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जीएम सरसों: एक स्वागतयोग्य परिवर्तन

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Last Updated- December 14, 2022 | 7:24 PM IST
Mustard seeds

जीन संवर्द्धित (जीएम) सरसों की हाइब्रिड किस्म डीएमएच-11 को मंजूरी देने को लेकर संसद में जो वक्तव्य दिए गए और सर्वोच्च न्यायालय में जो साक्ष्य दिया गया वह जीएम फसलों को लेकर सरकार की नीति में सकारात्मक बदलाव का संकेत देता है। इन फसलों की वा​णि​ज्यिक खेती को लेकर अनि​श्चित रुख रखने के बजाय अब सरकार इनके पक्ष में नजर आ रही है। जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रैजल कमेटी (जीईएसी) द्वारा जीएम सरसों को मंजूरी का बचाव करके सरकार ने न केवल यह स्वीकार किया है कि यह खाने-​खिलाने की दृ​ष्टि से सुर​क्षित है ब​ल्कि उसने एक कदम आगे बढ़कर यह भी कहा कि जीएम तकनीक खाद्य सुरक्षा और निर्यात में कमी की दृ​ष्टि से अहम है। यह कृ​षि वैज्ञानिकों के उस विचार का समर्थन है जिसमें उनका मानना है कि जेनेटिक इंजीनियरिंग तकनीक की मदद से ही कृ​षि उत्पादों की बढ़ती मांग पूरी की जा सकती है और उत्पादन लागत कम करके किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है।

कीटनाशकों, बीमारियों और जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न चुनौतियों से निपटने में भी ऐसी फसलें मददगार होंगी। दिलचस्प बात है कि डीएमएच-11 वही जीएम सरसों है जिसे जीईएसी ने 2017 में मंजूरी दी थी लेकिन पर्यावरण मंत्रालय ने इसके इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। अब वही मंत्रालय कह रहा है कि विषाक्तता, एलर्जी और पर्यावरण सुरक्षा को लेकर किए गए गहन अध्ययनों में पाया गया है कि जीएम हाइब्रिड हर लिहाज से सुर​क्षित हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने जब सरकार से यह पूछा कि डीएमएच-11 को पर्यावरण संबंधी मंजूरी देने की वजह क्या रही तो सरकार ने जो जवाब दिया वह भी नीतिगत बदलाव की ओर संकेत देता है। सरकार ने जो हलफनामा पेश किया है उसमें जोर दिया गया है कि कृ​षि सुधार मसलन जीएम फसलों की खेती की मदद से ही घरेलू खाद्य तेलों की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है ताकि उनका आयात कम किया जा सके और उनकी कीमतों को नियंत्रित रखकर मुद्रास्फीति का प्रबंधन किया जा सके।

दिल्ली विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी केंद्र द्वारा विकसित डीएमएच-11 के बारे में जानकारी है कि यह किस्म सरसों की लोकप्रिय किस्म वरुणा की तुलना में 28 फीसदी अ​धिक उपज देती है। दुनिया भर में जीएम हाइब्रिड के आने के बाद उत्पादन में काफी वृद्धि देखने को मिली है। भारत अपनी जरूरत के खाद्य तेल का करीब 60 फीसदी आयात करता है और माना जा रहा है कि जीएम बीजों के आने के बाद इसमें काफी कमी आएगी।

अहम बात यह है कि जीएम सरसों इकलौती खाद्य फसल नहीं है जिसे बीते एक दशक से अ​धिक समय से मंजूरी का इंतजार था। जीन संवर्द्धित बीटी-बैगन की तकदीर और भी बुरी है। भारी खपत वाली यह जीएम सब्जी कभी खेतों तक नहीं पहुंची जबकि जीईएसी ने इसे 2009 में ही इसे मंजूरी दे दी थी।

ऐसा इसलिए हुआ कि जीएम फसलों का विरोध करने वाली लॉबी तथा सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध स्वदेशी जागरण मंच ने इसका जमकर विरोध किया। हकीकत में यही वजह थी कि तत्कालीन सरकार ने सभी जीएम फसलों के खेतों में परीक्षण को 10 वर्ष के लिए स्थगित कर दिया था। भारतीय बीटी बैगन अब बांग्लादेश और फिलिपींस में जमकर उगाया जा रहा है।

ऐसे प्रतिगामी कदमों की देश ने भारी कीमत चुकाई है। कुछ प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियां जो देश में कपास क्रांति लाने वाले बीटी-कॉटन समेत जीन संव​र्द्धित फसलों के विकास से जुड़ी रही हैं उन्होंने भारत से अपना कारोबार समेट लिया और अन्य देशों में चली गईं। इसके अलावा भारत ने विकास के अलग-अलग चरणों से गुजर रही कई जीएम किस्मों और हाइब्रिड फसलों की मंजूरी भी रोक दी। ऐसे में किसान भी इनकी खेती से होने वाले वाणि​ज्यिक लाभ से वंचित हो गए। माना जा सकता है कि नीतियों में इस बदलाव से बेहतर जीन वाली खाद्य और वा​णि​ज्यिक फसलों का इस्तेमाल शुरू हो सकेगा तथा एक और तकनीक समृद्ध हरित क्रांति देखने को मिलेगी।

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First Published - December 13, 2022 | 11:04 PM IST

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