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शहरीकरण की रफ्तार बढ़ाने की दरकार

Last Updated- December 11, 2022 | 6:46 PM IST

शहरों को लेकर अक्सर काव्यात्मक परिकल्पनाएं की जाती रही हैं कि वे कैसे संस्कृति को आकार देते हैं और दूरदराज से शहर में आने वाले लोगों के सपनों और उनकी महत्त्वाकांक्षाओं को हकीकत में बदलने में मदद करते हैं। शहर एक जिंदा चीज है जो हमेशा विकसित होता और बदलता रहता है। जैसा कि कहा भी जाता है, एक शहर अपने लोगों से मिलकर बनता है। शहर अपने लोगों के सौंदर्य बोध को प्रभावित करता है, वह उसके वास्तु पर असर डालता है और उसके समग्र कामकाज पर भी। शहरों की इस काव्यात्मक व्याख्या के अलावा अन्य तमाम विकास संबंधी लाभ भी हैं जो शहरों और शहरीकरण की प्रक्रिया से हमें हासिल होते हैं। सन 2003 तक दुनिया भर में गांवों की तुलना में ज्यादा लोग शहरों में रहने लगे थे।
यह बात स्पष्ट है कि शहरीकरण की दर के मामले में भारत निहायत पीछे है। 2020 में वैश्विक स्तर पर शहरीकरण की दर 56.15 प्रतिशत थी जो अब 34.92 प्रतिशत रह गई है। शहरीकरण और आर्थिक वृद्धि में सकारात्मक संबंधों को चिह्नित करने के बावजूद भारत की दिक्कत शहरीकरण बढ़ाने की उसकी अनिच्छा में नहीं निहित है बल्कि ऐतिहासिक संदर्भों में देखा जाए तो शहरीकरण की धीमी गति की जड़ें स्पष्ट हो जाती हैं।
अध्ययन के विषय के रूप में शहर अपेक्षाकृत नया विषय हैं क्योंकि भारत को प्राथमिक तौर पर गांवों का देश माना गया है। यानी एक ऐसा देश जहां लोग गांवों में निवास करते हैं। यह बात औपनिवेशिक दौर तथा आजादी के बाद के कुछ वर्षों के लिए खासतौर पर उपयुक्त है। बहरहाल, यदि शहरीकरण की ऐतिहासिक दर का पता लगाना हो और उदाहरण के लिए 1960 के दशक के बाद के समय को देखें तो सन 1960 के दशक में शहरीकरण की वैश्विक दर 33.61 प्रतिशत थी। भारत के लिए यह दर 17.94 प्रतिशत थी। विकास की बहस में शहर का सवाल गायब था और औद्योगिक विकास, क्षेत्रीय एकीकरण और आर्थिक वृद्धि आदि आजादी के बाद के वर्षों में देश की प्राथमिकता बने हुए थे। आज ऐसी स्थिति नहीं है। सरकारों को इस बात का अहसास हो गया है कि आर्थिक वृद्धि के वाहक के रूप में शहरों की अहम भूमिका है। 20वीं और 21वीं सदी में भारत में तेजी से और टिकाऊ ढंग से शहरी विकास हुआ। बल्कि विश्व स्तर पर देखें तो 20वीं सदी में पूरी दुनिया में ही तेज शहरीकरण हुआ। खासतौर पर अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के उन देशों में जो औपनिवेशिक शासन से हाल ही में आजाद हुए थे। वैश्विक शहरीकरण की संभावनाओं को लेकर संयुक्त राष्ट्र ने एक रिपोर्ट तैयार की थी। उसके मुताबिक एशिया में 2018 में 50 प्रतिशत शहरीकरण हुआ था। अनुमान यह जताया गया था कि 2020 तक एशिया में करीब 51.1 प्रतिशत शहरीकरण हो जाएगा और 2022 तक यह बढ़कर 52.3 प्रतिशत पहुंच जाएगा। भारत एशियाई औसत से अब भी नीचे बना हुआ है। भारत निरंतर एशियाई औसत से नीचे है। अनुमान जताया गया है कि 2022 तक उसकी 35 फीसदी आबादी शहरी इलाकों में जीवन बिताएगी। दक्षिण एशियाई उप क्षेत्र के लिए यह अनुमान 37.6 प्रतिशत है।
इन बातों के बीच एशिया में शहरीकरण हर वर्ष लगभग 0.5 से एक फीसदी की स्थिर दर से बढ़ा है। हालांकि शहरीकरण सालाना वृद्धि का इकलौता निर्धारक कारक नहीं है लेकिन यह बात स्पष्ट है कि शहरीकरण का स्तर वृद्धि और प्रगति की दृष्टि से अहम है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक 2011 से 2020 के बीच शहरी इलाकों में रहने वाले सर्वाधिक लोग केंद्रशासित प्रदेशों में थे। चंडीगढ़ में 2011 के 97.2 फीसदी से बढ़कर 2020 में इनकी तादाद 99.63 प्रतिशत हो गई जबकि दिल्ली में यह 97.5 प्रतिशत से बढ़कर 99.23 प्रतिशत हो गयी।
इसी समय बड़े राज्यों में शहरों में रहने वालों की तादाद में उतनी बढ़ोतरी नहीं हुई। राजस्थान के बारे में अनुमान जताया गया कि 2020 तक उसकी 26.19 प्रतिशत आबादी शहरों में रहने लगेगी। मध्य प्रदेश के बारे में 28.66 प्रतिशत तथा उत्तर प्रदेश के बारे में 23.59 प्रतिशत का अनुमान जताया गया।  
अगर इसे इन राज्यों की 2011 से 2020 के बीच की वृद्धि के साथ जोड़कर देखा जाए तो पता चलता है कि राजस्थान की समेकित सालाना वृद्धि दर इस अवधि में 4.35 प्रतिशत थी, उत्तर प्रदेश में यह 4.55 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में यह 6.28 प्रतिशत थी।
शहरीकरण के मानकों पर ये सबक देश की वृद्धि की दिशा में सकारात्मक गति से कहीं परे जाते हैं। शहरीकरण से न केवल औद्योगिक क्लस्टरों का निर्माण होता है और प्रत्येक राज्य के भीतर प्रतिस्पर्धा में बढ़ोतरी होती है, बल्कि इसके साथ-साथ वह आय की असमानता कम करने और गरीबी घटाने में भी मददगार साबित होता है। शहरीकरण से रोजगार और आय में इजाफा होता है क्योंकि ज्यादा प्रतिभाशाली लोग शहरों का रुख करते हैं। जब प्रतिभा आती है तो नवाचारी उपाय तलाश किए जाते हैं और देश की समृद्धि में हर व्यक्ति की हिस्सेदारी में सुधार होता है।
भारत में शहरीकरण की गति में निरंतरता तो रही है लेकिन यह धीमी भी रही है। चूंकि एशिया के उभार पर करीबी नजर है इसलिए यह सवाल पूछना बनता है कि इस उभार में भारत की महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी या नहीं। आशावादी ढंग से देखा जाए तो देश के जनांकीय भार और लाभ को देखते हुए यह माना जाता है कि एक उभरती शक्ति के रूप में भारत पर भी नजर होगी। बहरहाल, जरूरत इस बात की भी है कि शहरीकरण की गति को बढ़ाया जाए। इसके साथ ही इस गति को इस प्रकार व्यवस्थित रखने की आवश्यकता है ताकि आबादी का संघनन केवल बड़े शहरों में न हो। यह बात इसलिए खासतौर पर मायने रखती है कि छोटे शहरों की वृद्धि और वहां निवेश की संभावनाएं बड़े औद्योगिक शहरों के इर्दगिर्द ही सीमित रह गई हैं क्योंकि बड़े शहर विकास के वाहक हैं। शहरी वृद्धि के साथ-साथ समृद्धि के साझा लक्ष्य केवल तभी हासिल हो पाएंगे जब पिछड़े शहरों और कस्बों पर ध्यान दिया जाएगा और वहां विकास तथा निवेश संभावनाएं बढ़ाने के लिए काम किया जाएगा।

First Published - May 24, 2022 | 12:45 AM IST

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