भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए साल 2025 को तमाम उपब्धियों के लिए याद किया जाएगा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अनुसार साल के दौरान उसने 200 महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कीं। इनमें सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से 100वें रॉकेट प्रक्षेपण से लेकर शुभांशु शुक्ला की अंतरिक्ष यात्रा और अंतरिक्ष डॉकिंग तक शामिल हैं। भारत अब अंतरिक्ष डॉकिंग तकनीक में महारत हासिल करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया है।
मगर अब देश को जल्द ही एक अन्य महत्त्वपूर्ण क्षण दिखने वाला है जब गगनयान के तहत परीक्षण के तौर पर पहला मानव रहित प्रक्षेपण किया जाएगा। यह 2027 में निर्धारित भारत के मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन की उलटी गिनती शुरू होने का संकेत होगा। इसरो के चेयरमैन वी नारायणन ने तिरुनेलवेली में पिछले सप्ताह के आखिर में मीडिया से बातचीत में कहा कि देश दिसंबर में गगनयान के तहत अपने पहले मानव रहित रॉकेट का परीक्षण देख सकता है। उद्योग सूत्रों ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि तारीखों को अभी अंतिम रूप दिया जाना बाकी है और इसे 2026 की पहली छमाही तक भी बढ़ाया जा सकता है।
गगनयान इसरो का एक महत्त्वपूर्ण मिशन है। इसके तहत भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों के तीन सदस्यीय दल को तीन दिवसीय मिशन पर पृथ्वी से 400 किलोमीटर ऊपर की कक्षा में स्थापित किया जाएगा। खबरों से पता चलता है कि इस मिशन के लिए अब तक करीब 20,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। गगनयान की योजनाएं हों या न हों, मगर साल 2025 आगे की कई उपब्धियों के लिए शुरुआती वर्ष साबित हो सकता है।
उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में जबरदस्त उछाल दिख रही है। साल 2025 में इस क्षेत्र में स्टार्टअप की तादाद बढ़कर 400 तक पहुंच गई। नवाचार एवं निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए इन-स्पेस के तहत 1,000 करोड़ रुपये का महत्त्वपूर्ण वीसी फंड है। नैशनल जियोस्पेशियल मिशन के रोडमैप से 2030 तक भारत में 1 लाख करोड़ रुपये का भू-स्थानिक बाजार बनने की उम्मीद है।
एचआर समाधान प्रदाता एडेको इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था 2033 तक 5 गुना से अधिक बढ़कर 44 अरब डॉलर तक पहुंचने की ओर अग्रसर है। इस प्रक्रिया में 2,00,000 से अधिक नए रोजगार सृजित होंगे। इससे इंजीनियरों, शोधकर्ताओं, डेटा वैज्ञानिकों और कारोबारी पेशेवरों के लिए नए अवसर सृजित होंगे। इसके अलावा स्पेस पॉलिसी एनालिस्ट, रोबोटिक्स इंजीनियर, एवियोनिक्स स्पेशलिस्ट और जीएनसी (गाइडेंस, नेविगेशन ऐंड कंट्रोल) विशेषज्ञ जैसी नए जमाने की भूमिकाएं भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए महत्त्वूपर्ण होती जा रही हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘आगामी उपब्धियों में अगले सप्ताह निर्धारित गगनयान मिशन, एग्जिओम-4 आईएसएस कार्यक्रम में भारत की भागीदारी और देश के अपने अंतरिक्ष स्टेशन का विकास शामिल हैं। इससे न केवल इसरो बल्कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में उभरती स्टार्टअप तक पूरे परिवेश में प्रतिभाओं की मांग में तेजी आएगी। फिलहाल भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था वैश्विक बाजार में करीब 2 फीसदी का योगदान कर रही है। सरकार ने इसे बढ़ाकर 2033 तक 44 अरब डॉलर करने का लक्ष्य रखा है। इसमें 11 अरब डॉलर का निर्यात भी शामिल है जिससे वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के 7 से 8 फीसदी हिस्से पर भारत का वर्चस्व हो जाएगा।’
इंडियन स्पेस एसोसिएशन (आईएसपीए) का मानना है कि इस तेजी को मुख्य तौर पर सरकार द्वारा किए गए अहम सुधारों, निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी और अंतर्राष्ट्रीय करारों से रफ्तार मिलेगी। आईएसपीए के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) एके भट्ट ने कहा, ‘इस परिवर्तनकारी वृद्धि को एक डायनेमिक इकोसिस्टम से रफ्तार मिल रही है जहां नीतियों के अनुरूप काम हो रहा है। इससे एक जीवंत उद्योग तैयार हो रहा है जहां न केवल स्थापित कंपनियां बल्कि स्टार्टअप भी वैश्विक बाजार के लिए समाधान तैयार कर रही हैं।
प्रगतिशील नीतियों के अलावा व्यापक तौर पर अपनाए जाने और दमदार सार्वजनिक-निजी भागीदारी से भारत को अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में एक आत्मनिर्भर ताकत बनने की दिशा में मदद मिल रही है। भू-स्थानिक क्षेत्र में इसकी झलक मिल रही है, जहां अगले कुछ वर्षों के दौरान 1 लाख करोड़ डॉलर का बाजार होने की उम्मीद है।’
हाल के वर्षों में भू-स्थानिक उद्योग ने जबरदस्त वृद्धि की है। उसमें 13 से 14 फीसदी सीएजीआर के साथ वृद्धि दर्ज की गई है। ईएसआरआई इंडिया के प्रबंध निदेशक अगेंद्र कुमार ने कहा, ‘इस परिवेश में डेटा संग्रह और प्रॉसेसिंग से लेकर सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट एवं ऐप्लिकेशन की तैनाती तक सब कुछ शामिल है। करीब 3,000 कंपनियों में से कई ग्राउंड सर्वे में विशेषज्ञता रखती हैं। ये कंपनियां बाजारों या दुकानों की मैपिंग करते समय अक्षांश, देशांतर और तस्वीरें जुटाने जैसे काम करती हैं। इसके अलावा कई कंपनियां 3डी मैपिंग के लिए एलआईडीएआर सर्वे, ड्रोन सर्वे या एकत्र किए गए डेटा को डिजिटल बनाने का काम करती हैं। इस डेटा को उपयोग के लायक बनाने में सैकड़ों कंपनियां काम करती हैं।’
सुहोरा टेक्नॉलजीज के मुख्य कार्याधिकारी एवं सह-संस्थापक कृषाणु आचार्य का मानना है कि 8.4 अरब डॉलर से करीब 44 अरब डॉलर का योगदान निजी क्षेत्र का होगा।