग सकता है। तब तक मौजूदा कर्मचारियों पर काम का बोझ अधिक रहेगा।

सुरक्षा से जुड़े आंकड़े इस बात का स्पष्ट उल्लेख करते हैं कि यह विषय क्यों इतना महत्त्वपूर्ण है। वर्ष 2024-25 में 31 रेल हादसे हुए जिनमें 20 से ज्यादा मामले रेलगाड़ियों के पटरी से उतरने से जुड़े थे। रेल चालकों में थकान अधिकांश मामलों में एक मात्र कारण नहीं हो सकता लेकिन इसे सुरक्षित परिचालन में एक बड़ा जोखिम माना गया है। इसकी अनदेखी करने से मामूली गलतियां भी गंभीर दुर्घटनाओं का कारण बन सकती हैं।

उल्लेखनीय है कि पिछले एक दशक में महिला चालकों की संख्या काफी बढ़ी है जिससे अनुमानित कार्य समय-सारणी, पर्याप्त आराम और बुनियादी सुविधाएं जैसे विषय और महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। इनकी अनदेखी करने या इन पर पर्याप्त ध्यान नहीं देने से भारतीय रेल प्रतिभावान लोगों को जोड़े रखने और सुरक्षित संचालन सुनिश्चित करने में पिछड़ सकता है। इसके अलावा, यह सिद्धांत रेल चालकों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रेल तंत्रों ने इस दिशा में निर्णायक रूप से कदम बढ़ाए हैं। यूरोपीय संघ (ईयू) सख्त कार्य-आराम नियमों को लागू करता है। अमेरिका में ‘सेवा के घंटे’ कानून के तहत न्यूनतम अवकाश के घंटे का प्रावधान अनिवार्य है और दुनिया के विकसित रेल तंत्र आंकड़े और तकनीक आधारित औपचारिक थकान-प्रबंधन प्रणालियों की मदद लेते हैं।

भारतीय रेल की माली हालत पूरा मामला और जटिल बना देती है। वर्ष 2025-26 में 98.43 फीसदी अनुमानित परिचालन अनुपात बनाए रहने और लगभग 95 फीसदी तक पूंजीगत व्यय के लिए केंद्रीय समर्थन पर निर्भरता के कारण भारतीय रेल के पास कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने के लिए सीमित वित्तीय गुंजाइश बच रही है। 8वां वेतन आयोग लागू होने से यह दिक्कत और बढ़ सकती है जिससे कर्मचारियों पर खर्च और बढ़ जाएगा। यह अंतर पाटने के लिए वृदि्धशील समायोजन से अधिक की आवश्यकता होगी।

संस्थागत प्राथमिकताओं में स्पष्ट रूप से चालक प्रशिक्षण और थकान की निगरानी को मूल सुरक्षा उपायों के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। इसे तकनीक समर्थित चालकों की कार्य समय-सारणी, काम के घंटों की वास्तविक समय में निगरानी, रिक्तियों की पारदर्शी तरीके से घोषणा और त्वरित भर्ती और प्रशिक्षण योजनाओं द्वारा और मजबूत बनाया जाना चाहिए। रेल तंत्र का विस्तार जारी रहने और मार्गों पर व्यस्तता बढ़ने के साथ परिचालन सुरक्षा का दारोमदार मानव की कार्यक्षमता सीमा पर बढ़ता जाएगा।

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First Published - December 12, 2025 | 10:12 PM IST

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