अर्थव्यवस्था परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। हमारे पास दिसंबर 2025 में समाप्त तिमाही के लिए 677 सूचीबद्ध गैर वित्तीय कंपनियों के आंकड़े हैं जिनमें सालाना नॉमिनल वृद्धि 7.67 फीसदी रही है। वास्तविक आधार पर यह दर 6 फीसदी की वृद्धि को दर्शाती है। सीएमआईई पूंजीगत व्यय डेटा दिखाता है कि निजी निवेश परियोजनाओं के क्रियान्वयन में काफी सुधार हुआ है लेकिन यह सुधार अभी तक कंपनियों के निवेश व्यय के प्रवाह में परिलक्षित नहीं हुआ है।
बाहरी माहौल चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। स्वेज नहर अवरुद्ध है जिसके चलते मुंबई से यूरोप को माल वहन की लागत बढ़ गई है। अमेरिका द्वारा 50 फीसदी का शुल्क कंपनियों को विवश कर रहा है कि वे वैश्विक व्यापार में हिस्सा लेने के लिए अपना पुनर्गठन करें। इसमें होल्डिंग कंपनियां, उत्पादन संयंत्र और ग्राहक शामिल हैं।
रविवार को प्रस्तुत केंद्रीय बजट की घोषणाओं पर हम इसी परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए नजर डालेंगे। बजट केवल सरकारी वित्त का दस्तावेज नहीं है। बजट भाषण एक ऐसी प्रतिबद्धता है जिसके जरिये केंद्र सरकार वर्ष की नीतिगत सुधार परियोजनाओं को लेकर अपना समर्पण जाहिर करती है। उदाहरण के लिए भाजपा की आर्थिक नीति संबंधी तमाम सफलताएं जिनमें जीएसटी, मुद्रास्फीति को लक्षित करना और आईबीसी आदि शामिल हैं, ये सभी बजट भाषण में उल्लेख से ही आरंभ हुई थीं।
हाल के महीनों में कुछ अहम आर्थिक सुधार आरंभ करने को लेकर चर्चाएं हुई हैं। यह इसलिए कि हालात कठिन हैं और यथास्थिति बनाए रखने की लागत बढ़ गई है। यद्यपि बजट भाषण में जो घोषणाएं की गई हैं वे पूरी तरह औद्योगिक नीति के स्वरूप की हैं। सरकार अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में इस प्रकार हस्तक्षेप कर रही है मानो कक्षा की मॉनिटर बनकर यह तय करने का प्रयास कर रही हो कि अर्थव्यवस्था कि तरह काम करे। हमने ऐसा पहले भी देखा है। यह 1980 के दशक में समाजवाद से जुड़ी भारतीय आर्थिक नीति को दर्शाता है। ऐसे प्रयास को तीन वजहों से संदेह की दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
पहली दिक्कत है समाजवादी गणना की। बेहतरीन से बेहतरीन नीति निर्माता भी दुनिया की जटिलताओं को इतना नहीं समझते कि यह तय कर सकें कि कारोबारों को क्या करना चाहिए। भारत में हमारे पास अतीत में उल्लेखनीय नेतृत्व क्षमता रही है लेकिन वह भी समाजवादी गणना की समस्या को हल करने में नाकाम रही है। जब कोई नीति-निर्माता उत्पादों, प्रक्रियाओं और तकनीक के विवरण पर बात करने लगता है, तो वह बहुत अस्थिर हालात में होता है।
दूसरी दिक्कत है राज्य की क्षमता की। भारतीय राज्य का इतिहास ऐसा रहा है कि वह अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेपों के मामले में बहुत अच्छा नहीं रहा है। यह इसलिए कि सरकारी संस्थान सही ढंग से काम करने में सक्षम नहीं रहे हैं।
तीसरी समस्या राजनीतिक अर्थशास्त्र की है। एक बार जब सरकार के पास दमनकारी शक्ति और बाजार प्रतिभागी के रूप में व्यय की शक्ति आ जाती है तो कंपनियों के प्रोत्साहन उच्च उत्पादकता वाली कंपनियां बनाने से हटकर सरकार से जुड़ाव बनाने की ओर स्थानांतरित हो जाते हैं। यह अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाता है क्योंकि कंपनियों की ऊर्जा आर्थिक विकास के उद्देश्य के लिए कम उपलब्ध हो जाती है, और क्योंकि कंपनियों की लॉबिंग अक्सर सरकारी नीतियों को गलत दिशा में मोड़ देती है।
औद्योगिक नीति को बढ़ावा देने के साथ ही कई वास्तविक नीतिगत समस्याएं भी हैं जिन पर बजट भाषण में बिल्कुल ध्यान नहीं दिया गया है। उदाहरण के लिए कर नीति के क्षेत्र में जीएसटी की गलतियों पर पहले से काफी स्पष्टता है मसलन इनपुट टैक्स क्रेडिट का अवरोध जो जीएसटी को एक बहुस्तरीय उत्पादन कर बना देता है। इसी तरह विदेशी निवेशकों के लिए स्रोत आधारित कराधान की गलतियों और लेनदेन पर कराधान की गलतियों को इस बजट में और बढ़ा दिया गया है। वित्तीय क्षेत्र की बेहतरी के लिए काफी कुछ किया जाना है जिसमें पूंजी नियंत्रण को समाप्त करना, निस्तारण निकाय बनाना और सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी की स्थापना करना तथा वित्तीय संस्थाओं की कानूनी बुनियाद को सही करना शामिल है। वैसे ही जैसा कि प्रतिभूति बाजार संहिता को सेबी के लिए करना था। सरकार की बुनियादी प्रक्रियाओं में भी दिक्कतें हैं।
इनमें मानव संसाधन, सार्वजनिक वित्त प्रबंधन और ठेका प्रणाली शामिल हैं। संरक्षणवाद एक बड़ा एजेंडा है जिसमें विदेशी उत्पादकों और भारत में विक्रय या काम करने की कोशिश करने वाली विदेशी कंपनियों को असमान व्यवहार का सामना करना पड़ता है। बिजली व्यवस्था में तमाम खामियां हैं जो स्वच्छ ऊर्जा को अपनाने से रोक रही हैं। कुल मिलाकर इन चंद उदाहरणों के अलावा अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
हमें उम्मीद है कि आने वाले दिनों में सरकार इन सभी बिंदुओं पर ध्यान देगी। उसने कई सालों से यह प्रयास किया है कि सार्वजनिक वित्त के क्षेत्र में सतर्कता बरती जाए। कोविड के दौरान घाटे में हुआ इजाफा अनुमान से काफी कम रहा था। हालांकि हालात अभी भी बहुत बेहतर नहीं हैं। हर कोई यह मानता है कि कोविड एक असाधारण अवसर था। उसके चलते ऋण-जीडीपी अनुपात अस्थायी रूप से बढ़ा। उसके बाद ऋण-जीडीपी अनुपात को कम करने के लिए छोटे प्राथमिक अधिशेषों की जरूरत पड़ी। परंतु हम 2024-25 से 2026-27 तक 1.4, 0.8 और 0.7 फीसदी के हम प्राथमिक घाटे के शिकार रहे।
देश में ऋण और जीडीपी के आकलन में दिक्कतें हैं। यही वजह है कि राजकोषीय सेहत का सबसे अच्छा पैमाना ब्याज भुगतान को राजस्व प्राप्तियों से विभाजित करना है। स्तरों के संदर्भ में हमें यह समझना चाहिए कि देश में ब्याज दरों को कम रखने की व्यवस्था राज्य को कृत्रिम रूप से कम दरों पर ऋण लेने की सुविधा देती है। इसलिए जो आंकड़े हमें नजर आते हैं वे कृत्रिम रूप से कम आंके गए हैं। जब हम नवीनतम मूल्यों को देखते हैं तो 2024-25 से 2026-27 के बीच यह अनुपात 36.74 से बढ़कर 39.47 तक पहुंच गया है जो चिंता का विषय है।
सरकार ने बाजार से 11.7 लाख करोड़ रुपये और ट्रेजरी बिल आदि से 1.3 लाख करोड़ रुपये उधार लेने की योजना बनाई है जो 2025-26 के संशोधित अनुमान 10.4 लाख करोड़ रुपये की तुलना में 25 फीसदी की नॉमिनल वृद्धि है। यह मुश्किल हो सकता है। भारतीय राज्य का तकरीबन 95 फीसदी ऋण, वित्तीय प्रणाली से जबरन लिया जाता है। इसके लिए वित्तीय दमन प्रणाली (यह उन सरकारी नीतियों से बनी होती है जो कृत्रिम रूप से ब्याज दरों को कम करती हैं और वित्तीय क्षेत्र को नियंत्रित करती हैं, ताकि सार्वजनिक ऋण को घटाया जा सके और सरकारी व्यय को कम लागत पर वित्तपोषित किया जा सके)।
जब इतनी बड़ी उधारी की आवश्यकता होगी, तो यह प्रणाली क्षमता संबंधी बाधाओं का सामना कर सकती है, और स्वेच्छा से उधार देने वाले निवेशक नगण्य हैं जो मूल्य संकेतों पर प्रतिक्रिया कर सकें।