अमेरिकी सरकार ने वहां काम करने के लिए जरूरी एच-1बी वीजा जारी करने की व्यवस्था में मंगलवार को कुछ अहम बदलावों की घोषणा की। अब तक ये वीजा एक लॉटरी के जरिये आवंटित किए जाते थे जिसमें सभी आवेदकों को चुने जाने वाले 65,000 लोगों में जगह बनाने का समान अवसर मिलता था। परंतु अब इस लॉटरी की जगह एक अलग प्रक्रिया अपनाई जा रही है जिसके तहत जिन आवेदकों को अधिक वेतन की पेशकश की गई होगी तथा जिनके पास बेहतर कौशल होंगे उन्हें वीजा मिलने की संभावना अधिक होगी। यह नियम दो महीने में लागू होगा ताकि यह अगली निर्धारित लॉटरी की जगह ले सके।
अमेरिका के दृष्टिकोण से, यह एक ऐसा बदलाव है जो स्वाभाविक आर्थिक तर्क से मेल खाता है और एच-1बी कार्यक्रम के मूल उद्देश्य के अनुरूप है, अर्थात् यह सुनिश्चित करना कि अमेरिकी कंपनियां प्रतिस्पर्धी बनी रहें। यदि वीजा की संख्या कृत्रिम रूप से कम कर दी जाती है, तो अमेरिका के लिए अधिकतम लाभ तभी संभव होगा जब उन्हें सबसे दुर्लभ और मूल्यवान कौशलों को आवंटित किया जाए। इन्हें सबसे अच्छी तरह इस आधार पर आंका जा सकता है कि खुले श्रम बाजार में उन कौशलों को कितना महत्त्व दिया जाता है।
ऐसे मामलों में आर्थिक कारण को आसानी से समझा जा सकता है लेकिन इस बात को राजनीतिक संदर्भ से अलग करके देखना संभव नहीं। यह अनिवार्य रूप से अमेरिका में भारतीय कंपनियों और कामगारों के खिलाफ लंबे विरोध का हिस्सा माना जाएगा, विशेषकर तब जब उच्च-कौशल वाले आप्रवासन का विषय लगभग एक वर्ष पहले पहली बार उठाया गया था और राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के चुनावी गठबंधन के भीतर इस पर तीव्र आंतरिक टकराव देखा गया था। हाल के सप्ताहों में राष्ट्रपति की ओर से एक घोषणा की गई थी जिसने नए एच-1बी वीजा के नियोक्ताओं के लिए लागत बढ़ा दी।
इसके तहत एच-1बी वीजा आवेदन की लागत को 1,00,000 डॉलर तक बढ़ा दिया गया। व्यापक परिप्रेक्ष्य में, अमेरिका में प्रवासन के कई अन्य रूप भी बंद किए जा रहे हैं। जैसे तथाकथित ‘डायवर्सिटी वीजा’, जो छोटे देशों के लिए अवसर खोलता था, उसे पिछले सप्ताह समाप्त कर दिया गया। परंतु एच-1बी वीजा खासतौर पर विवाद का विषय बन गया है क्योंकि व्यापक तौर पर यह धारणा है कि बड़ी भारतीय आईटी सक्षम सेवा कंपनियों द्वारा उनका दुरुपयोग और हेरफेर किया जा रहा था।
ब्लूमबर्ग की एक जांच के मुताबिक गत वर्ष इस तरह के 65,000 वीजा में से 11,600 बड़ी आउटसोर्सिंग कंपनियों को जारी किए गए जबकि 22,600 अन्य वीजा आईटी कर्मचारी रखने वाली कंपनियों को गए जो इसी क्षेत्र से संबंधित हैं। इनमें से कइयों ने एक ही इंजीनियर के लिए कई आवेदन किए थे। बड़ी कंपनियों ने भी हर साल बहुत अधिक संख्या में आवेदन जमा किए, जो कुछ मामलों में उनके मौजूदा कार्यबल के आधे से भी अधिक थे। इन्होंने पूरे तंत्र को भर दिया और वीजा हासिल करने की अपनी संभावनाओं को अत्यधिक बढ़ा लिया। पिछले वर्ष की लॉटरी प्रविष्टियों में से आधे से अधिक उन व्यक्तियों के लिए थीं जिनका नाम एक से अधिक बार प्रस्तुत किया गया था। यह व्यवस्था न तो राजनीतिक रूप से टिकाऊ है और न ही किसी अन्य ढंग से।
वर्तमान बदलावों के अदालत में टिके रहने की चाहे जो संभावना हो लेकिन यह संभावना बहुत कम है कि लॉटरी बिना बदलावों के बरकरार रहेगी। सच तो यही है कि भारतीय आईटीईएस ने अपने अमेरिकी ग्राहकों की सेवा के लिए एक पुराना व्यापार मॉडल बनाए रखा है और अब एच-1बी वीजा के वास्तविक आवेदकों को इसकी कीमत चुकानी होगी। इन बदलावों की खबर आने के बाद आईटी क्षेत्र के कुछ शेयर लगातार कई दिनों तक गिरे हैं। परंतु समग्र प्रभाव न्यूनतम रहा है। यह निवेशकों की उस उम्मीद को दर्शाता है कि भारतीय आईटीईएस क्षेत्र आय का एक नया, अधिक आधुनिक तरीका विकसित करने में सक्षम होगा। कंपनियों को उन्हें निराश नहीं करना चाहिए।