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Budget 2024: अंतरिम बजट में वित्त मंत्री ने निकाला बीच का रास्ता

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FM ने 2024 चुनाव में सत्तारूढ़ दल के लिए राजनीतिक लाभ हासिल करने के उद्देश्य से उपलब्धियों की घोषणा करते हुए भी चुनावी विवशताओं को सरकारी वित्त के साथ खिलवाड़ नहीं करने दिया।

Last Updated- February 02, 2024 | 10:58 PM IST
Union Budget

स्वतंत्र भारत में अब तक 15 अंतरिम बजट प्रस्तुत किए गए हैं। इनमें से आठ आम चुनावों के बाद नई चुनी सरकारों ने पेश किए। उन अवसरों पर अंतरिम बजट पेश करना जरूरी था क्योंकि वित्त मंत्री के पास पूरे वर्ष का बजट पेश करने और उसे समय रहते संसद से मंजूरी दिलाने का समय नहीं था। शेष सात अंतरिम बजट आम चुनाव के पहले पेश किए गए और बजट भाषण सत्ताधारी दल के लिए बजट भाषण में चुनावी लाभ लेने का आसान उपाय बन गए।

परंतु वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा गुरुवार को प्रस्तुत अंतरिम बजट में बीच का रास्ता चुनने का साहसिक प्रयत्न किया गया। उनका 55 मिनट लंबा भाषण अब तक के सबसे लंबे अंतरिम बजट (98 पैराग्राफ) से केवल एक पैराग्राफ छोटा था। अब तक का सबसे लंबा अंतरिम बजट पीयूष गोयल ने फरवरी 2019 में पेश किया था।

सीमारमण ने अंतरिम बजट में कोई नया कर नहीं लगाने या नई योजनाओं की घोषणा नहीं करने की परंपरा का पालन किया। दिलचस्प बात है कि उनके बजट भाषण में भाग ब भी शामिल था जो कर उपायों के लिए जाना जाता है। परंतु गोयल के बजट भाषण के भाग ब में कुछ प्रत्यक्ष कर बदलावों के उलट उन्होंने किसी कर दर में बदलाव नहीं किया। उन्होंने 31 मार्च, 2024 को समाप्त हो रही कर रियायतों और लाभों को एक वर्ष आगे अवश्य बढ़ाया।

उन एक करोड़ करदाताओं को अवश्य कुछ राहत मिली जिनके सरकार के साथ कर बकाया विवाद अब निपट जाएंगे। यह कदम मध्यवर्गीय भारतीयों के लिए उल्लेखनीय वित्तीय लाभ ला सकता है। वित्त मंत्री ने इस कदम को यह कहते हुए उचित ठहराया कि इससे जीवन और कारोबार दोनों सुगम होंगे तथा करदाताओं को मिलने वाली सेवा भी बेहतर होगी। विगत 10 वर्षों का कुल विवादित व्यक्तिगत आय कर बकाया 22,000 करोड़ रुपये से अधिक है। यह समझदारी भरा कदम है क्योंकि बिना राजकोष को कुछ खास नुकसान पहुंचाए यह करदाताओं के हित में होगा।

वित्त मंत्री के राजकोषीय मजबूती के प्रयासों में भी ऐसी समझदारी देखने को मिली। अब जबकि उन्होंने 2023-24 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 5.8 फीसदी के बराबर कर पाने में सफलता पाई जबकि बजट अनुमान 5.9 फीसदी का था। ऐसा मोटे तौर पर रिजर्व बैंक से हासिल उच्च लाभांश की बदौलत हुआ जिसने 2023-24 में केंद्र सरकार के गैर कर राजस्व में 32 फीसदी का इजाफा किया। पूंजीगत व्यय में 28 फीसदी की धीमी गति से हुई वृद्धि ने भी मदद की। बजट में इसके 33 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया था।

सीतारमण ने बजट को पारदर्शी भी बनाए रखा। अतिरिक्त बजट संसाधनों का भी कोई सहारा नहीं है। दरअसल 2016-17 से 2021-22 तक बजट द्वारा जुटाए गए करीब 1.38 लाख करोड़ रुपये के संचित बजट से इतर संसाधनों को निपटा दिया गया है और 2021-22 के बाद ऐसा कोई नया उपाय नहीं है।

पिछले कुछ वर्षों के केंद्र सरकार के संचित कर बकाये (करीब 7,150 करोड़ रुपये) को भी निपटा दिया गया है, हालांकि इसके कारण 2023-24 में केंद्र के विशुद्ध कर राजस्व में कमी आई। सरकार के राजस्व घाटे को 2020-21 के जीडीपी के 4.4 फीसदी से कम करके 2023-24 में 2.8 फीसदी पर लाना भी सराहनीय कदम है।

वित्त मंत्री ने 2025-26 के लिए राजस्व आंकड़ों को जिस प्रकार पेश किया उसमें रूढ़िवादी रुख नजर आया। 2024-25 में केंद्र सरकार के विशुद्ध कर राजस्व में 12 फीसदी की वृद्धि हकीकत के उतनी ही करीब है जितनी कि अगले वर्ष गैर कर राजस्व में 6 फीसदी की वृद्धि। ज्यादा दिलचस्प बात यह है कि राजकोषीय घाटे को कम करने का लक्ष्य केवल राजस्व में सुधार के जरिये नहीं बल्कि व्यय में कमी के जरिये भी हासिल किया जाना है।

वर्ष 2024-25 में कुल व्यय में केवल छह फीसदी इजाफा होने की उम्मीद है जो 2023-24 के सात फीसदी से कम है। यह कमी पूंजीगत व्यय वृद्धि को 17 फीसदी पर सीमित रखने से संभव होगा जबकि चालू वर्ष में यह 28 फीसदी है। व्यय के घटक में बदलाव भी दिलचस्प है। अगले वर्ष राजस्व व्यय 3.25 फीसदी के साथ थोड़ा ज्यादा रहेगा। इस वर्ष इसमें 2.5 फीसदी की वृद्धि हुई जबकि अगले वर्ष पूंजीगत व्यय में कमी आएगी।

इस अंतरिम बजट का एक अहम पहलू यह है कि केंद्र सरकार ने कर संग्रह में उछाल को राज्यों को साथ साझा करने में हिचक नहीं दिखाई। 2023-24 में राज्यों को कर आवंटन में 16 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। ऐसा सरकार के पिछला बकाया निपटाने की वजह से हुआ। अगले वर्ष भी इसमें 10 फीसदी इजाफा होने की संभावना है।

विभिन्न योजनाओं के तहत केंद्र की ओर से राज्यों को फंड हस्तांतरण में भी इस वर्ष 15 फीसदी का इजाफा हुआ और अगले वर्ष इसमें 8 फीसदी उछाल आएगी। कुछ राज्यों को दूसरों से ज्यादा हिस्सा मिला होगा लेकिन एक स्वागतयोग्य कदम में राज्यों को केंद्र का हस्तांतरण मजबूत बना रहा है।

बहरहाल अंतरिम बजट से दो चिंताएं उत्पन्न होती हैं। पहली, केंद्र सरकार का कुल कर्ज 2023-24 में जीडीपी के 58.1 फीसदी के असामान्य रूप से ऊंचे स्तर पर रहा और 2024-25 में इसमें मामूली गिरावट आएगी तथा यह 57.2 फीसदी रहेगा। राजकोषीय समेकन पर पिछली आधिकारिक समिति ने जीडीपी के 40 फीसदी के बराबर लक्ष्य तय किया था और ऐसी कोई स्पष्ट राह नहीं है कि जिसे सरकार ने उस लक्ष्य को हासिल करने के लिए निर्धारित किया हो।

वित्त मंत्रालय ने विधि के तहत तय लक्ष्यों का पालन करने के लिए राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन अधिनियम के एस्केप क्लॉज ( किसी पक्षकार के अनुबंध से बच निकलने का प्रावधान) का इस्तेमाल करना चाहा है। मध्यम अवधि का व्यय फ्रेमवर्क स्थापित करने के बजाय उसने केवल सरकार की यह प्रतिबद्धता दोहराई है कि वह 2025-26 तक राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.5 फीसदी के स्तर तक लाने का प्रयास करेगी।

दूसरा वित्त मंत्री कुछ अहम क्षेत्रों के आवंटन को लेकर रूढ़िवादी नजर आईं। 2024-25 में रक्षा क्षेत्र के आवंटन में कोई खास वृद्धि देखने को नहीं मिली। भूराजनीतिक जोखिम बढ़ने के साथ उच्च रक्षा आवंटन की जरूरत की अनदेखी कर दी गई। ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि खाद्य, उर्वरक और पेट्रोलियम सब्सिडी के लिए अंडर प्रॉविजनिंग देखने को मिली।

राजकोषीय अर्थशास्त्री जो केवल घाटा कम करने पर केंद्रित हैं, वे 2024-25 में इन सब्सिडी में करीब 8 फीसदी गिरावट का स्वागत कर सकते हैं। बहरहाल, ऐसे वर्ष में इन सब्सिडी में कमी को लेकर प्रश्न चिह्न लग सकता है जब इन जिंसों की कीमतों पर दबाव बना हुआ है। यह बात इन सब्सिडी के आकलन को गड़बड़ कर सकती हैं।

इन चिंताओं को छोड़ दिया जाए तो सीतारमण का पहला अंतरिम बजट आम चुनाव के पहले पेश किए गए पिछले कुछ बजटों से अलग है। आगामी आम चुनाव में सत्ताधारी दल के लिए राजनीतिक लाभ हासिल करने के उद्देश्य से उपलब्धियों की घोषणा करते हुए भी उन्होंने चुनावी विवशताओं को सरकारी वित्त के साथ खिलवाड़ करने की इजाजत नहीं दी।

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First Published - February 2, 2024 | 9:09 PM IST

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