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हीरा नगरी सूरत पर अमेरिकी टैरिफ का असर: मजदूरों की आय घटी, कारोबार का भविष्य अंधकार में

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सूरत हीरा तराशने वाला दुनिया का प्रमुख केंद्र है, यहां मौजूद करीब 5,000 इकाइयों में 8 लाख से अ​धिक कारीगर काम करते हैं

Last Updated- October 03, 2025 | 10:54 PM IST
Diamond

सूरत में 37 वर्षीय अनंत पटेल शहर की भीड़भाड़ वाली सड़कों पर टैक्सी चलाकर रोजाना हीरा तराशने वाले लोगों के मुकाबले अ​धिक कमाई कर लेते हैं। कभी हीरा तराशने में काफी अच्छी कमाई होती थी।

पटेल हीरा तराशने की बारीकियां अच्छी तरह जानते हैं। कभी वह भी हीरा तराशने का काम करते थे। कई साल पहले वह इस काम से अलग हो गए थे। मगर अब वह खुद को भाग्यशाली मानते हैं क्योंकि अमेरिकी शुल्क के प्रभाव में सूरत के हीरा उद्योग की चुनौतियां बढ़ने लगी हैं और इस कारोबार का भविष्य अंधकारमय दिखने लगा है।

पटेल के कई साथी अभी भी इस संकट के चपेट में हैं। अमेरिकी शुल्क के कारण हीरों की मांग कम हो गई है। ऐसे में हीरा तलाशने वाली इकाइयों में काम करने वाले लोग वेतन के लिए अनिश्चितता से जूझ रहे हैं। हीरा तराशने वाली इकाइयों के संचालक दीवाली के बाद लागत में कटौती की योजनाएं बना रहे हैं। अगस्त में अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर 50 फीसदी शुल्क लगाए जाने के बाद से ही मांग में 40 फीसदी से अ​धिक की गिरावट आ चुकी है। उन्होंने आगाह किया है कि वेतन में 5,000 से 10,000 रुपये प्रति माह की कटौती दिख सकती है जो कर्मचारी की आय का 10 से 20 फीसदी है।

हीरा तराशने वाली एक इकाई के एक मालिक ने कहा, ‘मासिक भुगतान में कटौती के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है। हमारे पास पहले से ही काफी कम काम है। हम कुशल कर्मचारियों को नहीं निकालेंगे क्योंकि उन्हें दोबारा काम पर रखना एक बड़ी चुनौती होगी।’

सूरत हीरा तराशने वाला दुनिया का प्रमुख केंद्र है। यहां मौजूद करीब 5,000 इकाइयों में 8 लाख से अ​धिक कारीगर काम करते हैं। हर 10 हीरों में से 9 को सूरत की इकाइयों में ही तराशा जाता है। हीरा इकाइयों के संचालकों और हीरा व्यापारियों, दोनों के लिए अमेरिका सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। भारत में तराशे गए हर 10 में से 3 हीरे अमेरिकी दुकानों में पहुंचते हैं।

अगस्त में दोहरे शुल्क के बाद रत्न एवं आभूषण पर औसत प्रभावी अमेरिकी शुल्क बढ़कर 55 फीसदी हो गया है। भारतीय रत्न एवं आभूषणों के लिए बुनियादी एमएफएन दर 0 से 7 फीसदी के दायरे में होती है।

सोने की चमक हीरा से अ​धिक 

व्यापारियों का कहना है कि कीमतों पर दबाव बढ़ने के कारण घरेलू बाजार अंतर को पाटने में असमर्थ है। करीब तीन दशक से हीरा तराशने वाली इकाई चला रहे गौरवभाई पटवा के लिए यह अब तक की सबसे खराब मंदी है। उन्हें हाल में करीब 3.5 लाख रुपये के एक हार का ऑर्डर मिला है। पटवा ने कहा, ‘हार में लगभग 2.5 लाख रुपये का सोना, करीब 15,000 रुपये की मजदूरी और महज करीब 35,000 रुपये के हीरे हैं। आप सोने की कीमतें नहीं बदल सकते। मजदूरी पहले से ही तय है। अगर मैं हीरों पर 100 फीसदी मार्क-अप लेता हूं तो भी मुझे करीब 17,000 रुपये ही मिलेंगे।’ यह एक असंतुलन की ओर इशारा करता है कि सोना अब हीरों पर भारी पड़ने लगा है।

सोने की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। 24 कैरट के 10 ग्राम सोने की कीमत करीब 1.20 लाख रुपये है। यह उतार-चढ़ाव के कारण मार्जिन कम हो रहा है।

पटवा ने कहा, ‘सूरत में आप हीरों पर 100 फीसदी तक छूट नहीं दे सकते क्योंकि हर दूसरा व्यक्ति हीरों का व्यापार करता है और प्रतिस्पर्धी कीमत की पेशकश करता है। इसके अलावा सोने की बढ़ती कीमतें भी एक बड़ी चुनौती है। जब ग्राहक को अनुमानित मूल्य बताया गया था तब सोने की कीमत 1,10,000 रुपये थी। मगर आज वह 1,17,000 रुपये से अधिक हो चुकी है। कीमतों में उतार-चढ़ाव से मार्जिन को झटका लगता है।’

एक अन्य ऑपरेटर ने बताया कि उन्होंने प्रयोगशाला में बनाए गए हीरों से जड़ी एक सोने की अंगूठी तैयार की। हीरे की कीमत महज 910 रुपये थी जो पिछले कई दशकों में सबसे कम है। उन्होंने कहा, ‘यह मुफ्त में हीरे देने जैसा है। उसकी लागत की भरपाई केवल सोने और श्रम से ही हो पाती है।’

नए बाजार की तलाश 

निर्यात पर नजर डालने से एक कड़वी सच्चाई का पता चलता है। भारत के रत्न एवं हीरे ने वित्त वर्ष 2025 में वैश्विक स्तर पर 28.67 अरब डॉलर का कारोबार किया जो एक साल पहले के 32.29 अरब डॉलर से 11 फीसदी कम है। अकेले अमेरिका में मांग 6 फीसदी घटकर 9.24 अरब डॉलर रह गई है। संयुक्त अरब अमीरात और हॉन्ग कॉन्ग जैसे बाजारों में भी मांग क्रमश: 3 फीसदी और 32 फीसदी सिकुड़ चुकी है।

भारतीय हीरा संस्थान के अध्यक्ष दिनेश नवदिया ने कहा, ‘अगर हम शुल्क की कुछ लागत का बोझ उठाने की कोशिश भी करते हैं तो भी नकदी की कमी जैसी समस्या बरकरार रहती है।’ मगर उन्होंने उम्मीद जताई कि प्रयोगशाला में तैयार किए गए हीरों में अच्छी संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा, ‘अच्छी बात यह है कि प्रयोगशाला में तैयार किए गए हीरे बाजार में आ गए हैं, जिससे उद्योग को मदद मिल सकती है।’ प्रयोगशाला में तैयार किए गए हीरों को तराशने के लिए बराबर कौशल की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा, ‘भारत में प्रयोगशाला में तैयार किए गए हीरों की मांग बढ़ रही है और इसलिए मजदूर ऐसी शिकायत नहीं कर रहे हैं कि उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है।’ मगर वह मानते हैं कि प्रयोगशाला में बनाए गए हीरों का कारोबार प्राकृतिक हीरों जितना अच्छा नहीं है।

हीरा उद्योग अब खाड़ी, यूरोप और चीन में नए बाजार की तलाश कर रहा है। फिलहाल मजदूरों के पास नौकरियां हैं लेकिन सवाल यह है कि सूरत अपनी चमक कब तक बरकरार रख पाएगा।

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First Published - October 3, 2025 | 10:37 PM IST

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