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बेहतर व्यापारिक प्रदर्शन की संभावना

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भारत की बात करें तो इस अवधि में हमारा निर्यात 1.3 अरब डॉलर से बढ़कर 8.9 अरब डॉलर हुआ। कुल गैर चीनी आयात का यह केवल 5.5 फीसदी था।

Last Updated- April 11, 2024 | 11:14 PM IST
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विश्व व्यापार संगठन ने 2024 के लिए व्यापार के आकार में वृद्धि के अपने अनुमान को संशोधित किया है। उसने इसे गत अक्टूबर के 3.3 फीसदी वृद्धि से घटाकर 2.6 फीसदी कर दिया है। वैश्विक व्यापार में धीमी वृद्धि जहां संभावनाओं को प्रभावित करेगी, वहीं भारत को उभरते परिदृश्य पर ध्यान देना चाहिए।

उदाहरण के लिए अमेरिका और चीन के बीच कारोबारी जंग के हालात हैं। ऐसा कम से कम बीते पांच साल से हो रहा है। इसकी शुरुआत अमेरिका ने जुलाई और अगस्त 2018 में चुनिंदा चीनी वस्तुओं के आयात पर 25 फीसदी शुल्क लगाकर की थी। खासतौर पर मध्यवर्ती वस्तुओं पर। अगले वर्ष और शुल्क लगाया गया।

कुल मिलाकर आयात पर करीब 350 अरब डॉलर मूल्य का असर पड़ा। परंतु ऐसे शुल्क के उपभोक्ता कीमतों पर पड़ रहे असर को देखकर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने शुल्क वृद्धि को योजना के मुताबिक आकार देना रोक दिया।

ऐसे में अगर लैपटॉप कंप्यूटर, कंप्यूटर मॉनिटर, मोबाइल फोन, वीडियो गेम कंसोल और खिलौनों की बात करें तो वे उच्च आयात शुल्क के दायरे में नहीं आए जबकि दिसंबर 2019 में इन पर शुल्क बढ़ाने की योजना बनाई गई थी।

हालांकि कई वस्तुएं कभी भी उच्च शुल्क के दायरे में नहीं आईं लेकिन इन वस्तुओं की आपूर्ति श्रृंखला में परिवर्तन आया। ऐसे में चीन से मोबाइल फोन का आयात 10 से 15 फीसदी की रफ्तार से बढ़ता रहा जबकि शेष विश्व से होने वाले आयात में 70 फीसदी तक का इजाफा हो गया।

भारत के लिए प्रासंगिक बात यह है कि जोखिम के हटने की इस प्रक्रिया में हम अपेक्षाकृत छोटे हैं। औद्योगिक समूह इंडिया सेल्युलर ऐंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन (आईसीईए) द्वारा बीते कुछ वर्षों के दौरान प्रकाशित कुछ रिपोर्टों ने इस बात को रेखांकित किया है कि भारत का निर्यात बढ़ा है लेकिन इस व्यापारिक पुनर्गठन के लाभ में अधिक हिस्सेदारी वियतनाम जैसे देशों के पास चली गई।

जैसा कि इस समाचार पत्र ने भी प्रकाशित किया था, ताजा आंकड़े दर्शाते हैं कि वियतनाम का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 2018 के 12.1 अरब डॉलर से बढ़कर 2023 में 51.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह इस अवधि में अमेरिका को हुए कुल गैर चीनी आयात का 28 फीसदी था।

भारत की बात करें तो इस अवधि में हमारा निर्यात 1.3 अरब डॉलर से बढ़कर 8.9 अरब डॉलर हुआ। कुल गैर चीनी आयात का यह केवल 5.5 फीसदी था। अमेरिका में आपूर्ति करने वाली कंपनियां स्वेच्छा से अपने कलपुर्जों में चीनी सामान का इस्तेमाल कम कर रही हैं।

आपूर्ति श्रृंखला में चीन का स्थान लेने के मामले में अन्य देश भारत से बेहतर प्रदर्शन कैसे कर रहे हैं? इसकी दो वजह नजर आती हैं। पहली, अगर उनके पास कम और स्थिर शुल्क दर वाली व्यापार व्यवस्था है।

स्वाभाविक रूप से यह बात मैक्सिको जैसे देशों को फायदा पहुंचाती है जो पहले से कारोबारी समझौते वाले हैं। यह वियतनाम जैसे देशों को भी लाभ पहुंचाता है जिन्होंने कम शुल्क दर वाली व्यापार नीति अपनाई है। कंपनियां नहीं चाहती हैं कि वे दरों में बदलाव या प्रतिबंधों से प्रभावित हों। बहरहाल, भारत ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने को ध्यान में रखते हुए शुल्क बढ़ाया है। दूसरी वजह है व्यापक कारोबारी माहौल।

भारत ऐपल तथा उसके लिए काम करने वाली कंपनियों को लुभाने में कामयाब रहा है। 2018 से अब तक इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में सात गुना इजाफा हुआ है जिसे इससे जोड़ा जा सकता है। परंतु अपनी कारोबार समर्थक नीतियों के साथ अन्य समतुल्य देशों ने अच्छा प्रदर्शन किया है।

उदाहरण के लिए सैमसंग और एलजी दोनों ने अपने संयंत्र स्थानांतरित करने के लिए वियतनाम को चुना। सैमसंग वियतनाम से 123 देशों को निर्यात करती है जबकि भारत से केवल दो दर्जन देशों को। भारत के लिए यहां एक अवसर है कि वह अमेरिका के कारण चीन से दूरी बना रही कंपनियों का लाभ ले। परंतु जैसे-जैसे भारत के प्रतिस्पर्धी देशों में निवेश सफल होगा, भारत के लिए अवसर सीमित होते जाएंगे।

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First Published - April 11, 2024 | 11:14 PM IST

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