Year Ender 2025: भारतीय म्युचुअल फंड इंडस्ट्री साल 2025 में काफी तेजी से आगे बढ़ी है। ICRA एनालिटिक्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2025 में इंडस्ट्री का एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) बढ़कर 81 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। यह नवंबर 2024 के 68 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले 18.69 फीसदी की सालाना वृद्धि है। पिछले पांच वर्षों में म्युचुअल फंड उद्योग का आकार लगभग तीन गुना हो गया है। इस अवधि में 21.91 फीसदी की सालाना ग्रोथ (CAGR) दर्ज की गई। उद्योग की इस मजबूती के पीछे लगातार नेट इनफ्लो का बना रहना, शेयर बाजार का अच्छा प्रदर्शन और खुदरा निवेशकों की बढ़ती भागीदारी रही। डिजिटलीकरण और पारंपरिक बचत आदतों में बदलाव है। इन फैक्टर्स ने म्युचुअल फंड में निवेश को बढ़ावा दिया।
ओपन-एंडेड इक्विटी फंड्स का आकार पिछले पांच वर्षों में चार गुना हो गया है। नवंबर 2020 में इन फंड्स का AUM 9 लाख करोड़ रुपये था, जो नवंबर 2025 में बढ़कर 36 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। सालाना आधार पर भी अच्छी बढ़त दर्ज की गई। नवंबर 2024 के 30 लाख करोड़ रुपये से यह 17.45 फीसदी बढ़कर नवंबर 2025 में 36 लाख करोड़ रुपये हो गया।
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इक्विटी कैटेगरी में फ्लेक्सी-कैप फंड्स में सबसे ज्यादा ग्रोथ देखने को मिली। इनका कॉर्पस सालाना आधार पर 25.21 फीसदी बढ़ा। नवंबर 2024 में इनका AUM 4.35 लाख करोड़ रुपये था, जो नवंबर 2025 में बढ़कर 5.45 लाख करोड़ रुपये हो गया। रिपोर्ट में बताया गया कि फ्लेक्सी-कैप फंड्स में तेज बढ़त का कारण उनकी निवेश में लचीलापन, डायवर्स पोर्टफोलियो और शेयर बाजार में जारी उतार-चढ़ाव रहा।
फ्लेक्सी-कैप के बाद मल्टी-कैप और लार्ज एंड मिड-कैप फंड्स ने भी मजबूत प्रदर्शन किया। इस साल, मल्टी-कैप फंड्स का कॉर्पस 24.78 फीसदी और लार्ज एंड मिड-कैप फंड्स का AUM 22.78 फीसदी बढ़ा।
डेट फंड्स का कॉर्पस भी सालाना आधार पर बढ़ा है। नवंबर 2024 में 17 लाख करोड़ रुपये से यह 14.82 फीसदी की बढ़त के साथ नवंबर 2025 में 19 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया।
डेट फंड कैटेगरी में मनी मार्केट फंड्स ने सबसे तेज वृद्धि दर्ज की। इनका कॉर्पस सालाना आधार पर 40.22 फीसदी बढ़ा। नवंबर 2024 में यह 2.55 लाख करोड़ रुपये था, जो नवंबर 2025 में बढ़कर 3.57 लाख करोड़ रुपये हो गया। इसके बाद अल्ट्रा शॉर्ट ड्यूरेशन फंड्स और लो ड्यूरेशन फंड्स का नंबर रहा। अल्ट्रा शॉर्ट ड्यूरेशन फंड्स का कॉर्पस 33.49 फीसदी बढ़कर 1.49 लाख करोड़ रुपये हो गया। वहीं, लो ड्यूरेशन फंड्स का कॉर्पस 32.92 फीसदी की बढ़त के साथ 1.57 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया।
लो ड्यूरेशन म्युचुअल फंड्स को निवेशक इसलिए पसंद कर रहे हैं क्योंकि ये स्थिरता, बेहतर लिक्विडिटी और सीमित लेकिन भरोसेमंद रिटर्न देते हैं। इन फंड्स की मैच्योरिटी अवधि कम होती है, आमतौर पर 6 से 12 महीने, जिससे ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव का असर कम पड़ता है और अस्थिरता भी कम रहती है। इस कारण यह शॉर्ट टर्म निवेश के लिए बेहतरीन माने जाते हैं।
सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) भारतीय म्युचुअल फंड उद्योग के लिए ग्रोथ का सबसे मजबूत और भरोसेमंद माध्यम बनकर उभरे हैं। एसआईपी ने न सिर्फ एसेट्स को बढ़ाया है, बल्कि निवेशकों की भागीदारी भी काफी बढ़ाई है।
नवंबर 2025 तक SIP का एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) बढ़कर 16.53 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। यह म्युचुअल फंड उद्योग के कुल AUM का 20 फीसदी से ज्यादा है, जो लॉन्ग टर्म वेल्थ क्रिएशन में एसआईपी की अहम भूमिका को दर्शाता है। एसआईपी के जरिए होने वाला मासिक निवेश भी बढ़ा है। नवंबर 2024 में 25,320 करोड़ रुपये से यह 16.29 फीसदी की सालाना बढ़त के साथ नवंबर 2025 में 29,445 करोड़ रुपये हो गया।
भारत का म्युचुअल फंड उद्योग धीरे-धीरे 100 लाख करोड़ रुपये के AUM के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। ICRA एनालिटिक्स ने रिपोर्ट में कहा, “इसे मजबूत खुदरा निवेश, बढ़ते एसआईपी निवेश और छोटे शहरों में बढ़ती पहुंच का सहारा मिल रहा है। मई 2025 तक म्युचुअल फंड उद्योग का एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) 70 लाख करोड़ रुपये के स्तर को पार कर गया था। इसके अगले छह महीनों के भीतर, वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद, एयूएम 80 लाख करोड़ रुपये से भी ऊपर पहुंच गया।”
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इस रुझान को देखते हुए मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि मौजूदा निवेश फ्लो और बाजार प्रदर्शन बना रहता है, तो भारत का म्युचुअल फंड उद्योग आने वाले कुछ वर्षों में 100 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर सकता है।
100 लाख करोड़ रुपये के स्तर के बाद भी, लंबी अवधि में म्युचुअल फंड उद्योग के लिए और बड़े बदलावों वाली ग्रोथ की संभावना दिखती है। विभिन्न उद्योग रिपोर्टों के अनुसार, 2035 तक भारत का म्युचुअल फंड एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) 300 लाख करोड़ रुपये को पार कर सकता है। इस तेज बढ़त के पीछे डिजिटल अपनाने में तेजी, जेन-जी, महिलाओं और छोटे शहरों के परिवारों की बढ़ती भागीदारी, साथ ही एसआईपी के जरिए लॉन्ग टर्म निवेश की ओर बढ़ता रुझान प्रमुख कारण होंगे।