बजट पेश होने के बाद 1 फरवरी, रविवार को बाजार में भयंकर बिकवाली दिखी। शेयर निवेशकों को पूंजीगत लाभ कर के मोर्चे पर कोई बदलाव नहीं दिखना निराशा का सबसे बड़ा कारण नजर आया। ज्यादातर कारोबारी डेरिवेटिव सौदों पर प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) में भारी बढ़ोतरी से आश्चर्यचकित और 17.2 लाख करोड़ रुपये की भारी भरकम उधारी से भी चिंतित हैं। कई लोगों को लगता है कि ब्याज दरें बढ़ेंगी क्योंकि 17.2 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े में 1.3 लाख करोड़ रुपये के अल्पकालिक उधार या ट्रेजरी-बिल शामिल नहीं हैं।
माना जा रहा था कि इस बजट में कुछ लक्षित प्रोत्साहनों के माध्यम से विदेशी पूंजी, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) को आकर्षित करने के उपाय होंगे। सितंबर 2024 से एफपीआई 40 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के शेयर बेच चुके हैं और भारत में पिछले 5 वर्षों से भी अधिक समय में शुद्ध एफपीआई नहीं आया है।
एफडीआई जरूर आया है मगर शुद्ध निवेश 10 अरब डॉलर प्रति वर्ष से कम है जो भारत जैसे क्षमतावान देश के लिए बहुत कम है। हम एक अस्थिर भू-राजनीतिक और आर्थिक हालात से गुजर रहे हैं और व्यापक आर्थिक बुनियाद मजबूत होने के बावजूद रुपया फिसलता जा रहा है। इन पर विचार करते हुए विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए भारत को विशेष ध्यान देना होगा क्योंकि हमारे देश की आर्थिक तरक्की के लिए यह बहुत जरूरी है।
बजट के गणित की बात करें तो यह तर्कसंगत लगता है। हमने वित्त वर्ष 2026 में राजकोषीय घाटा 4.4 फीसदी तक समेटने का लक्ष्य हासिल करने के बाद अगले वित्त वर्ष के लिए इसे और कम कर 4.3 फीसदी तक रखने का अनुमान लगाया है। वित्त वर्ष 2027 के लिए नॉमिनल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर 10 फीसदी रहने और सकल कर राजस्व में 8 फीसदी की वृद्धि का अनुमान है (जिसमें निगम कर और आय कर में क्रमशः 11 फीसदी और 11.7 फीसदी वृद्धि होगी)। अप्रत्यक्ष करों में केवल 2.3 फीसदी की वृद्धि का अनुमान है क्योंकि अब जीएसटी की नई दरें लागू हो गई हैं। कर दरों में कटौती को देखते हुए सकल कर राजस्व घटकर जीडीपी का 11.2 फीसदी हो गया है।
गैर-कर राजस्व सपाट रहा है और केंद्र सरकार की कुल राजस्व प्राप्तियां केवल 5.7 फीसदी बढ़ी हैं। सरकार का कुल व्यय 7.7 फीसदी बढ़कर 53.47 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा। वित्त वर्ष 2027 में सरकार के व्यय में कुल 3.82 लाख करोड़ रुपये बढ़ोतरी होने का अनुमान है। इस बढ़ोतरी में 3.1 लाख करोड़ रुपये केंद्र सरकार के प्रभावी पूंजीगत व्यय (कैपेक्स और पूंजीगत संपत्ति निर्माण के लिए अनुदान सहायता) को बढ़ावा देने में खर्च होंगे। शेष 70,000 करोड़ रुपये से अधिक ब्याज भुगतान में 1.3 लाख करोड़ रुपये के इजाफे के कारण खर्च हो जाएंगे।
इस प्रकार ब्याज भुगतान और अनुदान सहायता में वृद्धि को घटाने के बाद, शुद्ध रूप से केंद्र सरकार ने वास्तव में वित्त वर्ष 2027 में राजस्व व्यय कम करने का बजट बनाया है। यह सब्सिडी में दिखाई देता है जो वास्तव में वित्तीय वर्ष 2027 में 19,240 करोड़ रुपये घटने का अनुमान है। राज्यों का राजस्व व्यय बढ़ रहा है जिसे देखते हुए खर्च पर यह नियंत्रण सराहनीय है।
केंद्र सरकार का पूंजीगत व्यय 11.5 फीसदी बढ़कर 12.2 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। यह रकम काफी हद तक रक्षा पूंजी उपकरणों, सड़कों और रेल पर खर्च होती है। इन तीनों मदों में इजाफा किया गया है। रक्षा पर व्यय 1.86 लाख से बढ़कर 2.19 लाख करोड़ रुपये (18 फीसदी) हो गया है और रेलवे के लिए आवंटन भी 10 फीसदी बढ़कर 2.77 लाख करोड़ कर दिया गया है। सड़कों पर व्यय 8 फीसदी बढ़कर 2.94 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा। पूंजीगत व्यय की तरफ कुल व्यय का मिश्रण वित्त वर्ष 2018 में दर्ज 21 फीसदी से बढ़कर वित्त वर्ष 2027 में 32 फीसदी हो गया है (राज्यों को अनुदान सहायता सहित)। आने वाले समय में यह आंकड़ा लगातार बढ़ाने की क्षमता को लेकर चिंता जरूर है क्योंकि सरकारी पूंजीगत व्यय जीडीपी के 3.2 फीसदी पर स्थिर होता दिख रहा है।
बजट में एकमात्र कमजोरी विनिवेश प्राप्तियों के अनुमान में नजर आ रही है जिसे 80,000 करोड़ रुपये बताया गया है जबकि आरबीआई एवं सार्वजनिक बैंकों से लाभांश मद में 3.16 लाख करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद लगाई गई है। ये दोनों ही अनुमान अधिक दिख रहे हैं। व्यय पर कड़े नियंत्रण के बावजूद सरकार ने ग्रामीण रोजगार गारंटी के लिए आवंटित धन 88,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1,25,692 करोड़ रुपये कर दिया है। जल जीवन मिशन और पीएमएवाई शहरी और ग्रामीण योजनाओं के लिए खर्च में भी भारी वृद्धि हुई है।
संरचनात्मक मुद्दों के लिहाज से बात करें तो शेयर पुनर्खरीद पर कर में बदलाव एक सकारात्मक कदम है। उम्मीद है कि इस कदम से कंपनियां एक बार फिर इस रास्ते पूंजी लौटाने के लिए प्रोत्साहित होंगी। जीसीसी और कैप्टिव इकाइयों के लिए कराधान पर स्थिति साफ करने के लिए एक बहुत ही गंभीर प्रयास किया गया है। इसके लिए ‘सुरक्षित हार्बर प्रावधानों’ के उपयोग और व्यवसाय करने में आसानी में सुधार के लिए कराधान में कई अन्य प्रक्रियात्मक बदलाव किए गए हैं। नया आयकर अधिनियम वित्त वर्ष 2027 में लागू होगा और विभिन्न प्रक्रिया सरल बनाने और गैर-आपराधिक बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। विदेश में शिक्षा और मेडिकल बिलों पर टीसीएस में कटौती स्वागत योग्य कदम हैं।
इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों पर लगातार ध्यान दिया जाना बेहद महत्त्वपूर्ण कदम है। इनके लिए 40,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त आवंटन हुआ है। दुर्लभ खनिज मैग्नेट, रसायन, बायो-फार्मा, सेमीकंडक्टर और पूंजीगत वस्तु क्षेत्रों को विकसित करने में मदद करने के लिए विभिन्न नई योजनाएं हैं। कपड़ा क्षेत्र को मदद देने के लिए एक व्यापक पैकेज का प्रावधान है जबकि एमएसएमई के लिए विभिन्न समर्थन उपायों की घोषणा की गई है। इनमें पूंजी समर्थन के लिए 10,000 करोड़ रुपये और कामकाजी पूंजी की उपलब्धता आसान बनाने के उपाय शामिल हैं।
टियर 2 शहरी केंद्रों, नगर निगम बाॅन्ड के लिए प्रोत्साहन और 7 नए तेज रफ्तार रेल संपर्क (लिंक) मार्गों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। युवाओं के लिए स्वास्थ्य देखभाल खंड में रोजगार का इंतजाम, विश्वविद्यालय टाउनशिप और पर्यटन क्षेत्र की जरूरतों पर ध्यान दिया गया है। भरोसेमंद निर्यातकों के लिए सीमा शुल्क प्रक्रिया सरल बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
बजट में कुछ भी बहुत नकारात्मक नहीं है। यह वित्तीय सुधार के रास्ते पर है और पूंजीगत व्यय पर प्राथमिकता के साथ व्यय की गुणवत्ता में सुधार जारी है। कमजोर राजस्व के अनुमान को देखते हुए कुछ भी भारी बदलाव की गुंजाइश नहीं थी। हालांकि, मुझे लगता है कि निवेशकों को सरकार से कोई बड़ी उम्मीद नहीं दिख रही है। बजट में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसने इस बात का ख्याल रखा है कि भारत वर्तमान में जिस अस्थिर वैश्विक हालात से गुजर रहा है उसका सामना कैसे करेगा और अपने पक्ष में माहौल कैसे बनाएगा।
इस बजट में देश के बारे में वैश्विक निवेशकों के दृष्टिकोण को बदलने के लिए कुछ भी नहीं है। जो नकारात्मक बाते रही हैं वे बनी रहेंगे। वे उच्च मूल्यांकन, पूंजीगत लाभ कर और कमजोर कमाई का हवाला देकर भारतीय बाजार से दूरी बनाएंगे। केंद्र सरकार के पास पूंजीगत व्यय और बढ़ाने की सीमित गुंजाइश के साथ क्या यह बजट निजी क्षेत्र से लंबे समय से थमा पूंजीगत व्यय बढ़ा पाएगा?
हमने प्राथमिक और द्वितीयक दोनों रूपों में एक विश्व स्तरीय शेयर बाजार तैयार किया है। एसटीटी बढ़ाने से केवल 10,000 करोड़ रुपये ही कर के रूप में जुटेंगे मगर कारोबारी मात्रा और लेनदेन से जुड़ी गतिविधियों को काफी नुकसान होगा। घरेलू निवेश के भरोसे कोई जोखिम क्यों लें? यदि हम डेरिवेटिव कारोबार में अटकल कम करना चाहते हैं तो मार्जिन, अनुबंध आकार आदि से जुड़े उपाय भी तो किए जा सकते थे।
भारत कुछ खास शेयरों का बाजार बना रहेगा और कोई बदलाव तभी दिखेगा जब कमाई बढ़ेगी या एआई कारोबार लड़खड़ाएगा। फिलहाल तो सुदृढ़ीकरण का चरण जारी रह सकता है।