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सैट ने लिंडे इंडिया मामले में सेबी की व्याख्या को सही ठहराया, बड़े संबंधित-पक्षकार लेनदेन पर निगरानी और सख्त

लिंडे ने यह भी तर्क दिया कि सेबी ने संबंधित पक्षकार लेनदेन और संबंधित पक्ष के साथ लेनदेन वाक्यों के बीच एक बनावटी अंतर खींचा है

Last Updated- December 09, 2025 | 10:42 PM IST
SEBI

प्रतिभूति अपील पंचाट (सैट) ने लिंडे इंडिया और प्रैक्सेयर इंडिया के साथ उसके संयुक्त उद्यम से जुड़े मामले में संबंधित पक्षकार लेनदेन (आरपीटी) के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) की व्याख्या को सही ठहराया है। इस तरह उसने आरपीटी निरीक्षण को लेकर नियामक के दृष्टिकोण की अहम पुष्टि की है।

बहुराष्ट्रीय कंपनी ने सेबी के निष्कर्षों को चुनौती दीथी। उसने तर्क दिया था कि नियामक ने लिस्टिंग ऑब्लिगेशन्स ऐंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्स (एलओडीआर) रेग्युलेशन के नियमन 23(1) की संकीर्ण और शाब्दिक व्याख्या पर भरोसा करके संबंधित-पक्षकार लेनदेन की परिभाषा का गलत इस्तेमाल किया है। कंपनी ने दावा किया कि सेबी ने नियमन 2(1)(जेडसी) में निहित अनुबंध में वाक्यांश को नजरअंदाज किया है, जिसके बारे में कंपनी ने कहा कि इससे भौतिकता के आकलन पर असर पड़ना चाहिए।

लिंडे ने यह भी तर्क दिया कि सेबी ने संबंधित पक्षकार लेनदेन और संबंधित पक्ष के साथ लेनदेन वाक्यों के बीच एक बनावटी अंतर खींचा है। अपीलकर्ता के अनुसार इससे नियमन का इरादा कमजोर होता है। लेकिन, सैट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया और कहा कि नियमन को ध्यानपूर्वक पढ़ने से व्याख्या की ज्यादा गुंजाइश नहीं बचती।

पंचाट ने इस बात पर जोर दिया कि भौतिकता सीमा (1,000 करोड़ रुपये या कंपनी के सालाना संयुक्त कारोबार के 10 फीसदी से अधिक के लेनदेन में से जो भी कम हो) नियमन के प्रावधान में स्पष्ट रूप से निर्धारित है। ट्रिब्यूनल ने सेबी की इस बात पर सहमति जताई कि यह सीमा वित्त वर्ष के भीतर सभी लेनदेन में संचयी रूप से लागू होनी चाहिए।

इस निर्णय से बड़े आरपीटी के मूल्यांकन के लिए सेबी का ढांचा मजबूत होगा और इससे सूचीबद्ध कंपनियों द्वारा संबंधित पक्षों से जुड़े लेन-देन की संरचना और डिस्क्लोजर पर प्रभाव पड़ने की उम्मीद है।

First Published - December 9, 2025 | 10:23 PM IST

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