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भारत में राज्यों के बीच निवेश की खाई के पीछे सिर्फ गरीबी नहीं, इससे कहीं गहरे कारण

देश में राज्यों के स्तर पर निवेश में काफी असमानताएं हैं। कई राज्यों में निवेश धीमा है, लेकिन जरूरी नहीं कि ऐसा कम प्रति व्य​क्ति आय वाले राज्य में ही हो

Last Updated- January 01, 2026 | 9:20 PM IST
Investment Gap
इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

भारतीय अर्थव्यवस्था जहां अनिश्चित समय में भी मजबूत वृद्धि हासिल करती रही है वहीं वैश्विक और स्थानीय स्तर पर एक स्थायी चिंता यह है कि विभिन्न राज्यों के आर्थिक प्रदर्शन में काफी अंतर पाया जाता है। खासकर प्रति व्यक्ति आय आर्थिक गतिविधियों की प्रकृति और संरचना के साथ-साथ व्यापक रूप से भिन्न होती है। कई अध्ययनों ने इस बात की ओर संकेत किया है कि भारतीय राज्यों तक आ​र्थिक वृद्धि का लाभ समुचित रूप से नहीं पहुंच पा रहा। भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए यह आवश्यक है कि आ​र्थिक वृद्धि व्यापक आधार वाली हो, ताकि विकास के लाभ अधिक व्यापक आर्थिक वर्गों तक पहुंच सकें।

विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में निवेश वृद्धि का अहम वाहक होता है। क्षमता निर्माण करके तथा रोजगार की मदद करके यह मांग की भी मदद कर सकता है और आपूर्ति की भी। राज्यवार निवेश की कोई आधिकारिक श्रृंखला नहीं प्रकाशित होती है लेकिन सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी का पूंजीगत व्यय का डेटाबेस कुछ जानकारी प्रदान करता है। यह पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों को छोड़कर अन्य राज्यों में परियोजनाओं पर नजर रखता है।

पूंजीगत व्यय परियोजना भारत में अतिरिक्त उत्पादन क्षमता कायम करने के इरादे की प्रतिनिधि होती है। यह डेटाबेस सरकारी और निजी क्षेत्र दोनों की परियोजनाओं को शामिल करता है जिनकी आर्थिक गतिविधियां विनिर्माण, सेवाओं और अधोसंरचना तक विस्तारित हैं। लेकिन चूंकि यह डेटाबेस परियोजनाओं के इरादे, आरंभ और पूर्णता से संबंधित औपचारिक घोषणाओं पर निर्भर होता है इसलिए यह अर्थव्यवस्था में अपनाई गई बड़ी परियोजनाओं पर केंद्रित होता है। इसके बावजूद बड़े पैमाने पर निवेश का समर्थन करने वाले कारक आगे और पीछे के संबंध कायम कर सकते हैं। इससे सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यम क्षेत्र को प्रोत्साहन मिल सकता है। अतः यह लेख मुख्य रूप से बड़ी परियोजनाओं में निवेश से संबंधित उपलब्ध जानकारी पर केंद्रित है।

राज्यों में निवेश को समझने के लिए, नई परियोजनाओं की श्रेणी एक उपयोगी संदर्भ बिंदु है। आइए 2015 से 2024 तक की 10-वर्षीय अवधि में कुल घोषणाओं पर नजर डालें। जैसा कि आपको भी अंदाजा होगा, महाराष्ट्र कुल निवेश में 15 फीसदी हिस्सेदारी के साथ इस सूची में शीर्ष पर है। उसके बाद आने वाले तीन राज्य गुजरात, आंध्र प्रदेश और ओडिशा एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। ये राज्य मिलकर कुल नए निवेश में 42 फीसदी के हिस्सेदार हैं। प्रति व्यक्ति आय के मामले में जरूर उनमें काफी अंतर है। गुजरात उच्च आय वाले राज्यों में शुमार है, आंध्र प्रदेश मध्यम आय वाला राज्य है जबकि ओडिशा निम्न आय वाला राज्य है। दूसरे शब्दों में नया निवेश उच्च आय वाले राज्यों में सीमित नहीं है। संकेंद्रण के लाभ नए निवेश निर्णयों के प्राथमिक कारक प्रतीत नहीं होते। यह समझने के लिए कि आ​खिर क्या महत्त्व रखता है, आइए दो अन्य पहलुओं पर ध्यान दें।

निवेश संबंधी निर्णयों के अहम वाहकों की बात करें तो सरकारी निवेश काफी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। संबंधित सामग्री की बात करें तो सरकारी निवेश और निजी निवेश को जोड़ने वाले दो वैकल्पिक दृष्टिकोणों पर चर्चा की गई है जो हैं ‘क्राउडिंग इन’ और ‘क्राउडिंग आउट’। सार्वजनिक वस्तुओं और मेरिट वस्तुओं में सार्वजनिक निवेश महत्त्वपूर्ण सकारात्मक बाह्यताओं का निर्माण करता है। ये आगे चलकर निजी निवेश की लागत को कम कर सकते हैं या वैकल्पिक रूप से निजी निवेश पर रिटर्न को बढ़ा सकते हैं, जिससे उच्च स्तर का निजी निवेश संभव हो पाता है। इस परस्पर क्रिया की प्रक्रिया को ‘क्राउडिंग इन’ कहा जाता है। दूसरी ओर, ‘क्राउडिंग आउट’ उस स्थिति को दर्शाता है जब सार्वजनिक निवेश उपलब्ध संसाधनों का पहले ही दोहन कर लेता है और इससे निजी निवेश हतोत्साहित होता है।

वर्ष 2015 से 2024 के बीच की सरकारी और निजी निवेश की घोषणाओं पर नजर डालें तो एक सकारात्मक रिश्ता नजर आता है। क्राउडिंग इन के बहुत अधिक प्रमाण नजर आते हैं। उच्च सरकारी निवेश, उच्च निजी निवेश में मददगार होता है। वे राज्य जिन्होंने बजट और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों जैसी अपनी संस्थाओं के माध्यम से सार्वजनिक निवेश के लिए अधिक संसाधन लगाए हैं, वहां निजी निवेश का स्तर भी अधिक देखा जाता है।

एक अन्य पहलू जिस पर विचार करना चाहिए, वह है किसी राज्य में निवेश के निर्णयों पर शासन और व्यावसायिक वातावरण का प्रभाव। जिन राज्यों का वातावरण अधिक अनुकूल होता है, वे अधिक निवेश आकर्षित करते हैं। शासन को विभिन्न संकेतकों के माध्यम से मापा जा सकता है। एक संकेतक पूर्ण किए गए निवेशों का आकार हो सकता है। यह संकेतक सुशासन और व्यापार करने में आसानी के परिणामों को दर्शाता है, क्योंकि शासन के मॉडल की सफलता केवल नए निवेश आकर्षित करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि उन निवेशों के क्रियान्वयन और संचालन को सहारा देने में भी होती है।

इस प्रकार, पूरे हुए निवेशों का उच्च स्तर नए निवेशों के उच्च स्तर से भी जुड़ा होना चाहिए। वास्तव में, पूर्ण निवेश का उच्च स्तर नए निवेशों (सार्वजनिक और निजी दोनों) के उच्च स्तर से उल्लेखनीय रूप से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। पूर्ण निवेश और नए निवेश के बीच सहसंबंध भी बहुत अधिक है। ये सहसंबंध उन राज्यों के लिए दो संभावित कार्रवाइयों को रेखांकित करते हैं जो निवेश स्तरों में सुधार करना चाहते हैं। सार्वजनिक निवेश को बढ़ाना और ऐसे तंत्रों को संस्थागत रूप देना जो निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रों में घोषित परियोजनाओं की पूर्णता में सहयोग करें। पहला कदम बेहतर अधोसंरचना को सहारा देगा और निजी निवेश के लिए सकारात्मक बाह्यताएं उत्पन्न करेगा, जबकि दूसरा कदम इरादों को वास्तविक क्षमता में बदलने में आने वाली बाधाओं को कम करेगा।


(ले​खिका राष्ट्रीय लोक वित्त और नीति संस्थान, नई दिल्ली की निदेशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published - January 1, 2026 | 9:16 PM IST

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