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Stubble burning: कब मिलेगा पराली के धुएं से छुटकारा

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पंजाब ने पराली जलाने से रोकने के लिए करीब 350 करोड़ रुपये रखे हैं, जो पिछले साल के 200 करोड़ रुपये से 75 फीसदी ज्यादा हैं।

Last Updated- October 11, 2023 | 11:22 PM IST
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उत्तरी राज्यों और राजधानी दिल्ली का दम घोटने वाला पराली का धुआं एक बार फिर चर्चा में है और इस पर पंजाब तथा उसके पड़ोसी राज्यों विशेषकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के बीच खींचतान शुरू हो गई है। पराली फसल का निचला ठूंठ होता है, जिसे काटने के बजाय किसान जला देते हैं ताकि अगली फसल बोने के लिए खेत खाली मिल सके। इसके कारण हर साल सर्दियों में एनसीआर में प्रदूषण बहुत बढ़ जाता है।

सितंबर के अंत या अक्टूबर के आरंभ में धान की फसल कटने के बाद खेतों में ठूंठ रह जाते हैं, जिनमें से कुछ तो दो फुट तक ऊंचे होते हैं। अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में गेहूं की बोआई शुरू होती है, इसलिए किसानों के पास ठूंठ या पराली हटाने का वक्त नहीं होता। उनके पास पराली खत्म करने का सबसे सस्ता और आसान तरीका उसे जलाना होता है।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार हमेशा से इसका आरोप पंजाब सरकार के मत्थे मढ़ती आई है। वह कहती रही है कि पंजाब सरकार समस्या सुलझाने के बजाय हाथ पर हाथ धरे रहती है। मगर पिछले साल विधानसभा चुनाव के बाद पंजाब में भी इसी पार्टी की सरकार बन गई।

उसके बाद पार्टी ने पराली जलाना रोकने के लिए और इसे नहीं जलाने वाले किसानों को नकद प्रोत्साहन देने के लिए बजट बढ़ाने जैसे कई कदम उठाए हैं। इस साल भी पंजाब ने पराली जलाना रोकने के लिए करीब 350 करोड़ रुपये रखे हैं, जो पिछले साल के 200 करोड़ रुपये से 75 फीसदी ज्यादा हैं।

इसके उलट वित्त वर्ष 2021-22 में तत्कालीन पंजाब सरकार ने इसके लिए 40 करोड़ रुपये आवंटित किए थे और उससे पिछले साल तो केवल 1 लाख रुपये दिए गए थे। पंजाब के फिरोजपुर जिले में पीर मोहम्मद गांव का किसान लखविंदर सिंह कहता है, ‘इस साल दिल्ली तक धुआं नहीं जाएगा।’

बिज़नेस स्टैंडर्ड ने पंजाब में चार जिलों के किसानों से बात कर यह जानने की कोशिश की कि उनके सामने क्या परेशानियां हैं और उनमें से कुछ लोग आखिर क्यों पराली जलाए जा रहे हैं। तकरीबन हर किसान ने यही कहा कि पराली जलाने का चलन सरकार की बेरुखी और किसानों की मदद करने में उसकी दिलचस्पी नहीं होने के कारण जारी है।

फिरोजपुर से 50 किलोमीटर दूर माठू गांव के किसान परगट सिंह ने कहा, ‘आपको लगता है कि हमें पराली जलाने में मजा आता है? धुआं दिल्ली तो बाद में पहुंचता है, उससे पहले हमारे घर के बच्चों, बुजुर्गों और औरतों के फेफड़ों में ही जाती है। उनमें से कुछ औरतें गर्भवती हैं और उन्हें सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। सबसे ज्यादा परेशानी तो उन्हें ही भुगतनी पड़ती है। फिर भी हमारे पास पराली जलाने के अलावा कोई चारा नहीं है।’

परगट का कहना है कि सरकार को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) का वह आदेश मानना चाहिए, जिसमें किसानों को खेतों से पराली हटाने के लिए मशीनें देने के लिए कहा गया है। एनजीटी ने 2015 में राज्य सरकारों को पराली इकट्ठी करने और हटाने के लिए किसानों को मशीनें तथा सुविधाएं मुहैया कराने का आदेश दिया था। परगट कहते हैं, ‘आदेश में कहा गया था कि 2 एकड़ से कम जमीन वाले किसानों को मशीनें मुफ्त दी जाएं और 5 एकड़ तक जमीन वाले किसानों को मशीनों के साथ 25,000 रुपये दिए जाएं।’

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परगट कहते हैं, ‘5 एकड़ से ज्यादा जमीन वाले किसानों को मशीन की कीमत पर 50 फीसदी सब्सिडी मिलनी थी। मगर मशीन लगाने और चलाने के लिए हमें ट्रैक्टर भी चाहिए और ट्रैक्टर 10 लाख रुपये में आता है।’ वह बताते हैं कि यह रकम भी गिने-चुने किसानों को ही मिली है।

कुछ लोगों का कहना है कि सरकार कंपनियों के साथ मिलकर मशीन मुहैया कराती हैं और सब्सिडी मिलने से पहले मशीनों की कीमतें बढ़ती हैं। संगरूर से 19 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद एक शहर भवानीगढ़ के एक किसान कुलविंदर सिंह का कहना है, ‘जिस मशीन की लागत 3 लाख रुपये होती है उसे अक्सर सरकार द्वारा तय किए गए विक्रेताओं के जरिये 4.5 लाख रुपये में बेचा जाता है। ऐसे में सब्सिडी के साथ भी किसानों को जितना भुगतान करना चाहिए, उससे ज्यादा भुगतान करना पड़ता है।’

पहले भी कई कंपनियों ने किसानों द्वारा पराली जलाने में कमी लाने के लिए मदद करने की कोशिश की लेकिन इसमें थोड़ी या बेहद कम सफलता मिली। कई रिपोर्ट में अधिकारियों ने कहा है कि एनटीपीसी ने दावा किया था कि वह चार साल तक 2 करोड़ टन पराली का इस्तेमाल कर उसे जैवईंधन में बदलेगी लेकिन उसे केवल 35 लाख टन पराली ही मिल पाई।

सरकारी कंपनियां इस मकसद से नवंबर 2017 से ही लगातार विज्ञापन अभियान चला रही हैं। एनटीपीसी के अधिकारियों का कहना है कि अब समस्या अधिक आपूर्ति की है। उनका कहना है कि किसी भी पराली जलाने वाले राज्यों ने खेती के अवशेष से जैवईंधन बनाने के लिए निवेश नहीं किया है और न ही कोई इकाई स्थापित की है।

अन्य किसानों ने इस ओर इशारा किया कि सिंचाई से जुड़ी परेशानी ने भी राज्य में पराली जलाने की समस्या में योगदान दिया है। राज्य में 1960 के दशक की हरित क्रांति की शुरुआत से ही पंजाब ने कृषि में विविधता वाली फसलों (मूंग, ज्वार आदि) से लेकर धान और गेहूं के दो फसलों वाले चक्र को अपनाया है। राज्य में खेती में बदलाव आ रहा है और पानी की ज्यादा खपत वाली धान की फसल ने पंजाब के खेतों में अपना दबदबा बढ़ाना शुरू कर दिया है।

हालांकि इसके चलते भूजल स्तर कम हो रहा है और इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए ही राज्य में 2009 में पंजाब अवभूमि जल संरक्षण कानून लाया गया है। इस कानून के तहत सरकार द्वारा तय तारीख के बाद ही धान की रोपनी करने की अनुमति दी जाती है जो समय मॉनसून के आने के बाद का वक्त होता है। इसमें तर्क यह दिया गया कि किसानों को भूजल पर निर्भर रहने के बजाय बारिश के पानी से फायदा मिलेगा।

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हालांकि अक्टूबर 2021 प्रकाशित एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि कानून बनने से कोई फर्क नहीं पड़ता है और सभी राज्यों में पंजाब में सबसे ज्यादा भूजल निकाला जाता है और यह भूजल निकालने की 66 फीसदी की सीमा से कहीं ज्यादा है। कुछ किसानों का कहना है कि उन्हें धान की रोपाई करने में देरी होती है इसकी वजह से फसल भी देर से काटी जाती है। ऐसे में उनके पास गेहूं की बोआई करने के लिए खेत को तैयार करने का कम समय होता है। ऐसे में उन्हें पराली जलानी पड़ती है।

लुधियाना से 19 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद डेहलन के किसान करमजीत सिंह का कहना है, ‘भूजल में कमी के लिए किसानों को दोषी ठहराना सही नहीं है। हम भूजल का इस्तेमाल इसलिए करते हैं क्योंकि हमें नदियों से कुछ नहीं मिलता है। नदियों का ज्यादातर पानी दूसरे राज्यों को भेजा जाता है ऐसे में किसानों को भूजल जैसे वैकल्पिक साधनों की तलाश करनी पड़ती है। हम लोगों के लिए अनाज उगाने के लिए भूजल का इस्तेमाल करते हैं। आप देखिए कि उद्योग क्या कर रहे हैं। वे विषाक्त पानी को नदियों में बहा देते हैं और ये भूमि में भी जाता है। उन्हें कोई कुछ नहीं कहता है। हम पर निशाना साधना सबके लिए आसान है।’

किनू की फसल के लिए मशहूर जगह अभोर को अक्सर पंजाब का कैलिफॉर्निया कहा जाता है और भूजल स्तर घटने से यह क्षेत्र और यहां की फसल प्रभावित हुई है। जब एक किसान से पूछा गया कि वे क्या फिर से विविध फसलों को अपनाना चाहते हैं तब उन्होंने कहा कि अगर सरकार किसानों के अनुकूल योजनाएं लाती है और फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिलेगा तब वे ऐसा विकल्प चुन सकते हैं।

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First Published - October 10, 2023 | 10:13 PM IST

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