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Budget 2026: आत्मविश्वास से भरपूर, मगर भविष्य की चिंताओं को लेकर सतर्क

वैश्विक अस्थिरता को देखते हुए रक्षा बजट में वृद्धि और वित्तीय अनुशासन बनाए रखने हेतु एक सतर्क दृष्टिकोण अपनाया गया है

Last Updated- February 02, 2026 | 8:56 AM IST
Budget 2026 Analysis
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

Budget 2026 Analysis: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के अब तक के पिछले नौ बजट में यह एक ऐसा बजट था जिसमें सबसे कम कम राजनीतिक चिंता दिखाई दी। हालांकि, वित्त वर्ष 2026-27 में बजट में बिगड़े भू-राजनीतिक हालात की चिंता जरूर नजर आ रही है। आइए, हम हम इन विरोधाभासों को दूर करने का प्रयास करते हैं।

कंपनियों, निवेशकों और सरकार की नीतियों के समर्थक अर्थशास्त्रियों ने जोखिम लेने, नरम मुद्रास्फीति का लाभ उठाने और नॉमिनल आर्थिक वृद्धि दर (मुद्रास्फीति समायोजित नहीं) बढ़ाने की सलाह दी थी और ऐसी मांग भी रखी थी।  

उन्होंने सरकार को यह भी सलाह दी थी कि विदेशी निवेशकों का डर दूर करने के लिए अधिक मुद्रा छापी जाए, कुछ परिसंपत्तियां बेची जाएं और पूंजीगत कर लाभ में कटौती की जाए। मगर बजट में जो हुआ है उनमें ज्यादातर इनका उल्टा है। बाजार में निवेशकों का उत्साह बढ़ाने के बजाय प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) 150 प्रतिशत तक बढ़ा दिया गया है।

यह राजनीतिक के साथ ही वैचारिक और दार्शनिक भी है। सबसे पहले राजनीतिक पहलू का जिक्र करते हैं।

जिस वजह से हम इस बजट को राजनीतिक तौर पर सबसे कम बेफिक्री वाला बजट बता रहे हैं, वह यह है कि इसमें मध्य वर्ग के लिए कोई नए लाभ, कर में कटौती या रियायत की घोषणा नहीं की गई है। न ही राज्यों के लिए आवंटन बढ़ाया गया है बल्कि इसमें मामूली कमी ही हुई है।

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किसी भी सहयोगी या ‘अपने’ राज्यों को कोई लाभ नहीं दिया गया है। इस साल कई राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, इस लिहाज से बजट में कुछ खास घोषणा नहीं हुई है। यह स्पष्ट करता है कि सरकार की तरफ से इस बजट पर राजनीतिक चिंता की छाप क्यों नहीं दिख रही है।

यह राजनीतिक विश्वास है। सरकार ने 2024 के बाद की चिंताओं को किनारे कर दिया है। वह जानती है कि उसका वोट बैंक टस से मस नहीं हुआ है। जिन चार प्रमुख राज्यों में चुनाव हो रहे हैं उन्हें लेकर सरकार को विश्वास है कि एक उसकी जेब में है (असम), दो में उसे मामूली बढ़त मिलेगी और और पश्चिम बंगाल में चुनाव ध्रुवीकरण पर लड़ा जाएगा। यहां तक कि अगर कोलकाता के अमीर इस बजट से आहत हैं तो भी वे भाजपा को ही वोट देंगे।

बजट ने वास्तव में सोये बाजार को जगा दिया है मगर बस उस तरह नहीं जैसा इसके समर्थकों ने उम्मीद की थी। वायदा एवं विकल्प (एफ ऐंड ओ) कारोबार को लेकर सख्त रुख और उसके बाद वित्त मंत्रालय का यह बयान कि बाजार में अटकल पर अंकुश लगाने के लिए यह कदम उठाया गया है, इसी को हम वैचारिक एवं दार्शनिक दोनों कहते हैं। वैचारिक रूप से आरएसएस का मध्य वर्ग के प्रति संरक्षणवादी रवैया रहा है।  

वे कड़ी मेहनत करने वाले जरूर होते हैं और उनमें प्रतिभा भी होती है मगर  बाजार में हमेशा होशियार साबित नहीं होते हैं इसलिए उनके हित सुरक्षित रखने की जरूरत होगी। जरूरत पड़ने पर कभी-कभी स्वयं अपनी तरफ से भी। दार्शनिक रूप से एल्गोरिद्मिक कारोबार पर सवाल हैं जहां नुकसान उठाने वाले लाखों हैं और फायदा कमाने वाले हेज फंड और कुछ मुठ्ठी भर लोग हैं।

एक विदेशी हेज फंड (जिस पर सेबी ने अस्थायी तौर पर इस पर रोक लगा दी थी) कथित तौर पर सुबह छोटी मोटी खरीदारी कर शेयरों के दाम बढ़ाती थी और फिर दोपहर में बिकवाली हो जाती थी। सरकारी व्यवस्था को तब इस बात का एहसास हुआ जब इसका मुनाफा 10 अरब डॉलर के आंकड़े के करीब पहुंच रहा था। इन अरबों रुपये के लिए कितने लाख बेरोजगार, सेवानिवृत्त और यहां तक कि गृहणियों को अपनी मेहनत से कमाई रकम खोनी होगी।

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सरकार को यह पसंद नहीं आया और वही बात बजट में दिखी। मगर उसे एफऐंडओ कारोबार पूरी तरह रोकने में नुकसान दिखा क्योंकि यह आखिरकार एक वैश्विक रूप से स्वीकृत बाजार और मुनाफा कमाने का जरिया है। प्रत्येक लेनदेन पर एसटीटी 3 गुना बढ़ाना सीधे तौर पर इसे बाधित करना है। यह एफपीआई को नाराज कर सकता है। मगर मोदी सरकार इसकी परवाह नहीं करेगी। वह चाहेगी कि एफपीआई भारत की आर्थिक तरक्की में धैर्य रखते हुए वापस आएं। शुद्ध कारोबार और निवेश के बीच यह अंतर दार्शनिक बिंदु है। हम इसे ‘जेन स्ट्रीट अमेंडमेंट’कह सकते हैं।

हालांकि, इससे इस सरकार के पसंदीदा मध्य वर्ग को चोट पहुंचेगी। पिछले दो वर्षों से एफपीआई ने बिकवाली की और शुद्ध एफडीआई ऋणात्मक हुआ फिर कमान घरेलू निवेशकों ने संभाल ली। वित्त मंत्री ने बेपरवाह होकर म्युचुअल फंडों में एसआईपी के जरिये निवेश करने वाले इन लाखों बहादुर भारतीयों के बारे में बड़े गर्व से बात की है। दिसंबर 2025 तक उनके पास एफपीआई की तुलना में एनएसई के अधिक शेयर थे। क्या वे  इस ताजातरीन झटके को बर्दाश्त कर लेंगे? यह एक राजनीतिक जोखिम है।

सरकार विश्वास से भरपूर, शांत और दीर्घ अवधि के लिए तैयार दिख रही है। हालांकि, सरकार की दीर्घ अवधि के लिए यह तैयारी सोच-समझ कर की गई है दिखती है जब हम दूसरे बिंदु की तरफ बढ़ते हैं। यानी यह बजट दुनिया में मची उथल-पुथल को देखते हुए तैयार की गई है। सरकार का व्यवहार उस कैप्टन की तरह लग रहा है जो विमान में बैठे यात्रियों को खराब मौसम में कुर्सी की पेटी बांधे रखने की सलाह देता है।

कोई नहीं जानता कि डॉनल्ड ट्रंप ट्रुथ सोशल पोस्ट कब क्या लिख देंगे। फिलहाल यह भी नहीं मालूम की ईरान के साथ युद्ध होगा या फिर संधि होगी। क्या यूक्रेन में समझौता होगा या दोनों पक्ष अपना रुख कर लेंगे? आने वाले समय में शुल्कों की क्या स्थिति रहेगी? तेल के दाम किस स्तर पर रहेंगे? चीन में सैन्य में शीर्ष स्तर पर बर्खास्तगी का क्या मतलब है? चुनाव के बाद बांग्लादेश में कौन सत्ता संभालेगा? आसिम मुनीर कब असुरक्षित हो जाएंगे और फिर भारत के साथ दुश्मनी बढ़ा लेंगे?

यह सभी ऐसी बातें हैं जिन्हें लेकर चिंता स्वाभाविक है। यह सभी बातें बजट में फिलहाल सतर्क रुख अपनाने, राजकोषीय गुंजाइश बनाए रखने और मुक्त व्यापार समझौतों के बाद निर्यात बाजार में प्रतिस्पर्द्धी क्षमता बनाए रखने के लिहाज से उचित जान पड़ते हैं।

बजट में सबसे स्वागत योग्य मगर अनपेक्षित कदम रक्षा बजट में इजाफा है। 11 वर्षों तक जीडीपी के लगभग 1.9 प्रतिशत पर स्थिर रहने के बाद रक्षा बजट बढ़कर करीब 2 प्रतिशत तक पहुंच गया है। मैं लगातार लिखता रहा हूं कि भारत को रक्षा बजट हर साल 10 आधार अंक तक बढ़ाकर 2.5 प्रतिशत के स्तर तक पहुंचाना होगा।

इस साल की वृद्धि बिल्कुल वैसी ही है यानी 10 आधार अंक। इससे भी अच्छी बात यह है कि पिछले 11 वर्षों में यह पहला मौका है जब सशस्त्र सेनाओं ने अपना पूरा पूंजीगत बजट खर्च किया है (1.8 लाख करोड़ रुपये से संशोधित होकर 1.86 लाख करोड़ रुपये)। पिछले 10 वर्षों में प्रत्येक में उन्होंने बिना खर्च हुई रकम वापस कर दी थी। वित्त वर्ष 2024-25 के लिए यह रकम 16,000 करोड़ रुपये थी (लगभग 2 अरब डॉलर) थी। मगर ऑपरेशन सिंदूर के बाद रकम बचने की गुंजाइश नहीं रह गई।

यह बजट राजनीतिक रूप से लबरेज सरकार का कठिन परिस्थितियों के लिए बिल्कुल सतर्क पहल है। क्या यह आपको नीरस लगता है? क्या हमें यह नहीं बताया गया था कि नीरस दिखने वाले बैंकर सबसे अधिक कारगर साबित हुए?

First Published - February 2, 2026 | 8:56 AM IST

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