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आधुनिक बिजली व्यवस्था की जटिलता का समाधान सिर्फ नई मूल्य निर्धारण प्रणाली से संभव

बिजली क्षेत्र की आधुनिक जटिलताओं का हल समुचित ढंग से कीमतें तय करने में ही निहित है। बता रहे हैं अजय शाह

Last Updated- December 25, 2025 | 9:27 PM IST
Electricity pricing reform
इलस्ट्रेशन- अजय मोहंती

बिजली क्षेत्र एक जमाने में उठापटक से दूर एकदम स्थिर था। कोयले से बिजली बनाने की तकनीक भी दशकों तक ठहरी रही। इस तकनीकी ठहराव ने एक खास तरह की संस्थागत व्यवस्था – केंद्रीय नियोजन को जन्म दिया। राज्य की राजधानियों में बैठकर अधिकारी तय करते थे कि बिजली की क्षमता कितनी होगी, स्थान क्या होगा और वितरण कितना होगा। ग्रिड आपूर्ति और मांग के बीच की खाई को पाटता था और उपभोक्ता नेटवर्क के भौतिक प्रभावों से बचे रहते थे।

बिजली उत्पादन में निजी क्षेत्र की भागीदारी को ‘निजी क्षेत्र की सहभागिता’ कहा गया। परंतु इसमें बाजार अर्थव्यवस्था के गुण नहीं थे। इन व्यवस्थाओं में इक्विटी पर 25 साल के रिटर्न की गारंटी थी। सक्रिय पूंजीवादी व्यवस्था में राज्य द्वारा 25 साल के लिए रिटर्न सुनिश्चित किया जाना असामान्य है। हलचल होने पर केंद्रीकृत नियोजित बिजली प्रणाली का प्रदर्शन बिगड़ना तय था। अब इस प्रणाली को एक साथ तीन झटके लग रहे थे।

पहला है जलवायु परिवर्तन, जो होना ही था। दुनिया भर के बढ़ते तापमान पर वैज्ञानिक एकमत होकर कह रहे हैं – कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन रुकना चाहिए। अब यह नैतिक बाधा नहीं रह गई है बल्कि आर्थिक दिक्कत है, जो कार्बन प्राइसिंग और 1 जनवरी 2026 से लागू होने जा रही यूरोपीय कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम) जैसी व्यवस्थाओं के कारण आ रही है। इसमें वित्तीय क्षेत्र का भी हाथ है, जिसे साफ समझ आ गया है कि जीवाश्म ईंधन का उत्पादन कभी न कभी बंद हो ही जाएगा, इसलिए नई परियोजनाओं पर दांव नहीं खेला जा सकता।

दूसरा झटका तकनीक से जुड़ा है। हमने सोलर फोटोवॉल्टिक और लीथियम ऑयन बैटरी में जबरदस्त तरक्की देखी। यह तरक्की बुनियादी शोध पर विकसित देशों के खर्च से और उसके बाद राइट्स लॉ से आई, जो कहता है: कुल उत्पादन जैसे-जैसे दोगुना होता है, लागत गिरती जाती है। ये क्रमिक सुधार नहीं हैं बल्कि पूंजी की कुशलता में जबरदस्त बदलाव हैं। पवन ऊर्जा उत्पादन तथा अन्य भंडारण तकनीकों में लाभ इतने नाटकीय चाहे नहीं रहे मगर बहुत अधिक हुए हैं। भारत में पश्चिमी घाट जैसे भौगोलिक क्षेत्रों के लिए खास तौर पर कारगर पंप्ड हाइड्रोइलेक्ट्रिक स्टोरेज जैसे विकल्पों को अब सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही है।

तीसरा झटका मांग का आया। सबसे पहले क्रिप्टोकरेंसी माइनिंग शुरू हुई और उसके बाद आर्टिफिशल इंटेलिजेंस यानी एआई आ गई। इन तकनीकों को बहुत अधिक बिजली की जरूरत होती है। इनकी वजह से बिजली की मांग बेहद तेजी से बढ़ रही है, जिसके साथ तालमेल बिठाना केंद्रीय नियोजन व्यवस्था के लिए मुश्किल हो रहा है।

इन तीन बदलावों ने दुनिया भर में केंद्रीकृत नियोजन बिजली प्रणालियों को चरमरा दिया है। ठहरी हुई दुनिया के लिए तैयार किए गए ग्रिड में न तो नए नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादक आ सकते हैं और न ही वह आज के उपभोक्ताओं की मांगें पूरी कर सकता है। हम लोग टुकड़ों में बदलाव से गुजर रहे हैं। जो तकनीक आनी हैं, वे इस्तेमाल के लिए पूरी तरह तैयार हैं। लेकिन संस्थागत ढांचा – संसाधन बांटने वाली मूल्य व्यवस्था – नदारद है। हार्डवेयर तैयार है मगर बाजार अर्थव्यवस्था का सॉफ्टवेयर नहीं है। पाकिस्तान में बिजली व्यवस्था की कहानी बताती है कि भारत में क्या हो सकता है।

भारत के कई राज्यों के खजानों की हालत और वहां कामकाज की स्थिति एकदम पाकिस्तान के हालात से मेल खाती है। क्रॉस सब्सिडी और दूसरी अक्षमताओं के कारण ग्रिड की बिजली जैसे-जैसे भरोसा खोती है और महंगी होती जाती है वैसे-वैसे ही धनवान उपभोक्ता उससे किनारा करते जाते हैं। वे विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा उत्पादन का इंतजाम कर लेते हैं। इससे बिजली वितरण कंपनियों यानी डिस्कॉम का राजस्व घटता है और उनकी माली हालत बिगड़ने लगती है। लागत निकालने के लिए डिस्कॉम बाकी ग्राहकों के लिए शुल्क दरें बढ़ा देती हैं, जिनका बोझ आम तौर पर वाणिज्यिक और औद्योगिक उपभोक्ताओं पर ही आता है। ऐसे में वे उपभोक्ता भी ग्रिड छोड़ जाते हैं। यह सिलसिला सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ देता है। पाकिस्तान में ग्रिड बिगाड़ने वाली ताकतें आज भारत में काम कर रही हैं। पाकिस्तान में जो आज हो रहा है वही कल भारतीय राज्यों के आगे भी आ सकता है।

बिजली खरीद के 25 वर्ष के समझौते पर अड़ने से स्थिति और बिगड़ जाती है। ये समझौते उस समय बिजली खरीद समझौते की कठोरता इसे और अधिक बढ़ा देती है। ये समझौते उस दौर के लिए थे, जब मार्जिनल कॉस्ट ठहरी रहती थी। नवीकरणीय ऊर्जा के दौर में मार्जिनल कॉस्ट शून्य है, इसलिए ये समझौते बोझ हैं। केंद्रीय नियोजक ऐसी व्यवस्था में ज्यादा कुछ नहीं कर सकते, जहां आपूर्ति (पवन और सौर ऊर्जा) अनिश्चित है और मांग लगातार घटती-बढ़ती रहती है।

उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में एआई के कारण आई मांग का झटका भी दिखाता है कि भारत में क्या हो सकता है। ग्रिड की स्थिरता को आपूर्ति में कमीबेशी से ही नहीं बल्कि खपत में भारी इजाफे से भी खतरा हो रहा है। इसे प्रशासनिक नियंत्रण से संभालने की कोशिश हुई तो किल्लत होगी, राशनिंग करनी पड़ेगी और ग्रिड को ऊपर बताया गया खतरा और तेज हो जाएगा। आज जिन चुनौतियों का सामना उन्नत अर्थव्यवस्थाएं कर रही हैं, कल भारतीय राज्यों को भी उनका सामना करना पड़ सकता है।

इससे निजात पाने का तरीका मूल्य व्यवस्था में छिपा है। जलवायु परिवर्तन के दौर में मूल्य व्यवस्था के आधार पर बिजली बाजार का सुधार करना सबसे आसान है। कामकाजी बाजार में मूल्य के इशारे पर ही निजी फैसले तय होते हैं। जब धूप खिलती है और हवा चलती है तो बिजली की कीमत गिरकर शून्य हो जानी चाहिए। इससे उपभोक्ताओं को ज्यादा बिजली खर्च करने वाले उपकरण चलाने का इशारा मिलता है जैसे पानी के पंप, वाहनों की चार्जिंग और बैच कंप्यूटिंग। भारतीय उपभोक्ताओं के बड़े हिस्से को दिन में सस्ती बिजली मिल जाए तो शाम को बिजली महंगी की जा सकती है और सब्सिडी भी खत्म की जा सकती है। उत्पादन कम हो तो कीमत ज्यादा होनी चाहिए, जिससे उपभोक्ताओं को इस्तेमाल कम करने का संकेत मिल सके।

जो पाकिस्तान में हुआ, उससे हमें भी फिक्र होनी चाहिए। वहां सरकारी उपक्रमों की माली हालत खस्ता है, अमीर और कामकाजी वर्ग ग्रिड से हट गया और ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ टूट गई। यह सब अच्छी मंशा, सब्सिडी और 20वीं सदी के केंद्रीय नियोजन मॉडल पर अड़े रहने की वजह से हुआ है। मूल्य व्यवस्था ही इकलौता तरीका है, जो ऊर्जा की नई दुनिया की जटिलताओं के साथ कदमताल कर सकती है। इसके लिए ऐसी बाजार व्यवस्था में जाना होगा, बिजली प्रणाली के सभी घटकों के लिए आपूर्ति और मांग की असली और तात्कालिक स्थिति स्पष्ट होती है। इसका मतलब है कि ग्रिड को सरकारी ढांचे के बजाय सामुदायिक बाजार की तरह देखना होगा।


(लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं)

First Published - December 25, 2025 | 9:22 PM IST

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