Debt Mutual Fund Strategy in 2026: मौद्रिक नीति में ढील और बॉन्ड बाजार में तेजी का दौर अब खत्म हो रहा है। 2026 में डेट म्युचुअल फंड निवेशकों को एक अलग तरह का माहौल देखने को मिलेगा। एक्सपर्ट्स के बीच एक आम सहमति है कि ब्याज दरों में गिरावट से मिलने वाला बड़ा फायदा पहले ही मिल चुका है। आगे ब्याज दरों में ज्यादा बदलाव की उम्मीद नहीं है। इसलिए निवेशकों को बहुत ज्यादा जोखिम लेने के बजाय सामान्य रिटर्न की उम्मीद रखनी चाहिए और सोच-समझकर निवेश करना चाहिए।
केंद्रीय बैंक ने 2025 में रीपो रेट में 125 आधार अंकों की कटौती की थी। यह दौर अब लगभग पूरा हो चुका है। फिलहाल मौद्रिक नीति का रुख तटस्थ (neutral) है। इसका मतलब है कि आगे ब्याज दरें घटेंगी या बढ़ेंगी, यह आने वाले आर्थिक आंकड़ों पर निर्भर करेगा।
क्वांटम एएमसी के फिक्स्ड इनकम फंड मैनेजर मयूर चौहान के अनुसार, आगे ब्याज दरों में कटौती तभी संभव है जब महंगाई तय लक्ष्य से नीचे बनी रहे और आर्थिक वृद्धि में कुछ कमजोरी दिखाई दे।
हालांकि अभी महंगाई नियंत्रण में है, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में यह 4 फीसदी के करीब पहुंच सकती है। स्वतंत्र डेट मार्केट एक्सपर्ट जॉयदीप सेन के अनुसार, 6 फरवरी को एक आखिरी बार ब्याज दर में कटौती हो सकती है, लेकिन इसकी संभावना 50 फीसदी से भी कम है।
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2025 में ड्यूरेशन स्ट्रैटेजी से निवेशकों को अच्छा फायदा हुआ। उस समय ब्याज दरों में कटौती चल रही थी। अब जब ब्याज दरों में कटौती का दौर खत्म होने के करीब है, तो ड्यूरेशन से होने वाला बड़ा कैपिटल गेन दोबारा मिलना मुश्किल है। यह स्ट्रैटेजी तभी काम करती है, जब आगे और ब्याज दरों में कटौती की साफ संभावना हो, जो फिलहाल नजर नहीं आ रही है।
ऐसे माहौल में ज्यादातर निवेशकों के लिए लॉन्ग ड्यूरेशन वाले फंड में निवेश बढ़ाना सही नहीं है। एक्सिस म्युचुअल फंड के फिक्स्ड इनकम हेड देवांग शाह के अनुसार, 2026 में निवेशकों को पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा कम ड्यूरेशन वाली स्कीमों में रखना चाहिए और नियमित ब्याज कमाई (अक्रूअल) पर ध्यान देना चाहिए।
इस समय ड्यूरेशन पर दांव लगाने में जोखिम ज्यादा है। चूंकि ब्याज दरों में कटौती लगभग पूरी हो चुकी है, बाजार आगे चलकर अगले चरण यानी 2027 से ब्याज दर बढ़ने की संभावना को भी आंकने लग सकता है। ऐसा हुआ तो लॉन्ग टर्म मैच्योरिटी वाले बॉन्ड को ज्यादा नुकसान होगा।
रुपया भी दबाव में है। प्लान अहेड वेल्थ एडवाइजर्स के फाउंडर और सीईओ विशाल धवन के अनुसार, जब मुद्रा पर दबाव होता है, तब शॉर्ट टर्म ब्याज दरों से जुड़े दांव भी ज्यादा जोखिम भरे हो जाते हैं।
जो निवेशक फिर भी लॉन्ग ड्यूरेशन वाले फंड में निवेश करना चाहते हैं, उनके लिए निवेश अवधि बहुत अहम है। सेन के मुताबिक, निवेश अवधि फंड की एवरेज मैच्योरिटी के करीब होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, अगर किसी फंड की एवरेज मैच्योरिटी 10 साल है, तो निवेशक को कम से कम 8 से 10 साल का नजरिया रखना चाहिए।
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मीडियम-ड्यूरेशन फंड आमतौर पर चार से छह साल की मैच्योरिटी वाले बॉन्ड में निवेश करते हैं। ये रिटर्न की संभावना और ब्याज दर जोखिम के बीच संतुलन प्रदान करते हैं। शाह के अनुसार, जिस साल ब्याज दरें ज्यादातर स्थिर रहने की उम्मीद हो, उस समय पोर्टफोलियो को नियमित ब्याज कमाई (अक्रूअल) पर फोकस रखना चाहिए।
इस सेगमेंट में यील्ड आमतौर पर शॉर्ट-ड्यूरेशन फंड से ज्यादा होती है, जिससे बेहतर रिटर्न की संभावना बनती है। हालांकि, चौहान कहते हैं कि मीडियम-ड्यूरेशन फंड उन्हीं निवेशकों के लिए हैं जो थोड़ा जोखिम उठा सकते हैं। आर्थिक मंदी, महंगाई में अचानक बढ़ोतरी, कमोडिटी कीमतों में झटके या रुपये में तेज उतार-चढ़ाव जैसे जोखिम ब्याज दरों में बढ़ोतरी का कारण बन सकते हैं। अगर यील्ड बढ़ती है, तो फंड के मूल्य में गिरावट (मार्क-टू-मार्केट नुकसान) हो सकती है।
सेन का सुझाव है कि निवेशकों को अपनी निवेश अवधि इन फंडों की मैच्योरिटी के हिसाब से रखनी चाहिए और आदर्श रूप से चार से छह साल तक निवेशित रहना चाहिए।
एक और अहम बात है क्रेडिट क्वालिटी। धवन के अनुसार, कई मीडियम-ड्यूरेशन फंड शॉर्ट-ड्यूरेशन फंड की तुलना में कम रेटिंग वाले बॉन्ड में ज्यादा निवेश करते हैं। इसलिए क्रेडिट रिस्क और एक्सपेंस रेशियो को ध्यान से परखना जरूरी है।
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शॉर्ट-ड्यूरेशन फंड मौजूदा माहौल के लिए ज्यादा बेहतर हैं। इनका रिटर्न मुख्य रूप से नियमित ब्याज आय (अक्रूअल) से आता है। अगर ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो इन फंडों पर मार्क-टू-मार्केट उतार-चढ़ाव का असर भी कम होता है।
ये फंड खास तौर पर उन निवेशकों के लिए सही हैं, जिनकी निवेश अवधि छह महीने से एक साल की है, या जो निकट भविष्य के लक्ष्यों के लिए पैसा अलग रख रहे हैं। धवन के अनुसार, अगर 2026 तक सिस्टम में लिक्विडिटी बनी रहती है, तो शॉर्ट-ड्यूरेशन फंड में निवेश करने वालों को फायदा मिल सकता है।
निवेश कहां करें और किससे बचें?
करीब दो साल की मध्यम अवधि के लिए शाह ने इनकम-प्लस आर्बिट्राज फंड-ऑफ-फंड्स में निवेश का सुझाव दिया है। यह विकल्प हाई टैक्स स्लैब वाले निवेशकों के लिए टैक्स के लिहाज से ज्यादा फायदेमंद हो सकता है।
निवेश करते समय अवधि का सही चुनाव सबसे जरूरी होता है। सेन के मुताबिक, एक साल से कम अवधि के लिए अल्ट्रा-शॉर्ट और लो-ड्यूरेशन फंड बेहतर हैं। तीन से पांच साल की अवधि के लिए मीडियम-ड्यूरेशन और कॉरपोरेट बॉन्ड फंड बेहतर रहते हैं। वहीं, लंबे समय के निवेश के लिए लॉन्ग-ड्यूरेशन फंड सही विकल्प होते हैं।
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2026 में निवेशकों को ज्यादा रिटर्न के पीछे भागने के बजाय जोखिम को समझने पर ध्यान देना चाहिए। चौहान के अनुसार, जिन फंड्स ने पहले बहुत ज्यादा रिटर्न दिया है, उनमें अक्सर क्रेडिट या ड्यूरेशन का जोखिम भी ज्यादा होता है। डेट फंड का काम पोर्टफोलियो को स्थिरता देना होता है, इसलिए हाई क्वालिटी वाले और सुरक्षित पोर्टफोलियो से मिलने वाला स्थिर रिटर्न ज्यादा बेहतर है।
निवेशकों को यह सोचकर डेट में निवेश कम नहीं करना चाहिए कि हाल के वर्षों में इक्विटी या कीमती धातुओं ने अच्छा प्रदर्शन किया है। पोर्टफोलियो को संतुलित रखने में डेट फंड की भूमिका बहुत अहम होती है। खर्चों पर भी खास ध्यान देना जरूरी है। साथ ही, केवल पुराने रिटर्न को देखकर भविष्य की उम्मीद नहीं लगानी चाहिए, क्योंकि वे रिटर्न ऐसे ब्याज दर माहौल में बने थे, जो अब मौजूद नहीं है।