भारत के मौजूदा बाजार मूल्यांकन का तात्पर्य कि आज खरीदारी करने वाले या अपनी खरीद बरकरार रखने वाले किसी व्यक्ति को यह मानना होगा कि अर्थव्यवस्था आर्थिक एवं कारोबारी मुनाफे में वृद्धि के सतत दौर में प्रवेश कर रही है। बाजार प्रतिभागी बजट को इसी दृष्टि से देखेंगे। क्या आपको दीर्घावधि में वृद्धि का पूरा भरोसा है?
दीर्घावधि की वृद्धि को गति देने का एक तरीका यह हो सकता है कि गंभीर ढांचागत सुधारों को अंजाम दिया जाए। इस बजट में ऐसा प्रयास नहीं किया गया। पिछले बजट के उलट कोई दूरगामी सुधार नहीं हैं। उस समय दो सरकारी बैंकों के निजीकरण, सरकारी परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण करने, अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका कम करने, श्रम सुधार जैसी बातें शामिल थीं जो इस बार नदारद हैं। कर प्रशासन को सहज बनाने, कंपनियों का नकदीकरण आसान करने, भू रिकॉर्ड का राष्ट्रीय रजिस्टर बनाने, स्टार्टअप तथा विनिर्माण कंपनियों को प्रोत्साहन देने तथा गिफ्ट सिटी में विदेशी विश्वविद्यालयों को प्रवेश देने जैसे कुछ कदम भी शामिल हैं। परंतु इनमें ऐसा कुछ नहीं है जो निवेशकों को आकर्षित करे।
इस बजट में प्रमुख रूप से पूंजीगत खाते में सरकारी व्यय बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इस बजट में यह राशि 7.5 लाख करोड़ रुपये कर दी गई है जो वित्त वर्ष 2022 के छह लाख करोड़ रुपये के संशोधित अनुमान से 25 प्रतिशत अधिक है। यदि वित्त वर्ष 2021 के 4.26 लाख करोड़ रुपये से तुलना की जाए तो यह इजाफा बहुत अधिक है। पूंजीगत व्यय की ओर झुकाव इस बात से भी स्पष्ट है कि वित्त वर्ष 2023 के बजट अनुमान में केंद्र सरकार के राजस्व व्यय (ब्याज भुगतान तथा पूंजीगत परिसंपत्ति निर्माण के अनुदान के अलावा) में 8.5 फीसदी कमी की बात कही गई है। कहा गया है कि यह 21,15,813 करोड़ रुपये से घटकर 19,36,369 करोड़ रुपये रह जाएगा। वित्त वर्ष 2023 में सरकार के वृद्धिकारी व्यय का 85 प्रतिशत हिस्सा पूंजीगत व्यय में जाएगा। प्राथमिकता और इरादे इससे स्पष्ट रूप से जाहिर नहीं किए जा सकते। पूंजीगत व्यय पर इतना ध्यान इसलिए दिया जा सका कि सब्सिडी में 1,15,000 करोड़ रुपये की कमी आई है तथा ग्रामीण विकास पर होने वाला व्यय 2,60,000 करोड़ रुपये पर स्थिर है। माना जा रहा था कि यह बजट सब्सिडी तथा अन्य प्रकार की घोषणाओं से लैस होगा क्योंकि अहम राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। निवेशक इस अनुशासन पर गौर करेंगे।
सरकार के रुख में बदलाव स्पष्ट है। वित्त वर्ष 2022 में भी कर राजस्व लाभ का इस्तेमाल राजकोषीय घाटे को 6.8 फीसदी के लक्ष्य से कम करने में इस्तेमाल करने के बजाय सरकार ने बढ़ी हुई समस्त राशि व्यय कर दी थी और घाटे को 6.9 फीसदी रहने दिया। वित्त वर्ष 2023 में राजकोषीय घाटा 6.4 फीसदी रहने का अनुमान है।
ऐसे माहौल में जहां सरकार आश्वस्त नहीं है कि निजी क्षेत्र का पूंजीगत व्यय सुधरेगा, उसने व्यय का बोझ खुद उठाने का निर्णय लिया है। आशा है कि सरकार में यह क्षमता है कि वह इतना पैसा उत्पादक ढंग से खर्च कर सकेगी तथा निजी निवेश आकर्षित कर सकेगी। मैं निजी निवेश चक्र को लेकर आशावादी हूं और मुझे लगता है कि सरकार का प्रोत्साहन वृद्धि को गति दे सकता है। यदि सरकार के पूंजीगत व्यय पर बढ़ा हुआ आवंटन बुनियादी ढांचा विकास को गति देता है तो इससे दीर्घावधि की वृद्धि संभावनाएं सुधरेंगी।
शेयर बाजार भी उत्साहित है। वह वृद्धि में तेजी को भांप चुका है और उसे कारोबारी मुनाफे में सुधार की संभावनाओं पर पूरा भरोसा है। कराधान में कोई बदलाव न होने से भी मिजाज सुधरा है। पूंजीगत लाभ कर में कोई बदलाव नहीं किया गया, न ही नए करों को लेकर कोई कोशिश की गयी है। इससे भी मदद मिली है। निवेशकों को स्थिरता और अनुमान लगाने लायक स्थितियां पसंद आती हैं। सवाल यह है कि क्या सरकार में यह क्षमता है कि वह इतना पैसा सार्थक ढंग से व्यय कर सके। सरकार राजकोषीय मोर्चे पर ज्यादा चिंतित होने के बजाय वृद्धि पर दांव लगा रही है। यदि वृद्धि हासिल हुई तो राजकोषीय स्थिति सुधरना तय है।
इस व्यय की एक कमी यह है कि राजकोषीय घाटे में कमी की दर बॉन्ड बाजार की अपेक्षा से भी धीमी रहेगी। वित्त वर्ष 2023 के लिए बाजार उधारी का लक्ष्य 11.59 लाख करोड़ रुपये रखा गया है जो अत्यधिक है। यह वित्त वर्ष 2022 के 8.75 लाख करोड़ रुपये से काफी अधिक है तथा बॉन्ड बाजार तथा प्रतिफल पर दबाव डालेगा। वैश्विक वित्तीय हालात में बरती जा रही कड़ाई को देखते हुए यह एक दिक्कत हो सकती है। फेडरल रिजर्व द्वारा नकदी कम करने के साथ ही बड़े घाटे की भरपाई चुनौतीपूर्ण हो जाएगी। इक्विटी के बाहर जाने के साथ ही बॉन्ड प्रतिफल बढ़कर 6.82 फीसदी हो गया। इससे पता चलता है कि डेट निवेशक राजकोष की भरपाई को लेकर चिंतित हैं। बढ़ता बॉन्ड प्रतिफल इक्विटी पर असर डाल सकता है लेकिन फिलहाल वृद्धि और कारोबारी मुनाफे पर ज्यादा भरोसा है। आरबीआई को भी प्रतिफल में इजाफे को सीमित करना पड़ सकता है। रुपये पर भी नजर रखनी होगी।
बॉन्ड बाजार की निराशा की एक वजह यह भी रही कि यूरोक्लियर की मदद से भारतीय सॉवरिन बॉन्ड की खरीद-बिक्री करने वाले बॉन्ड निवेशकों पर कराधान को लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं कहा गया। भारत के वैश्विक सॉवरिन बॉन्ड सूचकांक में शामिल होने तथा विदेशी निवेशकों से अहम डेट प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए यह जरूरी है। पता नहीं ऐसा क्यों नहीं किया गया? ध्यान रहे कि हमारे ऋण कार्यक्रम के व्यापक आकार तथा वैश्विक स्तर पर नकदी की तंगी को देखते हुए ऐसा किया जाना उचित रहता।
राजस्व मोर्चे पर बजट रूढि़वादी नजर आ रहा है। कर/जीडीपी अनुपात के 10.8 फीसदी से घटकर 10.7 फीसदी रहने का अनुमान है जबकि सकल कर राजस्व के 9.6 फीसदी बढऩे की बात कही गई है। कॉर्पोरेशन कर तथा आय कर राजस्व के क्रमश: 13.4 फीसदी तथा 13.8 फीसदी बढऩे का अनुमान है। विनिवेश लक्ष्य भी काफी तार्किक हैं। वित्त वर्ष 2022 में 78,000 करोड़ रुपये की विनिवेश प्राप्तियां होनी हैं और वित्त वर्ष 2023 के लिए 65,000 करोड़ रुपये का अनुमान है। सब्सिडी नियंत्रण की क्षमता पर अवश्य प्रश्न हैं। मनरेगा व्यय जो वित्त वर्ष 2022 में 98,000 करोड़ रुपये था उसे 73,000 करोड़ रुपये पर सीमित रखा गया है। बजट में सरकारी व्यय बढ़ाने पर जोर है ताकि निजी निवेश लाया जा सके और अर्थव्यवस्था वृद्धि के पथ पर बढ़े। आर्थिक वृद्धि से राजस्व आएगा, राजकोष मजबूत होगा तथा रोजगार सुधरेंगे। इससे खपत सुधरेगी। यदि सरकार समझदारी से खर्च करे पिछले बजटों में घोषित कुछ सुधारों को लागू कर सके तो बेहतर होगा। शेयर बाजारों को ऐसी सरकार पसंद आती है जो अल्पकालिक राजकोषीय स्थिति के बजाय वृद्धि की चिंता करे।
(लेखक अमांसा कैपिटल से संबद्ध हैं)