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अर्थतंत्र: अंतरिम बजट, महामारी का दौर और राजकोषीय नीति का पुनर्गठन

महामारी के दौरान सरकार के लिए वित्तीय स्थिति का प्रबंधन करना काफी मुश्किल रहा। इन हालात के लिए कोई पुराना संदर्भ उपलब्ध नहीं था।

Last Updated- January 28, 2024 | 8:44 PM IST
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आगामी अंतरिम बजट नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के दूसरे कार्यकाल की राजकोषीय नीति संबंधी अंतिम कवायद होगी। इसके साथ ही हालिया इतिहास में राजकोषीय प्रबंधन के मामले में सबसे मुश्किल पांच वर्ष के कार्यकाल का अंत हो जाएगा। हालांकि सरकार अभी भी कोविड-19 महामारी के कारण लगे झटकों से उबर रही है और ऐसे में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के नेतृत्व में नीतिगत प्रतिष्ठान, खासकर वित्त मंत्रालय की इस बात के लिए सराहना की जानी चाहिए कि उसने हालात का सही ढंग से प्रबंधन किया।

महामारी के दौरान सरकार के लिए वित्तीय स्थिति का प्रबंधन करना काफी मुश्किल रहा। इन हालात के लिए कोई पुराना संदर्भ उपलब्ध नहीं था। वर्ष 2008 में आए वैश्विक वित्तीय संकट का यहां खास इस्तेमाल नहीं था क्योंकि वह केवल एक वित्तीय संकट था। यहां हालात ऐसे थे जहां पूरा देश लॉकडाउन के तहत बंद था। इसके अलावा शुरुआत में वायरस को लेकर भी बहुत सीमित समझ थी। भारत इन हालात से जूझने वाला इकलौता देश नहीं था।

इसका अर्थ यह था कि कारोबार पूरी तरह ठप थे, केवल जरूरी काम ही संचालित हो रहे थे। इस वजह से बहुत बड़े पैमाने पर बेरोजगारी आई, खासतौर पर छोटे उपक्रमों और शारीरिक संपर्क वाले उपक्रम ठप हुए। ऐसे में मध्यम अवधि को लेकर कोई आर्थिक अनुमान लगाना लगभग असंभव था। विकसित देशों की सरकारों ने वित्तीय हालात की परवाह किए बिना जमकर सहायता कार्यक्रम शुरू किए।

भारत के पास वह विकल्प नहीं था। सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में हमारा कर्ज और सरकारी बजट घाटा, दोनों ऊंचे स्तर पर थे और भारी भरकम घाटा वित्तीय स्थिरता के लिए जोखिम पैदा कर सकता था। यह याद रखने की जरूरत है कि बजट प्रबंधकों को केवल व्यय की चिंता करने की आवश्यकता नहीं थी। राजस्व देशव्यापी बंदी के कारण भी दबाव में था।

कई प्रभावशाली अर्थशास्त्रियों ने कहा था कि ऋण का मुद्रीकरण किया जाए और जीडीपी का 5 से 10 फीसदी हिस्सा राहत और मांग को समर्थन देने में व्यय किया जाए। भारत के नीतिगत प्रबंधकों ने तमाम बौद्धिक आह्वानों के बावजूद वह रास्ता न चुनकर अच्छा किया। उन्होंने समाज के सबसे वंचित तबके को नि:शुल्क अनाज और नकद सहायता देने का सही रास्ता चुना। भारत को मुश्किलों का सामना इसलिए करना पड़ा कि हमारे यहां चिकित्सा क्षमता की कमी थी लेकिन किसी भी राजकोषीय हस्तक्षेप से रातोरात यह क्षमता नहीं विकसित की जा सकती थी।

चाहे जो भी हो केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा 2019-20 में जीडीपी के 4.6 फीसदी से बढ़कर 2020-21 में 9.2 फीसदी हो चुका था। यह बढ़ोतरी आंशिक तौर पर बही खातों को साफ करने और बजट से इतर उधारी के अंकेक्षण के कारण थी। खुशकिस्मती है कि समय के साथ वायरस को लेकर समझ बेहतर हुई और वैज्ञानिक पहल के कारण अर्थव्यवस्था खुल सकी। इससे आर्थिक गतिविधियों में बेहतरी आई और राजस्व में सुधार हुआ।

सरकार इसी परिदृश्य में चालू वर्ष में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 5.9 फीसदी के स्तर पर थामना चाहती है। इसमें कमी के धीमा होने के लिए एक हद तक पूंजीगत व्यय को वजह माना जा सकता है। विशुद्ध संदर्भ में देखें तो 2018-19 और 2023-24 के बीच केंद्र सरकार का पूंजीगत व्यय तीन गुना हो गया। सरकार ने महामारी के बाद आर्थिक सुधार को प्राथमिकता देते हुए पूंजीगत व्यय बढ़ाया।

बहरहाल, अब जबकि अर्थव्यवस्था अनुमान से तेज गति से बढ़ रही है तो वक्त आ गया है कि राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की प्रक्रिया को तेज किया जाए। आगामी बजट इसके लिए बेहतर अवसर हो सकता है। वित्त मंत्री ने कहा है कि उद्योग जगत को बजट में किसी बड़ी घोषणा की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। सरकार भी अगर आम चुनाव के पहले लोकलुभावन घोषणाओं से बचे तो बेहतर होगा।

सरकार का इरादा है कि राजकोषीय घाटे को 2025-26 तक जीडीपी के 4.5 फीसदी से कम स्तर पर लाया जाए। इसका अर्थ यह है कि अगले दो वर्षों के दौरान सालाना औसतन 0.7 फीसदी का सुदृढ़ीकरण करना होगा। चालू वर्ष में इसमें 0.5 फीसदी की मजबूती आई। ऐसी कई वजह हैं जिनके चलते सरकार को सुदृढ़ीकरण की गति मजबूत करनी होगी।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमानों के मुताबिक आम सरकारी व्यय 2022-23 में जीडीपी के 81 फीसदी से बढ़कर 2024-25 में 82.4 फीसदी हो सकता है। सुदृढ़ीकरण की धीमी प्रक्रिया के कारण कर्ज का स्तर तेजी से कम नहीं होगा और वृहद आर्थिक जोखिम बरकरार रहेगा। इतना ही नहीं ऊंचा कर्ज समय के साथ ब्याज भुगतान के आवंटन की मांग करता है जिससे अन्य प्रतिबद्धताओं के लिए संसाधन कम रह जाएंगे। केंद्र सरकार की ब्याज देनदारी पहले ही 2019-20 के राजस्व के 36 फीसदी से बढ़कर 2023-24 में 41 फीसदी से अधिक हो चुकी है। भविष्य में कोई भी इजाफा सरकार के लिए हालात मुश्किल बनाएगा।

निश्चित तौर पर अधिक महत्त्वाकांक्षी सुदृढ़ीकरण मार्ग तैयर करना आसान नहीं होगा और इसके लिए व्यय के मोर्चे पर समायोजन करना होगा। यह ध्यान देने लायक होगा कि सांख्यिकी कार्यालय के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में नॉमिनल वृद्धि दर के 8.9 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया है जबकि 2022-23 में यह 16.1 फीसदी था। ऐसा मोटे तौर पर वैश्विक थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति दर में गिरावट के कारण हुआ है।

चूंकि भारतीय रिजर्व बैंक ने उचित ही यह दर्शाया है कि वह चार फीसदी की उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति को लेकर प्रतिबद्ध रहेगा, तो ऐसे में सरकार को निरंतर टिकाऊ नॉमिनल वृद्धि नहीं मिल सकती। उच्च नॉमिनल वृद्धि से न केवल राजस्व में इजाफा होता है बल्कि अर्थव्यवस्था का आकार भी तेज गति से बढ़ता है। इससे घाटे के लक्ष्य को हासिल करना आसान होता है।

कम मुद्रास्फीति से कर संग्रह में कमी आएगी। कर में निरंतर एक खास अवधि के बाद ही फलीभूत होगा। केंद्र सरकार का कर संग्रह दो दशक से जीडीपी के 10-11 फीसदी के करीब बना हुआ है। ऐसे में तेज सुदृढ़ीकरण के लिए व्यय समायोजन जरूरी होगा। यह आसान नहीं होगा लेकिन जवाबदेह राजकोषीय प्रबंधन के अगले चरण के लिए यह आवश्यक है।

First Published - January 28, 2024 | 8:44 PM IST

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