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भारत का ऊर्जा भविष्य और छोटे परमाणु संयंत्र

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देश की ऊर्जा सुरक्षा के नजरिये से छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर आदर्श हैं परंतु सही नीतियों के जरिये उन्हें समर्थन मिलना भी आवश्यक है। बता रहे हैं लवीश भंडारी

Last Updated- November 06, 2024 | 11:35 PM IST
Small Modular Reactors

स्मॉल मॉड्यूलर न्यूक्लियर रिएक्टर या एसएमआर में भारत की ऊर्जा की तस्वीर बदल देने की क्षमता है। लेकिन अभी की स्थिति में भारत में एसएमआर से बिजली बनाने का व्यापक कार्यक्रम शुरू करने से पहले काफी कुछ किया जाना है। मगर यह अहम क्यों है? क्योंकि आगे चलकर भारत को हर आठ से 10 वर्ष में अपना बिजली उत्पादन दोगुना करना होगा। पारंपरिक नवीकरणीय ऊर्जा सस्ती तो होती है मगर उसका भंडारण सस्ता नहीं होता।

साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा में पवन ऊर्जा तथा सौर ऊर्जा मौसम पर निर्भर रहती है और रोजाना इसमें बदलाव होता रहता है। ऐसे में भारत ऊर्जा उत्पादन के लिए जीवाश्म ईंधन इस्तेमाल नहीं करना चाहता तो उसके पास दूसरे स्रोतों में विविधता लाने के सिवा कोई विकल्प नहीं है।

इसमें दो राय नहीं है कि विविधता लाने से जोखिम कम होता है और बिजली की उपलब्धता में उतार-चढ़ाव भी कम होता है। लेकिन यह काम चतुराई से किया जाए तो बिजली उत्पादन की लागत भी कम हो सकती है। अन्य ऊर्जा स्रोतों में जियोथर्मल यानी भूतापीय और टाइडल अर्थात ज्वार से ऊर्जा बनाना अभी ठीक से शुरू भी नहीं हुआ है। जैव ईंधन बहुत महंगे हैं। ऐसे में परमाणु ऊर्जा का ज्यादा से ज्यादा उत्पादन जरूरी लगता है। इससे उत्पादन स्थिर होता है और चौबीसों घंटे रहता है, जिस कारण यह और भी आकर्षक विकल्प बन जाता है।

किंतु बड़े परमाणु बिजली संयंत्रों के साथ दिक्कत यह है कि इनके निर्माण में बहुत समय लगता है। ये करीब एक दशक में तैयार होते हैं और इनके लिए बहुत जमीन की जरूरत होती है। इनका निर्माण शुरू होने के साथ ही कई एहतियात बरतने होते हैं। अगर 300 मेगावॉट से कम क्षमता वाली परमाणु परियोजनाओं की बात करें तो तकनीकी बदलाव और नियमों को दुरुस्त बनाने से ये व्यावहारिक विकल्प बन गई हैं।

कम लागत और छोटे आकार के कारण 300 मेगावॉट से कम की परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं की तादाद बढ़ी है। इससे परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के आपूर्तिकर्ता भी नई जुगत भिड़ाने के लिए मजबूर हुए हैं। वे इन्हें मॉड्यूल यानी हिस्सों में तैयार करते हैं, एक जगह बनाते हैं और वहां से परियोजना स्थल पर ले आते हैं। ऐसा करने पर लागत और भी घट सकती है। इससे भी अहम बात यह है कि इन संयंत्रों को एक दशक के बजाय अब तीन-चार साल में रही लगाया जा सकता है। तकनीकी नवाचार के कारण पहले से कम जमीन की जरूरत पड़ती है और 10 से 20 एकड़ में संयंत्र लग जाता है।

सुरक्षा के दो खास इंतजाम इन्हें पहले से ज्यादा आकर्षक बनाते हैं। इनमें कोई गड़बड़ होने पर बाहरी हस्तक्षेप के बिना आंतरिक स्तर पर ही सुरक्षा उपाय समस्या को नियंत्रित कर सकते हैं। इस कारण इन्हें बंद पड़े ताप बिजली संयंत्रों में भी स्थापित किया जा सकता है और वहां पहले से मौजूद बिजली वितरण व्यवस्था तथा दूसरे बुनियादी ढांचे का फायदा उठाया जा सकता है। ऐसे में तीन प्रमुख लाभ हैं: कम जगह की जरूरत, जल्दी पूरा होना और अधिक सुरक्षा। इन तीनों के कारण लागत भी कम हो जाती है। ये फायदे देखकर आप सोच रहे होंगे कि भारत को एसएमआर के जरिये परमाणु बिजली गतिविधियों को रफ्तार देनी चाहिए। मगर अब तक ऐसा नहीं हुआ है।

भारत मोटे तौर पर दो राहें चुन सकता है: पहली, खुद एसएमआर तैयार करना और दूसरी, वैश्विक आपूर्तिकर्ताओं के साथ समझौते करना। पहले देसी विकल्प पर विचार करते हैं। भारत लंबे समय से देसी क्षमताओं में इजाफा कर रहा है और हाल में 700 मेगावॉट क्षमता पर जोर है मगर 220 मेगावॉट के प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (पीएचडब्ल्यूआर) में भारत को गहरा अनुभव है। अगर भारत 100 मेगावॉट क्षमता से कम के व्यवहार्य विकल्प तैयार कर पाया तो उसके कई दूसरे औद्योगिक इस्तेमाल भी संभव हो जाएंगे। इससे हम शून्य कार्बन उत्सर्जन की दिशा में तेजी से बढ़ सकेंगे।

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भारत के मौजूदा परमाणु प्रतिष्ठान समय पर उत्पादन कर सकेंगे या नहीं। अतीत से संकेत लें तो इस क्षेत्र में अंतहीन विलंब होते हैं और एक दशक और इंतजार करना बहुत भारी पड़ेगा। 700 मेगावॉट के रिएक्टर को ही ले लीजिए। उसकी 10 अतिरिक्त इकाइयों के लिए 2017 में योजना बनाई गई थी और पांच साल के भीतर उन्हें स्थापित कर दिया जाना था। मगर ऐसा नहीं हो पाया।

हालांकि भारत के परमाणु प्रतिष्ठान सुरक्षा और परिचालन की कसौटी पर बहुत कामयाब रहे हैं मगर समय का पाबंद होने के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। अतीत में नवाचार और वृद्धि सीमित रहने का ठीकरा बाहरी प्रतिबंधों पर फोड़ा जा सकता था मगर हाल के दिनों में ऐसा नहीं हुआ है। दूसरे शब्दों में कहें तो देश में 220 मेगावॉट से कम क्षमता के संयंत्रों में नवाचार की गति बढ़ाने के लिए उचित वित्तीय, तकनीकी और प्रबंधकीय संसाधन देने होंगे।

अब दूसरे रास्ते पर विचार करते हैं यानी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध एसएमआर तकनीक को अपनाने की। कोरिया, अमेरिका, रूस और कई यूरोपीय देशों की कंपनियां भारत में इस अवसर से जुड़ना चाहती हैं। भारत की कई निजी और सरकारी कंपनियों की भी इसमें दिलचस्पी हो सकती है। इनमें स्टील संयंत्र, डेटा सेंटर, क्लीन हाइड्रोजन उत्पादक और बिजली उत्पादक शामिल हैं। किंतु 1962 का परमाणु ऊर्जा अधिनियम कहता है कि इन संयंत्रों का संचालन भारतीय न्यूक्लियर पॉवर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआईएल) ही कर सकता है। इसमें बदलाव करना होगा तथा अन्य नियामकीय तथा अन्य संस्थाओं में थोड़े परिवर्तन करते हुए उनके दायरे की स्पष्ट व्याख्या करनी होगी।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व (सीएलएनडी) अधिनियम 2010 में छोटे परमाणु संयंत्रों की जरूरतों के हिसाब से बदलाव करने होंगे। अभी यह कानून परियोजना चलाने वाले पर 1,500 करोड़ रुपये की देनदारी लगा देता है। मगर एसएमआर आकार में छोटे होते हैं, इसलिए राशि भी उसी हिसाब से कम करनी होगी। सीएलएनडी के साथ यह दिक्कत भी है कि आपूर्ति करने वालों की असीमित देनदारी का खतरा हो जाता है। परमाणु उपकरण प्रदान करने वालों के लिए लंबे समय से यह समस्या बनी हुई है। तीसरी बात, आपराधिक यानी फौजदारी जवाबदेही से जुड़ी अस्पष्टता भी दूर करनी होगी।

देश का मौजूदा परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान सार्वजनिक क्षेत्र के अधीन बना था और इसलिए नियामकीय तथा निगरानी प्रणाली में कई बदलाव करने होंगे ताकि निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई जा सके। इसके लिए परमाणु ऊर्जा नियामकीय बोर्ड की भूमिका बढ़ानी होगी और उसे निजी तथा सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों की कंपनियों पर नियामकीय अधिकार देना होगा। साथ ही उसे सांगठनिक रूप से भी मजबूत करना होगा। कई सुरक्षा उपायों को भी संस्थागत स्वरूप देना होगा। इसके लिए गहन निगरानी, नियामकीय और प्रवर्तन क्षमताएं तैयार करनी होंगी, खास तौर पर रेडियोधर्मी विकिरण वाले कचरे के निपटान तथा संयंत्रों को बंद करने के मामले में।

आखिर में एसएमआर बड़ा नवाचार है और भारत के लिए उपयुक्त भी है बशर्ते सही नीतिगत, सांगठनिक, नियामकीय और निगरानी व्यवस्था लागू हो तथा वैश्विक तकनीक के साथ देसी नवाचार के लिए भी खुला नजरिया हो। देसी नवाचार हो या अंतरराष्ट्रीय तकनीक लाना, दोनों तरीके कारगर हैं और खुशकिस्मती से ये एक-दूसरे से अलग भी नहीं हैं।

(लेखक सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस के प्रमुख हैं)

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First Published - November 6, 2024 | 11:35 PM IST

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