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ज्यादा कारगर नहीं रेमडेसिविर!

Last Updated- December 14, 2022 | 10:33 PM IST

विषाणु रोधी दवा रेमडेसिविर पर सवाल उठने के बावजूद डॉक्टर इस बात को लेकर सहमत है कि वे मरीजों को इस दवा के इस्तेमाल की सलाह देते रहेंगे। वैश्विक स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने रेमडेसिविर की वैश्विक स्तर पर जांच में पाया है कि यह दवा कोविड-19 के इलाज में बहुत कारगर साबित नहीं है। डब्ल्यूएचओ के इस बयान के भारत की बड़ी दवा कंपनियों कैडिला हेल्थकेयर, सिप्ला और जुबिलैंट लाइफ साइंसेस के शेयरों में तेजी दिखी। इस समाचार के बाद कैडिला का शेयर शुक्रवार को बीएसई पर 3.4 प्रतिशत उछल गया। डब्ल्यूएचओ के परीक्षण के दौरान 30 देशों में अस्पतालों में भर्ती 11,266 कोविड-19 मरीजों पर दवा का इस्तेमाल किया गया।
इस परीक्षण के नतीजों में कहा गया कि रेडमेसिविर और डाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन, लोपिनाविर और इंटरफलॉन दवाओं का कोविड से होने वाली मृत्यु दर पर खास असर नहीं हुआ है। अध्ययन में दावा किया गया है कि अस्पताओं में भर्ती मरीजों को जल्द ठीक करने में भी यह दवा लगभग बहुत कारगर नहीं रही है। अध्ययन में कहा गया है, ‘ऐसा लगता है कि इन दवाओं का अस्पतालों में महामारी से होने वाली मौत की दर कम करने में बहुत अधिक कामयाबी नहीं मिली है।’
हालांकि भारतीय दवा कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि अध्ययन के नतीजों के बाद रेमडेसिविर की मांग में किसी तरह की कमी आएगी। अधिकारियों ने कहा कि जब तक डॉक्टर यह दवा लेने की सलाह देते रहेंगे तब तक इसकी मांग पर असर नहीं पडऩा चाहिए। ये अधिकारी उन दवा कंपनियों के थे, जिन्होंने रेमडेसिविर बनाने और इसकी बिक्री के लिए गिलियड के साथ लाइसेंस संबंधी समझौते किए हैं। विश्लेषकों को भी लगता है कि सिप्ला और कैडिला हेल्थकेयर जैसी दवा कंपनियों के शेयरों पर कोई खास असर नहीं होगा। दौलत कैपिटल की उपाध्यक्ष (शोध) सपना झावर ने कहा, ‘उनके कुल राजस्व में रेमडेसिविर का योगदान बहुत अधिक नहीं होता है। यह भी नहीं लग रहा है कि एक अध्ययन के नतीजों के आधार पर डॉक्टर मरीजों को यह दवा लिखनी बंद कर देंगे।’
प्रयोगशाला में इस दवा को लेकर अनुभवों पर मणिपाल हॉस्पिटल्स में इंटरवेंशनल पलमोनोलॉजी विभाग के प्रमुख सत्यनारायण मैसूर ने कहा कहा कि यह जरूरी नहीं है कि डब्ल्यूएचओ के खुले परीक्षण के दौरान इस दवा की क्षमता या मरीजों पर इसके प्रभाव का सही असर सामने आए। उन्होंने कहा, ‘कर्नाटक में गठित एक कार्यबल के सदस्य के तौर पर मैंने देखा है कि रेमडेसिविर कितना असरदार रहा है। 15 जुलाई से पहले जब दवा उपलब्ध नहीं थी तो सरकारी अस्पतालों में कोविड-19 से होने वाली मृत्यु दर और मरीजों पर इसर असर काफी था। रेमडेसिविर के आने के बाद निश्चित तौर पर कोविड माहामारी पर नियंत्रण पाने में मदद मिली है।’
हालांकि उन्होंने कहा कि रेमडेसिविर कोई चमत्कारी दवा नहीं है, लेकिन समय पर इसे दिया जाए तो इसके अच्छे परिणाम दिखते हैं। इस बीच, अमेरिकी दवा कंपनी एवं रेमडेसिविर खोज निकालने वाली गिलियड ने इस बात को लेकर चिंता जताई है कि वैश्विक परीक्षण के दौरान आए आंकड़ों की पुख्ता समीक्षा नहीं हो पा रही है। रेमडेसिविर दवा का इस्तेमाल वास्तव में इबोला के इलाज के लिए किया गया था। अमेरिकी खाद्य एवं दवा प्रशासन ने इस वर्ष मई में कोविड-19 की रोकथाम के लिए इस दवा के इस्तेमाल की आपात मंजूरी दी थी।

First Published - October 16, 2020 | 11:20 PM IST

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