आर्थिक नीति निर्माताओं के बीच इस बात को लेकर व्यापक सहमति है कि 2047 तक ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य निजी क्षेत्र की अगुआई में मजबूत, रोजगार से परिपूर्ण विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि पर निर्भर करता है। इसमें सरकार कारक बाजार (फैक्टर मार्केट) सुधारों को आगे बढ़ाकर और माल परिवहन (लॉजिस्टिक्स) पर लागत कम कर एक अनुकूल ढांचा प्रदान करेगी।
अप्रत्यक्ष कर को लेकर बड़ी उम्मीद थी कि सरकार विनिर्माण क्षेत्र की गति बढ़ाने के लिए सीमा शुल्कों और प्रक्रियाओं में सुधार करेगी, खासकर सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) में। मगर अफसोस की बात है कि बजट में सीमा शुल्कों में कोई व्यापक कटौती नहीं की गई है और औसत दर अभी भी लगभग 16 प्रतिशत पर मंडरा रही है जो 2014 में प्रचलित 13 प्रतिशत से अधिक है। यहां तक कि अगर शुल्कों में बड़ी कमी संभव नहीं थी तो सरकार श्रम-गहन विनिर्माण क्षेत्र जैसे कपड़ा, फुटवियर, चमड़ा, खाद्य प्रसंस्करण और हल्के अभियांत्रिकी सामान में एक बार इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल पर बुनियादी सीमा शुल्कों में कमी कर सकती थी।
मगर इसके बजाय सरकार ने टुकड़ों में शुल्क में बदलाव किए हैं। उदाहरण के लिए उसने कपड़ा, चमड़ा और फुटवियर विनिर्माताओं एवं निर्यातकों के लिए शुल्क मुक्त मात्रा को उनके एफओबी (फ्री ऑन बोर्ड) वैल्यू का वर्तमान 1 प्रतिशत से बढ़ाकर 3 प्रतिशत कर दिया है। इसने इस योजना के तहत निर्यात अनिवार्यता पूरी करने की समय सीमा भी मौजूदा छह महीने से बढ़ाकर एक वर्ष कर दी है। ये उपाय कमजोर वैश्विक मांग का सामना कर रहे निर्यातकों को अस्थायी राहत प्रदान करते हैं मगर शुल्क संरचना में निहित ऊंची लागत के बुनियादी मुद्दे का समाधान नहीं करते हैं।
एक अहम बदलाव के तहत विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) में इकाइयों को घरेलू शुल्क क्षेत्र (डीटीए) में सामान बेचने की अनुमति मिली है। यह उद्योग की एक लंबे समय से चली आ रही मांग रही है जिसे सरकार ने निर्यात बाजारों में उथल-पुथल को ध्यान में रखते हुए एक बार के उपाय के रूप में मंजूरी दे दी है। सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक नियम-कायदे लाएगी कि रियायती दरें एसईजेड इकाइयों को घरेलू विनिर्माण इकाइयों के मुकाबले अनुचित लाभ न दें। हालांकि, इस उपाय की प्रभावशीलता कामकाजी दिशानिर्देशों की स्पष्टता और डीटीए बिक्री की अनुमति में सहजता पर निर्भर करेगी।
वित्त मंत्री ने सीमा शुल्क के मामले में कई प्रक्रियात्मक सुधारों की भी घोषणा की है जिनमें दंडात्मक कार्रवाई के बजाय विश्वास पर आधारित प्रोत्साहन पर अधिक जोर दिया गया है। यह घोषणा की गई है कि अधिकृत आर्थिक परिचालकों (एईओ) को माल निपटान के लिए 15 के बजाय 30 दिनों तक की अनुमति दी जाएगी और उन्हें कुछ प्रक्रियात्मक अनुपालन से भी छूट मिलेगी। बजट ने लंबे समय से चले आ रहे विनिर्माताओं, निर्यातकों और सरकारी एजेंसियों को एईओ प्रमाणन प्राप्त करने के लिए भी प्रोत्साहित किया है जिसकी वैधता अवधि तीन साल से बढ़ाकर पांच साल कर दी गई है। इससे अनुपालन लागत कम होने और सीमा शुल्क प्रक्रियाओं के स्वैच्छिक पालन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
इसी तरह, कारखानों से सीधे जहाजों तक जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक रूप से सीलबंद कार्गो के लिए भी त्वरित निपटान की व्यवस्था दी गई है। सरकार ने माल के भंडारण और निपटान प्रक्रियाओं से जुड़ी कठिनाइयों को कम करने के लिए सरलीकृत सीमा शुल्क भंडारण नियम बनाने की भी घोषणा की है। अस्वीकृत और रोक कर रखी गई वस्तुओं के साथ व्यवहार के संबंध में भी नियम-कायदे तय किए जाएंगे। अगर ये प्रभावी ढंग से लागू किए गए तो ये सुधार दोहरा समय कम करने और बंदरगाहों की क्षमता में सुधार मदद कर सकते हैं।
इसी तरह, बिना किसी शुल्क देनदारी के आयात किए गए सामान को बिल ऑफ एंट्री दर्ज करने की आवश्यकता के बिना त्वरित निपटान की अनुमति दी जाएगी। सरकार ने व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए आयात किए गए सामान पर शुल्क दरों को भी 20 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया है। अस्थायी आयात के लिए सामान नियमों को भी सरल बनाया गया है। इसके अलावा निःशुल्क सामान की अनुमति की सीमा भी बढ़ा दी गई है। सरकार ने अंत में एक एकीकृत सीमा शुल्क प्रणाली के क्रियान्वयन का भी वादा किया है जो सभी आयात के लिए एकल पोर्टल के रूप में कार्य करेगा।
इसके अलावा, विशिष्ट क्षेत्रों के लिए सीमा शुल्क में रियायतों की घोषणा की गई है। हरति क्षेत्रों में इस्तेमाल किए जाने वाले कच्चे माल, जैसे बैटरी भंडारण, इलेक्ट्रिक वाहनों में उपयोग होने वाली लीथियम-आयन बैटरी, परमाणु ऊर्जा और कार्बन संग्रहण एवं भंडारण के लिए सीमा शुल्कों से छूट दी गई है। ये क्षेत्र विशिष्ट रियायत हरित ऊर्जा की तरफ कदम बढ़ाने, महत्त्वपूर्ण खनिज संरक्षण और सहायक औद्योगिक तंत्र के विकास से संबंधित व्यापक नीतिगत लक्ष्यों के साथ संरेखित हैं।
एक तरफ सीमा शुल्कों से जुड़े प्रक्रियात्मक बदलाव हुए हैं वहीं आसान निपटान के लिए विश्वास आधारित प्रणाली की ओर एक और कदम बढ़ाया गया है। सरकार अगले पांच वर्षों में शुल्क और प्रक्रियात्मक सुधारों दोनों को जद में लेते हुए सीमा शुल्क सुसंगति बनाने के लिए एक व्यापक ढांचा कर सकती थी।
संक्षेप में कहा जाए तो केंद्रीय बजट ने भविष्य के उभरते उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक कई कदम उठाए हैं। हालांकि, रोजगार सृजन, हुनर विकसित करना, कृषि उत्पादकता बढ़ाना और मानव क्षमताओं में सुधार जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में भी व्यापक रणनीति की रूपरेखा तैयार की जा सकती थी। आगे बढ़ने के लिए इन चार चुनौतियों का समाधान करने के लिए उल्लिखित कुछ उपायों एवं योजनाओं को इस व्यापक ढांचे में समाहित किया जा सकता था।
(लेखक केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) के पूर्व अध्यक्ष हैं)