बढ़ती आलोचना से परेशान होकर केंद्र सरकार छोटे कारोबारों के लिए दबावग्रस्त संपत्ति गारंटी योजना में तब्दीली करने पर विचार कर रही है। इस योजना को साल भर पहले सरकार के आत्मनिर्भर भारत पैकेज के हिस्से के तौर पर घोषित किया गया था।
पिछले वर्ष मई में सरकार के 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज के हिस्से के तौर पर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अधीनस्थ ऋण के लिए ऋण गारंटी योजना की घोषणा की थी जिसके तहत दबावग्रस्त सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के प्रवर्तकों को व्यक्तिगत ऋण दिए जाते हैं। कारोबारी इकाई में प्रमोटरों द्वारा धन इक्विटी के रूप में लगाया जाता है।
इस दिशा में सरकार अधीनस्थ ऋण के तौर पर 20,000 करोड़ रुपये का प्रावधान कर रही है।
यह योजना 2,00,000 लघु और मध्यम कारोबारों को लाभ पहुंचाने के लिए लॉन्च की गई थी। योजना को 1 जून, 2020 को मंत्रिमंडल से मंजूरी मिली थी और इसे पिछले वर्ष अगस्त में परिचालित किया गया।
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा कि 14 मई को केवल 68.39 करोड़ रुपये की गारंटी दी गई थी जिससे 632 कारोबारों को लाभ हुआ था।
उक्त अधिकारी ने कहा, ‘इस योजना का लाभ लेने वाले ज्यादा लोग नहीं है। योजना को कम प्रतिक्रिया मिल रही है। लोग इस का चुनाव करने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं। बैंकों ने ऐसी कंपनियों से संपर्क करना शुरू किया है जिनका खाता गैर निष्पादित संपत्ति (एनपीए) में बदलने वाला है।’
योजना का लाभ उठाने के लिए कठिन पात्रता, बैकों की ओर लाई गई जटिल प्रक्रियाओं और इस योजना से लाभान्वित होने के प्रति प्रमोटरों की अरुचि से योजना की मांग लगातार कम बनी रही है।
अधिकारी ने कहा कि एमएसएमई मंत्रालय ने बैंकों और भारतीय बैंक संघ (आईबीए) से ऐसे उपाय सुझाने के लिए कहा है जिससे योजना को आकर्षक बनाया जा सके जिसके बाद प्रस्तावित बदलावों पर वित्त मंत्रालय के वित्त सेवा विभाग के साथ चर्चा की जाएगी।
पीएचडी चैम्बर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष संजय अग्रवाल ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा कि योजना लाभकारी हो सकती थी लेकिन जागरूकता की कमी के कारण इसका असर कम रहा।
अग्रवाल ने कहा, ‘योजना को कमजोर प्रतिक्रिया मिलने के पीछे एक और वजह इसका जटिल मॉडल है। मालिकों की गारंटी पर दबावग्रस्त एमएसएमई को बैंकों की ओर से सीधे ऋण मुहैया कराने की बजाय दबावग्रस्त खातों को नियमित करने के लिए घुमावदार मार्ग अपनाने की जरूरत है। इससे योजना अधिक आकर्षक होती और दबावग्रस्त एमएसएमई को अभीष्ट लाभ मिल पाता।’
उक्त अधिकारी ने कहा, ‘योजना को मिल रही कम प्रतिक्रिया की एक प्रमुख वजह यह है कि ऋण प्रमोटरों को दिया जा रहा है न कि उद्यमों को। प्रमोटर अपने स्तर पर जोखिम उठाने को इच्छुक नहीं हैं।’ एक अन्य अधिकारी ने कहा कि प्रमोटरों को अधीनस्त ऋण का 10 फीसदी जमानत के तौर पर भी रखना होता है, यह भी एक मुद्दा है।
दिशानिर्देशों के मुताबिक अधीनस्थ ऋण बैंकों द्वारा मुहैया कराई जाती है और इसकी गारंटी क्रेडिट गारंटी ट्रस्ट फॉर मीडियम ऐंड स्मॉल एंटरप्राइजेज (सीजीटीएमएसई) द्वारा दी जाती है। प्रमोटरों को कंपनी में उसकी हिस्सेदारी के 15 फीसदी के बराबर या 75 लाख रुपये जो भी कम हो, का ऋण दिया जाता है। एसएसएमई मंत्रालय सीजीटीएमएसई को 4,000 करोड़ रुपये का समर्थन दे रहा है।
योजना ऐसे एमएसएमई के लिए है जिनका खाता 31 मार्च, 2018 को मानक था और 2018-19 और 2019-20 के दौरान मानक खातों या एनपीए खातों के रूप में नियमित परिचालन में रहा था। हालांकि, फर्जी खातों और जानबूझकर चूककर्ताओं के लिए इसमें विचार नहीं किया जाएगा।
अप्रैल में एमएसमएमई मंत्रालय ने योजना की अवधि को बढ़ाकर 30 सितंबर कर दिया।