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Editorial: चावल पर प्रतिबंध का प्रभाव

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भारत पिछले कुछ समय में दुनिया का शीर्ष चावल निर्यातक रहा है और उसने वैश्विक व्यापार का करीब 40 फीसदी अनाज निर्यात किया। वर्ष 2022-23 में उसने 2.23 करोड़ टन चावल निर्यात किया।

Last Updated- July 27, 2023 | 10:03 PM IST
Principal Commodity export: Now the export of principal commodity started increasing, export of non-basmati rice also improved from before अब बढ़ने लगा प्रमुख कमोडिटी का निर्यात, गैर बासमती चावल का निर्यात भी पहले से सुधरा

सरकार ने बासमती तथा उसना चावल को छोड़कर हर प्रकार के चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार का यह निर्णय राजनीतिक बाध्यताओं से प्रेरित है। ऐसा शायद इसलिए किया गया है ताकि कुछ अहम राज्यों के विधानसभा चुनावों और अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव के पहले घरेलू आपूर्ति और कीमतों का बचाव किया जा सके। परंतु इसका असर पूरी दुनिया में महसूस किया जा रहा है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल की कीमतें 11 वर्ष के उच्चतम स्तर पर हैं तथा उनमें और इजाफा होने लगा है। कुछ मामलों में तो जो माल रास्ते में है उसकी कीमत भी 50 से 100 डॉलर प्रति टन तक बढ़ गई है। भारत पिछले कुछ समय में दुनिया का शीर्ष चावल निर्यातक रहा है और उसने वैश्विक व्यापार का करीब 40 फीसदी अनाज निर्यात किया। वर्ष 2022-23 में उसने 2.23 करोड़ टन चावल निर्यात किया। उसके अचानक इस बाजार से बाहर हो जाने से वैश्विक आपूर्ति में करीब एक करोड़ टन की कमी आएगी।

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गैर खुशबूदार चावल के अन्य निर्यातकों में थाईलैंड और वियतनाम के पास इस कमी को पूरा करने के लिए पर्याप्त चावल का भंडार नहीं है। इसके परिणामस्वरूप खाद्यान्न की अंतरराष्ट्रीय कीमतें जो पहले ही मौसम के कारण उपज से जुड़ी अनिश्चितताओं, रूस द्वारा यूक्रेन को काला सागर बंदरगाहों के जरिये अनाज निर्यात की इजाजत वापस लेने के कारण बढ़ी हुई थीं उनमें और तेजी आई है। इससे खाद्यान्न संकट से जूझ रहे देशों की चिंताएं बढ़ेंगी। खासतौर पर छोटे अफ्रीकी देशों की जो भारत से आने वाले अनाज पर निर्भर करते हैं।

आश्चर्य नहीं कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भारत द्वारा निर्यात प्रतिबंध को लेकर आक्रामक रुख दिखाया और कहा कि इससे वैश्विक खाद्य कीमतों की अस्थिरता की स्थिति और बिगड़ सकती है। उन्होंने भारत से कहा है कि उसे यह प्रतिबंध हटा लेना चाहिए। देश में भी सरकार के कदम को समझदारी भरा नहीं माना जा रहा है।

इसकी कई वजह हैं। एक बात तो यह कही जा रही है कि ऐसा करके भारत आकर्षक वैश्विक कीमतों से फायदा उठाने से चूक रहा है। इसके अलावा यह इस लिहाज से भी नुकसानदेह हो सकता है क्योंकि किसान धान की खेती का रकबा बढ़ाने को लेकर हतोत्साहित होंगे और वे उपज बढ़ाने वाले साधनों का प्रयोग भी नहीं करेंगे। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इससे खाद्यान्न के विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता और विश्वसनीय व्यापारिक साझेदार की भारत की छवि को भी नुकसान पहुंचेगा।

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इसमें दो राय नहीं है कि चावल की घरेलू कीमतों में साल भर में करीब 11.5 फीसदी का इजाफा हुआ है लेकिन इस इजाफे की एक वजह न्यूनतम समर्थन मूल्य में इजाफा भी है। निश्चित रूप से स्थानीय बाजारों में चावल की कोई कमी नहीं है। इसी प्रकार भारतीय खाद्य निगम के कुल अनाज भंडार में कमी आई है लेकिन चावल का भंडार अभी भी 4.1 करोड़ टन से अधिक है यानी 1.35 करोड़ टन की बफर स्टॉक सीमा से काफी अधिक। यह सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए सरकार की 3.6 से 3.8 करोड़ टन की आवश्यकता से काफी अधिक है।

यह आशंका भी कमजोर हुई है कि उभरते अल नीनो प्रभाव के कारण मॉनसून तथा धान की खेती प्रभावित होगी। अब तक तो मॉनसून देश भर में सामान्य से बेहतर रहा है और धान की बोआई उन इलाकों में भी काफी अच्छी है जहां पिछले साल यह इस समय कमजोर रही थी। ऐसे में सरकार को यही सलाह होगी कि वह बाजार को ऐसे झटके देने वाले निर्णय न ले और यह सुनिश्चित करे कि घरेलू और बाहरी खाद्यान्न व्यापार नीतियों में स्थिरता बरकरार रहे।

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First Published - July 27, 2023 | 10:03 PM IST

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