अधिकांश अर्थशास्त्रियों का मानना है कि शुक्रवार को मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) नीतिगत दरों में बदलाव नहीं करेगी लेकिन वे इस निर्णय के साथ की जाने वाली टिप्पणी को लेकर काफी उत्सुक होंगे। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति की दर, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के तयशुदा दायरे से ऊपर चल रही है। विकसित देशों के केंद्रीय बैंकों की तरह भारतीय केंद्रीय बैंक की घोषित स्थिति भी यही है कि उच्च मुद्रास्फीति अस्थायी है। उसने कहा है कि आपूर्ति क्षेत्र की बाधाओं, महामारी से जुड़े प्रतिबंधों, उच्च मार्जिन और करों के कारण मुद्रास्फीति का स्तर ऊंचा बना हुआ है। केंद्रीय बैंक के कदम आर्थिक सुधार का समर्थन करने पर केंद्रित है। हालांकि कोविड-19 की दूसरी लहर का आर्थिक गतिविधियों पर सीमित असर रहा लेकिन इसने सुधार की प्रक्रिया को काफी धक्का पहुंचाया है।
मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में आरबीआई का इरादा बाजार की ब्याज दरों को अपेक्षाकृत कम रखने का है ताकि कारोबारी कर्जदारों को ऋण कम लागत पर मिल सके। बाजार ब्याज दरें कम रखने के लिए केंद्रीय बैंक ने व्यवस्था में भारी नकदी डाली है। इसके लिए उसने पारंपरिक और गैर पारंपरिक दोनों तरीके अपनाए हैं। उच्च नकदी और कम दरों के कारण सरकार कम ब्याज दर पर ऋण ले पा रही है। नीतिगत समायोजन का तर्क अच्छी तरह स्पष्ट है और महामारी के शुरुआती दौर में केंद्रीय बैंक ने अपने स्तर पर काफी कदम उठाए। परंतु कुछ बाजार प्रतिभागी इस बात को लेकर चकित हैं कि आखिर केंद्रीय बैंक किस हद तक मुद्रास्फीति के जोखिम को टालने का इच्छुक है। निश्चित तौर पर भारत में हालात विकसित देशों से काफी अलग हैं। उन देशों में मुद्रास्फीति की दर काफी समय से कम है और अनुमानों का ध्यान रखा जा रहा है। इसके बावजूद मुद्रास्फीति में हालिया तेजी, खासतौर पर अमेरिका में इसमें इजाफे पर बहस हो रही है और अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के अधिकारी आने वाले आंकड़ों के साथ तालमेल बिठा रहे हैं। भारत में उच्च मुद्रास्फीति का इतिहास रहा है। उदाहरण के लिए औसत दर पिछले वर्ष भी तय दायरे से ऊपर थी।
ऐसे में आरबीआई को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह मुद्रास्फीति में हालिया तेजी को कैसे देखता है क्योंकि उसके आने वाले कुछ समय तक ऊंचे स्तर पर बने रहने का अनुमान है। परिणामस्वरूप एमपीसी को पूरे वर्ष के मुद्रास्फीति के अनुमान को 5.1 फीसदी से संशोधित करना होगा और वह 4 फीसदी के लक्षित स्तर से और दूर हो जाएगी। एमपीसी को इस बात पर भी बहस करनी चाहिए कि क्या व्यवस्था में मौजूद अतिरिक्त नकदी मुद्रास्फीति संबंधी निष्कर्षों को प्रभावित कर रही है। इसके अलावा कम ब्याज दर, उच्च ऋण वृद्धि के रूप में भी परिलक्षित नहीं हुई है। ऐसे में नकदी का स्तर उच्च बनाए रखने के जोखिम संभावित लाभों से अधिक हो सकते हैं। मुद्रास्फीति संबंधी जोखिम की निरंतर अनदेखी करने से दीर्घावधि की वृहद आर्थिक लागत बढ़ सकती है। ऐसे में आरबीआई से स्पष्ट संचार बहुत अहम होगा।
नीति में अचानक बदलाव का अवांछित और विसंगतिपूर्ण असर हो सकता है ऐसे में वित्तीय बाजार आरबीआई से यह आशा करेंगे कि वह नीति को सामान्य होने के लिए एक खाका पेश करेगा। आरबीआई ने 10 वर्ष के सरकारी बॉन्ड के प्रतिफल को गत सप्ताह 6 फीसदी से ऊपर जाने दिया जो सामान्यीकरण की ओर उठाया गया कदम हो सकता है। अगला कदम होना चाहिए व्यवस्था में नकदी के स्तर को चरणबद्ध तरीके से कम करना और दरों को मौद्रिक नीति के दायरे में लाना। अल्पावधि की दरों को रिवर्स रीपो दर से नीचे जाने देना भी एमपीसी को प्रभावित करने वाला है। यह देखा जाना है कि दरें तय करने वाली समिति इस बार अपना ध्यान हटाएगी या नहीं।