वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2026-27 के बजट भाषण में कर और गैर-कर उपायों के माध्यम से अर्थव्यवस्था के विभिन्न उद्योगों में निवेश को प्रोत्साहित करने की योजना प्रस्तुत की है। वैश्विक अनिश्चितताओं और विदेशी पूंजी प्रवाह को प्रोत्साहित करने और बनाए रखने की बढ़ती आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए बजट में रोजगार के बेहतर परिणाम और श्रम बाजार में व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से कृषि, विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों को सहारा देने का प्रस्ताव है।
यहां हम मुख्य रूप से दो प्रकार के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं: पहला, आयकर व्यवस्था में बदलाव से संबंधित है और दूसरा बजट में प्रस्तुत राजकोषीय संतुलन से संबंधित है।
बजट भाषण के भाग बी में आयकर नियमों से संबंधित कई महत्त्वपूर्ण घोषणाएं शामिल हैं। एक महत्त्वपूर्ण घोषणा कंपनियों को पुरानी आयकर प्रणाली से नई प्रणाली अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने से संबंधित है। राजस्व हानि विवरण के अनुसार, पुरानी प्रणाली के अंतर्गत दर्ज कंपनियों की आय का हिस्सा पिछले कुछ वर्षों में लगातार कम नहीं हो रहा है बल्कि सभी आय श्रेणियों में पुरानी प्रणाली के अंतर्गत दर्ज आय का हिस्सा 2022-23 और 2023-24 के बीच बढ़ा है। वर्ष 2023-24 में कुल आय का 38 फीसदी पुरानी प्रणाली के अंतर्गत दर्ज किया गया, जबकि उससे पिछले वर्ष यह 34 फीसदी था। नई प्रणाली की शुरुआत से सरलीकृत प्रणाली को अपनाने के लिए कम कर तथा पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं मिला है।
इस चिंता को दूर करने के लिए, बजट में न्यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) के प्रारूप में बदलाव का प्रस्ताव है। पुरानी व्यवस्था में मैट, कर के अग्रिम भुगतान के रूप में लागू होता था, जिसके लिए बाद के वर्षों में मैट क्रेडिट उपलब्ध होता था। अब आंशिक मैट क्रेडिट केवल नई व्यवस्था अपनाने वाली कंपनियों को ही मिलेगा। जो कंपनियां पुरानी व्यवस्था में बने रहना चाहती हैं, उनके लिए मैट 14 फीसदी की दर से अंतिम कर बन जाएगा, जो वर्तमान 15 फीसदी से थोड़ा कम है। इस बदलाव से उम्मीद है कि कई कंपनियां नई व्यवस्था को अपनाएंगी, जिससे कई व्यवस्थाओं की जटिलता धीरे-धीरे कम हो जाएगी। यह एक सराहनीय बदलाव और उपयोगी प्रोत्साहन है।
आयकर में किए गए दूसरे बदलावों का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर एकीकृत गतिविधियों के लिए बेहतर कारोबारी माहौल बनाने के साथ-साथ देश में विदेशी निवेश को आकर्षित करना है। इनमें दो प्रकार के प्रावधान शामिल हैं। भारत को चुनिंदा प्रगतिशील क्षेत्रों के लिए एक आकर्षक गंतव्य बनाने के उद्देश्य से भारतीय डेटा केंद्रों का उपयोग करके वैश्विक स्तर पर क्लाउड कंप्यूटिंग सेवाएं प्रदान करने वाली विदेशी कंपनियों को 2047 तक लंबी अवधि की कर छूट देने का बजट प्रस्ताव है।
इस लंबी अवधि की कर छूट से भारतीय डेटा केंद्रों में निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए आकर्षक प्रोत्साहन मिल सकता है। इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माताओं के लिए उपकरणों की आपूर्ति पर इनवॉइस मूल्य के 2 फीसदी के लाभ मार्जिन वाले सेफ हार्बर नियम और भारत में टोल विनिर्माण के लिए पूंजीगत वस्तुओं की आपूर्ति पर 2030-31 तक कर छूट से देश में इन गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
आईटी और आईटीईएस देश के लिए विदेशी मुद्रा के प्रमुख स्रोत हैं। इन क्षेत्रों के लिए सेफ हार्बर नियमों के तहत लाभ मार्जिन को तर्कसंगत बनाना और कम करना तथा अग्रिम मूल्य निर्धारण को सुव्यवस्थित करना इस क्षेत्र के विकास को सहारा देने के उद्देश्य से किया जा रहा है।
प्रोत्साहन के लिए क्षेत्रों और खंडों की पहचान की चयनात्मक प्रक्रिया में काफी तैयारी की आवश्यकता है। हालांकि, कर व्यवस्था के अंतर्गत फिर से प्रोत्साहनों की जरूरत चिंता का विषय हो सकती है और इससे अन्य क्षेत्रों को भी शामिल करने के लिए प्रोत्साहन के दायरे को विस्तारित करने के अनुरोध किए जा सकते हैं। नीतियों की प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए इन हस्तक्षेपों की समय-समय पर समीक्षा करना उपयोगी हो सकता है।
वित्त मंत्री 2025-26 में राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.5 फीसदी या उससे कम पर लाने की अपनी प्रतिबद्धता पर कायम रहीं। वर्ष 2025-26 के लिए राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4.4 फीसदी है, जो बजट में निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप है। ऋण-जीडीपी अनुपात के नए राजकोषीय आधार और 2030-31 तक इस अनुपात को 50 फीसदी (1% कम या ज्यादा) तक कम करने के उद्देश्य के साथ, वित्त मंत्री ने चालू वित्त वर्ष में ऋण-जीडीपी अनुपात में 0.5 फीसदी की कमी का मामूली लक्ष्य चुना है, जिससे 2026-27 के लिए राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4.3 फीसदी हो जाता है, जो 2025-26 के लगभग समान स्तर पर होगा। अनिश्चित वैश्विक आर्थिक माहौल को देखते हुए, यह लक्ष्य देश के अल्पकालिक और मध्यम अवधि के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कुछ राजकोषीय गुंजाइश प्रदान करता है। हालांकि, मुख्य आंकड़े से परे कुछ अन्य मुद्दे भी हैं जिन पर विचार करना आवश्यक है।
वर्ष 2026-27के लिए नॉमिनल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 10.1 फीसदी की वृद्धि का अनुमान है, जिसे मोटे तौर पर 7 फीसदी वास्तविक वृद्धि (आर्थिक समीक्षा के अनुसार) और जीडीपी डिफ्लेटर में 3 फीसदी मुद्रास्फीति में विभाजित किया जा सकता है। पिछले दो वर्षों की तरह मुद्रास्फीति में कुछ मामूली गिरावट का जोखिम हो सकता है।
हालांकि, राजस्व पूर्वानुमान जीडीपी पूर्वानुमानों से मेल नहीं खाते। सकल कर राजस्व में 8 फीसदी की वृद्धि का अनुमान है, जबकि राज्यों को हस्तांतरण घटाने के बाद शुद्ध कर राजस्व में 7.2 फीसदी की वृद्धि हो रही है। घटकों को देखें तो प्रत्यक्ष करों में 11 फीसदी से अधिक की वृद्धि हो रही है, जबकि सीजीएसटी और सीमा शुल्क में धीमी वृद्धि दर्ज की जा सकती है। सीमा शुल्क दरों में प्रस्तावित परिवर्तनों के कारण सीमा शुल्क राजस्व में मंदी आ सकती है, लेकिन सीजीएसटी की वृद्धि में कमी आने का कोई कारण नहीं है। जीएसटी दर में कटौती का प्रभाव चालू वर्ष में कीमतों में शामिल किया जाना चाहिए। यदि दरों में और अधिक युक्तिकरण का प्रस्ताव नहीं किया जाता है, तो जीडीपी वृद्धि दर स्थिर रहने पर 2026-27 में जीएसटी राजस्व में वृद्धि हो सकती है।
(लेखिका एनआईपीएफपी, नई दिल्ली की निदेशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं)