दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में इंडिगो की उड़ानों में हुई गड़बड़ियों को लेकर बुधवार को केंद्र सरकार को फटकार लगाई। अदालत ने सवाल किया कि कैसे सरकार ने इस स्थिति को अराजकता में बदलने दिया। अदालत ने विमानन कंपनी इंडिगो को यात्रियों को हुई परेशानी के लिए मुआवजा देने का भी निर्देश दिया।
मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला का एक पीठ प्रभावित यात्रियों के लिए रिफंड और सहायता की मांग वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
न्यायाधीशों ने विमानन कंपनी द्वारा संचालन का प्रबंधन करने में नाकाम रहने और सरकार द्वारा समय पर हस्तक्षेप करने में असफल रहने, दोनों ही बातों पर ध्यान दिलाया। मुख्य न्यायाधीश उपाध्याय ने विमानन कंपनी से कहा कि जहां तक मुआवजे का संबंध है विमानन कंपनी को ‘2010 के परिपत्र के अनुसार इसे तुरंत शुरू करना होगा।’
अदालत ने कहा, ‘उन लोगों के बारे में सोचें जो उन दिनों एक सप्ताह के लिए फंसे रहे और उन्हें आक्रामक स्टाफ का सामना करना पड़ा। अर्थव्यवस्था पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है जिसका आकलन नहीं किया गया है? मुआवजा न केवल उड़ाने रद्द करने के लिए बल्कि यात्रियों को उससे हुई दिक्कतों जैसे अन्य नुकसान के लिए भी होना चाहिए।’
अदालत ने इंडिगो को 6 अगस्त, 2010 को जारी किए गए नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) के परिपत्र का पालन करने के लिए कहा, जिसमें बोर्डिंग से वंचित, रद्द या देरी का सामना करने वाले यात्रियों के लिए मुआवजे का प्रावधान है। इसने डीजीसीए और नागरिक उड्डयन मंत्रालय को भी इसका पूर्ण पालन सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति गेडेला ने सवाल किया कि इस दौरान अन्य विमानन कंपनियों को स्थिति का फायदा उठाने की अनुमति कैसे दी गई। उन्होंने कहा, ‘अगर कोई संकट है, तो दूसरी विमानन कंपनियां इसका फायदा कैसे उठा सकती हैं? टिकट की कीमतें 30,000-40,000 रुपये तक कैसे हो सकती हैं?’अदालती कार्यवाही के दौरान, पीठ ने निगरानी में कमी के लिए केंद्र सरकार की भी आलोचना की।
डीजीसीए और नागरिक उड्डयन मंत्रालय का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) चेतन शर्मा से मुख्य न्यायाधीश उपाध्याय ने पूछा कि ऐसी स्थिति क्यों आई। अदालत ने कहा, ‘ऐसी स्थिति क्यों आई? यह महज यात्रियों के फंसे होने का सवाल नहीं है बल्कि सवाल अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान का भी है। ये सभी कदम संकट आने के बाद उठाए गए हैं। सवाल यह है कि यह संकट आया ही क्यों और आप क्या कर रहे थे?’