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भारत रत्न की अहमियत और सियासत

Bharat Ratna : कृषि वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन, पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह और पी वी नरसिंह राव को मरणोपरांत भारत रत्न

Last Updated- February 09, 2024 | 11:32 PM IST
भारत रत्न की अहमियत और सियासत, Importance and politics of Bharat Ratna

गत 23 जनवरी से अब तक पांच भारतीयों को सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने की घोषणा की जा चुकी है। इनमें से तीन नाम शुक्रवार को घोषित किए गए। जनवरी 1954 में इसकी शुरुआत के बाद से यह पहला मौका है जब एक वर्ष में इतने लोगों को सम्मानित किया जा रहा है। जिन पांच नामों का चयन किया गया है उन सभी का राजनीतिक महत्त्व है जिसे आगामी लोक सभा चुनावों से जोड़कर और उसके परे भी देखा जा सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को यह समाचार साझा किया कि कृषि विज्ञानी एम एस स्वामीनाथन और पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह तथा पी वी नरसिंह राव को मरणोपरांत भारत रत्न देने का निर्णय लिया गया है।

स्वामीनाथन को हरित क्रांति का जनक माना जाता है, राव को सन 1991 के आर्थिक सुधारों का जनक माना जाता है और साथ ही उनके ही कार्यकाल के दौरान अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी। चरण सिंह देश के सबसे बड़े किसान नेताओं में से एक थे जो अब भी राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई इलाकों के किसानों के दिलों में खास जगह रखते हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दक्षिण भारत के राज्यों में अपनी चुनावी पैठ बढ़ाना चाहती है और इस संदर्भ में यह बात ध्यान देने लायक है कि राव तेलंगाना के थे और स्वामीनाथन केरल के तमिलभाषी थे।

इससे पहले 23 जनवरी को प्रधानमंत्री ने घोषणा की थी कि उनकी सरकार ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने जा रही है। यह घोषणा उनकी 100वीं जन्मतिथि के एक दिन पहले और अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के एक दिन बाद की गई थी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछड़ा वर्ग के नेताओं में सबसे ऊंचा कद रखने वाले कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दिए जाने का स्वागत किया था। इसके बाद ही 28 जनवरी को नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने दोबारा भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल होने का निर्णय लिया था।

भाजपा को अगर 2019 के लोक सभा चुनाव में 303 सीट हासिल करने के प्रदर्शन को दोहराना है तो बिहार उसके लिए महत्त्वपूर्ण है। ध्यान रहे कि प्रधानमंत्री ने 2024 के लोकसभा चुनाव में 370 सीट पर जीत हासिल करने का लक्ष्य तय किया है। सन 1990 के दशक के मध्य से भी बिहार में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रहा है। नीतीश कुमार का साथ इसमें महत्त्वपूर्ण रहा है क्योंकि अति पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं में उनकी अच्छी पकड़ है। प्रधानमंत्री ने गत सोमवार को लाल कृष्ण आडवाणी को भी भारत रत्न दिए जाने की घोषणा की जिन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी।

शुक्रवार को प्रधानमंत्री ने कहा कि चरण सिंह को भारत रत्न देना किसानों के हित में किए गए उनके कामों, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल और आपातकाल के खिलाफ उनकी लड़ाई जैसे योगदानों का सम्मान करना है। इस घोषणा के कुछ ही मिनट बाद चरण सिंह के पोते और राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष जयंत चौधरी ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘दिल जीत लिया।’ 

राष्ट्रीय लोकदल समाजवादी पार्टी से गठबंधन तोड़कर आगामी 12 फरवरी को भाजपा के साथ जा सकती है। उस दिन जयंत के पिता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजित सिंह का जन्मदिन है। अजित सिंह पी वी नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की सरकारों में मंत्री रह चुके हैं। भाजपा और राष्ट्रीय लोक दल की साझेदारी से यही संकेत निकलने वाला है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है। 2019 में पार्टी को यहां 80 सीट में से 16 पर हार का सामना करना पड़ा था। 

जयंत चौधरी बागपत लोकसभा सीट पर भाजपा के सत्यपाल सिंह से 23,502 मतों से हार गए थे। भाजपा को 2020-21 के कृषि कानून विरोधी आंदोलन के बावजूद किसान समर्थक के रूप में देखे जाने की उम्मीद है। राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों के नेतृत्व वाले इस आंदोलन के कारण नवंबर 2021 में यानी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले सरकार ने कानून वापस ले लिए थे।

पूर्व प्रधानमंत्री राव को भारत रत्न देने की घोषणा करते हुए मोदी ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल तथा देश के प्रधानमंत्री के रूप में आर्थिक सुधारों को अंजाम देने वाले उनके ‘दूरदर्शी नेतृत्व’ को याद किया। ध्यान रहे कि नेहरू-गांधी परिवार के बाहर से पहले कांग्रेसी प्रधानमंत्री राव तेलंगाना से थे जहां भाजपा को 2019 में चार सीट पर जीत मिली थी। 

इस बार पार्टी सीट बढ़ाना चाहती है। परंतु एक लड़ाई राव की विरासत की भी है जिसके बारे में कहा जाता है कि कांग्रेस ने हाल तक उसका सम्मान नहीं किया। उन्हें आर्थिक सुधारों का जनक माना जाता है लेकिन बाबरी मस्जिद का विध्वंस भी उन्हीं के कार्यकाल में हुआ था। 

वह देश के इकलौते ऐसे प्रधानमंत्री थे जिनका राष्ट्रीय राजधानी में कोई स्मारक नहीं है। दिसंबर 2004 में जब राव का निधन हुआ था तब कांग्रेस नेतृत्व ने उनके शव को 24 अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय के भीतर रखने की इजाजत नहीं दी थी। हाल के वर्षों में पार्टी ने राव को नए सिरे से मान देना शुरू किया। 

हाल ही में तेलंगाना विधानसभा चुनावों के दौरान तो पार्टी ने यह घोषणा भी की है कि पार्टी प्रदेश के एक जिले का नाम उनके नाम पर रखेगी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को जो श्वेत पत्र प्रस्तुत किया उसमें कहा गया कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के नेतृत्व ने 2004 में सत्ता में आने के बाद 1991 के आर्थिक सुधारों को ‘विडंबनापूर्ण ढंग से’ त्याग दिया जबकि मोदी सरकार ने 2014 के बाद इन सुधारों को गति प्रदान की।

First Published - February 9, 2024 | 11:32 PM IST

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